सिन्धु सभ्यता आर्थिक एवं सामाजिक जीवन

सिन्धु सभ्यता आर्थिक एवं सामाजिक जीवन

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सिन्धु मुहरें

– सैन्धव मुहरें अधिकांशतः सेलखड़ी (Steatite) की बनी होती थीं। काँचली मिट्टी (Faience), गोमेद, चर्ट तथा मिट्टी की बनी हुई मुहरें भी मिली हैं। लोथल और देशलपुर से ताँबे की बनी मुहरें मिली हैं। इन मुहरों का आकार चौकोर, आयताकार या वर्गाकार होता था। इसके अतिरिक्त गोलाकार, अण्डाकार, घनाकार आदि मुहरें भी मिली हैं। वर्गाकार मुद्रायें प्राय: सभी सेलखड़ी की हैं और सिन्धु सभ्यता के नगरों में ये बहुत लोकप्रिय थीं। मुद्राओं का सबसे प्रचलित आकार 2.8 सेमी० × 2.8 से०मी० था। इन मुहरों का उपयोग व्यापारिक वस्तुओं की गाँठों पर छाप लगाने के लिए होता था। मोहनजोदड़ो, कालीबंगा तथा लोथल से प्राप्त मुद्रांकों पर एक ओर सैन्धव लिपि से युक्त मुहर की छाप है तथा दूसरी ओर भेजे जाने वाले माल का निशान अंकित है। मुहरों पर एक श्रृंगी पशु, कूबड़ वाला बैल, हाथी, भैंसा, आदि अंकित हैं। मुद्राओं में सबसे अधिक संख्या ऐसी मुद्राओं की है जिन पर एक श्रृंगी पशु चित्रित हैं,

लेकिन कला की दृष्टि से सबसे उत्कृष्ट मूर्ति कूबड़ वाले सांड़ों की है।

मोहनजोदड़ो से मैके को प्राप्त पशुपति शिव की मुहर विशेष प्रसिद्ध है। इस मुहर में एक त्रिमुखी पुरुष को एक चौकी पर पद्मासन मुद्रा में बैठे हुए दिखाया गया है। उसके दाहिनी ओर एक हाथी तथा एक बाघ और बायीं ओर एक गैंडा तथा एक भैंसा खड़े हुए हैं। चौकी के नीचे दो हिरण खड़े हैं। मार्शल ने इसे शिव का आदिरूप कहा है।

लोथल और मोहनजोदड़ो की एक-एक मुहर पर नाव का चित्र अंकित है।

पट्टिकाएं – मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा से कई ताम्र-पट्टिकाएं (Copper Tablets) fict हैं। जिन पर एक तरफ मुद्रालेख हैं तो दूसरी तरफ सैन्धव मुहरों पर मिलने वाले प्रतीक बने हुए हैं। कुछ बाद की पट्टिकाओं पर मछली, मगर, बकरी एवं मृग के चित्र बने हैं।

मनके – मनके (Beads) सेलखड़ी, गोमेद, शंख, सीप, हाथी दाँत मिट्टी सोने, चाँदी एवं ताँबे पर निर्मित ढ़ोलाकार, अण्डाकार, अर्धवृत्ताकार आदि आकृति के मिले हैं। चन्हूदड़ो तथा लोथल से मनके बनाने के कारखाने प्राप्त हुए हैं। सर्वाधिक संख्या में सेलखड़ी पत्थर के मनके प्राप्त हुए हैं। बेलनाकार मनके सैन्धव सभ्यता में सर्वाधिक लोकप्रिय थे।

मृद्भाण्ड – मृद्भाण्ड अधिकांशतः लाल अथवा गुलाबी रंग के हैं। इन पर अलंकरण प्राय: काले रंग से हुआ है। अलंकरणों में त्रिभुज, वृत्त, वर्ग आदि ज्यामितीय आकृतियों, पीपल की पत्ती, खजूर, ताड़, केला आदि वनस्पतियों, वृषभ, हिरण, बारहसिंहा आदि पशुओं, मोर, सारस, बतख आदि पक्षियों तथा मछलियों का चित्रण विशेष लोकप्रिय है। मृद्भाण्डों पर भी हड़प्पन लिपि मिलती है। सैन्धव मृद्भाण्डों मे खानेदार बर्तन, साधारण तश्तरियाँ, थालियाँ और घड़े के ढक्कन प्रमुख हैं।

लोथल से प्राप्त एक मृद्भाण्ड में एक वृक्ष के मुँह में मछली पकड़े हुए एक चिड़िया को दर्शाया गया है तथा नीचे एक लोमड़ी का चित्र है। यह पंचतन्त्र की प्रसिद्ध कथा चालाक लोमड़ी को दर्शाता है।

इस सभ्यता की आर्थिक प्रगति के सूचक मृदभांड हैं। लाल चिकनी मिट्टी पर पुष्पाकार ज्यामितीय और प्राकृतिक डिजाइन बनाये जाते थे। हड़प्पा के मृदभांडों पर वृत्त या वृक्ष की आकृति भी मिलती है। सैन्धव नगरों के भग्नावशेषों के अवलोकन से प्रतीत होता है कि अधिकांश लोगों का जीवन सामान्य रूप से समृद्ध था। कृषि एवं पशुपालन सैन्धव अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण अंग थे। हड़प्पा आदि स्थलों से प्राप्त बड़े धान्यागारों से यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि अतिरिक्त अन्न का संग्रह राज्य द्वारा किया जाता रहा होगा। सामान्यत: नगरों में पूरे देश के संसाधन एकत्र हो जाते थे। अतिरिक्त उत्पादन का नियन्त्रण सम्भवत: हड़प्पा समाज में भी शहर के प्रभावशाली लोगों के हाथ में रहा होगा। संसाधनों के एकत्रीकरण की व्यवस्था, सैन्धव नगरों के विकास का एक कारण थी। हड़प्पा सभ्यता के व्यापक विस्तार का कारण, आपसी आर्थिक अन्तर्निर्भरता और व्यापारतन्त्र भी रहा। मूल संसाधनों का अलग-अलग स्थानों पर उपलब्ध होना सिन्धु नदी घाटी के विविध क्षेत्रों को जोड़ने का कारण बना। इनमें कृषि एवं खनिज संसाधन तथा लकड़ी आदि सम्मिलित थे और ये व्यापारिक मागों की स्थापना करके ही प्राप्त किये जा सकते थे। कहा जा सकता है कि सैन्धव नगर आर्थिक गतिविधियों के महत्त्वपूर्ण केन्द्र थे। सैन्धव सभ्यता एक विकसित नगरीय सभ्यता थी। हड़प्पा, मोहनजोदडो, कालीबंगा एवं लोथल के उत्खनन से प्राप्त अवशेषों के आधार पर विद्वानों ने समाज के विविध व्यावसायिक वर्गों के होने का अनुमान किया है। बढ़ई का अस्तित्व लकड़ी काटने हेतु अवश्य रहा होगा। ईंटों के निर्माण द्वारा कुम्हार जीविकापार्जन करते थे। सैन्धव नगरों के अनुपम नियोजन वास्तु विशेषज्ञ एवं मकानों के निर्माता राजगीरों की कल्पना सहज ही की जा सकती है। सोना, चांदी, तांबा, पीतल आादि धातुओं के आभूषणों, गुड़ियों, मुद्राओं, बर्तनों को देखने से प्रतीत हाता है कि सैन्धव स्वर्णकार अपने कार्य में पर्याप्त निपुण थे। वे धातुओं को गलाना जानते थे। तांबे की गली हुई ढेरी मोहनजोदड़ो में मिली है। चाहुँदड़ो में मैके को इक्के के खिलौने प्राप्त हुए हैं। हड़प्पा में भी पीतल का एक इक्का पाया गया है। मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा में गाड़ी के पहिये भी उपलब्ध हुए हैं। ये लोग धातुओं के अतिरिक्त शंख, सीप, घोंघा, हाथी दांत आदि के कार्य में निपुण थे। मोहनजोदडो से हाथी दांत का एक पात्र भी मिला है। अनाज को पीसने के लिए चक्कियों और ओखलियों का प्रयोग किया जाता होगा। बैलगाड़ियों का प्रयोग अनाज ढोने के लिए किया जाता था। बैलगाड़ी की आकृति के खिलौने चाहुँदड़ो, हड़प्पा आदि स्थानों से मिले हैं। इस सभ्यता के विविध केन्द्रों से प्राप्त वस्तुओं की एकरूपता तथा किसी एक क्षेत्र विशेष में उपलब्ध सामग्री की अन्य क्षेत्रों में प्राप्ति सुसंगठित अर्थव्यवस्था का प्रतीक है जिसके अन्तर्गत उत्पादित वस्तुओं के सामान्य वितरण में पर्याप्त सुविधा थी।

व्यापार एवं बाह्य देशों से संबंध

अन्य समकालीन सभ्यताओं जैसे मेसोपोटामिया, मिश्र आदि से सैन्धव लोगों का सम्पर्क व्यापारिक तथा सांस्कृतिक दोनों ही प्रकार का था। सैन्धव लोगों के लिए व्यापार का अत्यधिक महत्त्व था। इस दृष्टि से उन लोगों ने बहुत प्रगतिशील नीति अपनाई थी। उन लोगों के विभिन्न देशों से व्यापारिक सम्बन्ध होने के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। सैन्धव स्थलों के उत्खनन से ऐसी पर्याप्त सामग्री मिली है जिनके लिए कच्चा माल आस-पास के क्षेत्रों में उपलब्ध नहीं था। अत: इसका आयात बाहर से किया जाता रहा होगा। सैन्धव नगरों का व्यापारिक सम्बन्ध मेसोपोटामिया तथा फारस की खाड़ी से था, इस तथ्य के अनेक पुरातात्त्विक प्रमाण मिलते हैं। सैन्धव सभ्यता की वे मुद्राएं सबसे महत्त्वपूर्ण साक्ष्य हैं जो मेसोपोटामिया के विभिन्न नगरों में पाई गई हैं। विद्वानों की मान्यता है कि ये वस्तुत: व्यापार के माध्यम से वहाँ पहुँची थीं। कुछ इतिहासकारों की यह भी धारणा है कि सैन्धव जनों ने सम्भवत: मेसोपोटामिया में व्यापारिक बस्ती की स्थापना की हो। किन्तु, लम्बर्ग कार्लोव्सकी इस मत से सहमत नहीं हैं कि मेसोपोटामिया में सैन्धव लोगों की बस्ती थी। मात्र मुद्राओं की प्राप्ति को उनके अनुसार इस तथ्य का मौलिक आधार नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार सैन्धव नगरों में निर्मित जिस प्रकार की वस्तुएं मेसोपोटामिया में मिली हैं, वे इस तथ्य के लिए पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं करती कि वहाँ सैन्धव व्यापारियों ने बस्ती बसाई थी, इस प्रकार की वस्तुएं सीधे सम्पर्क के बिना बिचौलियों द्वारा वहाँ पहुँचाई जा सकती थीं क्योंकि सैन्धव स्थलों में एक भी मुहर अथवा लेख मेसोपोटामिया का उपलब्ध नहीं हुआ है। दूसरे, मेसोपोटामिया में केवल एक ही ऐसी मुद्रा उम्मा नामक स्थल से मिली है, जिसे निश्चयपूर्वक सैन्धव सभ्यता का कहा जा सकता है। इसके अतिरिक्त सैन्धव स्थलों के उत्खनन में ऐसे भवन के अवशेष नहीं मिले जिन्हें मेसोपोटामिया शैली का कहा जा सके। इतना ही नहीं, मेसोपोटामिया के किसी भी स्थल से सैन्धव उपकरण पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हुए हैं। किन्तु, अधिकांश विद्वान् लम्बग कार्लोव्सकी के मत का सैन्धव सभ्यताओं के मध्य सम्पर्क को प्रमाणित करते हैं। सैन्धव जनों द्वारा निर्मित अथवा उसके सदृश अनेक मुद्रायें मेसोपोटामिया के विभिन्न स्थलों से मिली हैं। हड़प्पा स्थलों से प्राप्त बेलनाकार मुद्रायें मेसोपोटामिया में निर्मित अथवा उससे प्रेरित मानी जाती हैं। कुछ मुद्रायें, जो बहरीन से प्राप्त हुई हैं उन पर सैन्धव लिपि के चिह्न हैं। इस द्वीप में उपलब्ध अन्य मुद्राओं की तरह कुछ मुहरें दक्षिणी मेसोपोटामिया और एक लोथल से मिली है। हड़प्पाकालीन जो वस्तुएं मेसोपोटामिया से मिली हैं वे दोनों सभ्यताओं के संबंध को दर्शाने के लिए काफी हैं। हड़प्पाकालीन मुहर-मेसोपोटामिया के सूसा और ऊर में मिले हैं। हाल ही में फारस की खाड़ी में फैलका और बहरीन तथा मेसोपोटामिया के निप्पुर में सिंधु सभ्यता की मुहरें पाई गयी हैं जो चौकोर हैं, जिन पर एक सींग वाले पशु की आकृति एवं सिंधु लिपि उत्कीर्ण है। तेल अस्मार (मेसोपोटामिया में) से हड़प्पाकालीन लाल पत्थर का मनका प्राप्त होता है। उसी तरह पक्की मिट्टी की छोटी मूर्ति निप्पुर से प्राप्त होती है। मोहनजोदड़ो में मेसोपोटामिया की एक बड़ी बेलनाकार मुहर प्राप्त हुई है। लोथल से मेसोपोटामिया की एक छोटी बेलनाकार मुहर प्राप्त हुई है। लोथल से तांबे का ढला हुआ धातु पिंड भी मिला है। मेसोपोटामिया से प्राप्त एक कपड़े पर सिंधु सभ्यता की एक मुहर की छाप है। मध्य एशिया में तुर्कमेनिस्तान नामक जगह से सिंधु सभ्यता की कुछ वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। लोथल से मिट्टी की बनी एक नाव की प्रतिमूर्ति मिली है। सिंधु घाटी में मानक माप एवं बाट के प्रयोग का साक्ष्य मिला है। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो से धान्य कोठारों का साक्ष्य मिला है। संभवत: कालीबंगा में भी धान्य कोठार मौजूद था। मेसोपोटामिया में स्थित अक्काड़ के प्रसिद्ध सम्राट् सरगौन (2350 ई.पू.) ने यह दावा किया था कि दिलमन, माकन और मेलुहा के जहाज उसकी राजधानी में लंगर डालते थे। दिलमन की पहचान बहरीन से माकन की मकरान (बलूचिस्तान) से और मेलुहा की सिन्धु सभ्यता से की गई है।

बाह्य व्यापार से संबंधित देश- मेसोपोटामिया, ईरान, अफगानिस्तान, बहरीन, ओमान, सीरिया आदि। आयात, अलबस्टर (अर्द्ध कीमती पत्थर)-बलूचिस्तान, राजस्थान, डामर। बिटुमिन-बलूचिस्तान और मेसोपोटामिया। चांदी-अफगानिस्तान और ईरान, मेसोपोटामिया। सोना-अफगानिस्तान और ईरान। पेस्को महोदय (इतिहासकार) का मानना है कि सोना दक्षिण भारत के कोलार से भी मंगाया जाता था। टिन-अफगानिस्तान और ईरान। सीसा-ईरान और अफगानिस्तान। तांबा-राजस्थान (खेत्री) और लाजवर्त। मणि-बदक्शां और शंख और घोंघे-पं. भारत के तट पर फारस की खाड़ी से। फिरोजा-ईरान।

निर्यात- लोथल में बनी सीप की वस्तुएं, हाथी दांत की वस्तुएं, तैयार माल, कपास, अनाजों का निर्यात भी संभवत: किया जाता था। सिंधु घाटी के पक्ष में व्यापार संतुलन था। हड़प्पा में मेसोपोटामिया की वस्तुओं का न पाया जाना, इस तथ्य से स्पष्ट किया जा सकता है कि परंपरागत रूप में मेसोपोटामिया के लोग कपड़े, ऊन, खुशबूदार तेल और चमड़े के उत्पाद बाहर भेजते थे। चूंकि ये चीजें जल्दी नष्ट हो जाती थीं, इसलिए ये हड़प्पा सभ्यता में प्राप्त नहीं होती थीं। विशेषत: अमीर लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बाह्य व्यापार को प्रोत्साहन दिया गया था। मुख्य रूप में विलासिता संबंधी सामग्रियों का व्यापार होता था।

महत्त्वपूर्ण बंदरगाह- लोथल, रंगपुर, प्रभासपाटन (सोमनाथ) बालाकोट, सुत्कोगेंडोर एवं सुत्काकोह प्रमुख बंदरगाह नगर थे। बलूचिस्तान आर्थिक रूप से एक सम्पन्न क्षेत्र नहीं था। फिर भी यहाँ के बंदरगाहों की बड़ी अहमियत थी क्योंकि सिंधु एवं गुजरात क्षेत्र के बंदरगाहों के विपरीत ये समुद्री लहरों से ज्यादा सुरक्षित थे। इसलिए बरसात के दिनों में बलूचिस्तान के बंदरगाहों से ही जहाज खुलते थे। लोथल एक ज्वारीय बंदरगाह (Tidal port) था

परिवहन- मोहनजोदड़ो से पाई गई एक मुहर में नाव को चित्रित किया गया है। पक्की मिट्टी से बनी हुई नाव का नमूना लोथल में पाया गया है जिसमें मस्तूल लगाने का छेद बना हुआ है। अंतर्देशीय परिवहन का साधन बैलगाड़ी था। हड़प्पा एवं चाँहुदड़ो से कांसे की गाड़ी के नमूने मिले हैं। हड़प्पा सभ्यता में बैलगाड़ी में प्रयुक्त पहिए ठोस होते थे।

माप-तौल

उत्खनन में प्राप्त कुछ अवशेषों से ऐसा लगता है कि सिन्धु सभ्यता के लोग माप-तौल की प्रक्रिया से भी सुपरिचित थे। ऐसा प्रतीत होता है कि सम्पूर्ण सिन्धु (होल) में माप-तौल की समान व्यवस्था प्रचलित थी।

सीप का बना मानक बाट मोहनजोदड़ो में मिला है। हाथी दांत का एक स्केल लोथल से प्राप्त हुआ है। फीट (फुट) लगभग 33.5 से.मी. का और क्यूविट 52.05 से.मी. का होता था। उपरी स्तर पर दशमलव प्रणाली, जबकि निचले स्तर पर द्विभाजन प्रणाली थी। गणना में 16 एवं उसके गुणक का प्रयोग होता था। पिगट ने उल्लेख किया है कि ये तौल 1, 2, 3, 4, 8, 16, 32, 64, 160, 200, 320 तथा 640 के अनुपात में आगे बढ़ते हैं तथा इस प्रक्रिया में 16 तौल की इकाई रहा होगा जो कि 13.64 ग्राम के बराबर है। सीप का एक खण्डित मापदण्ड मोहनजोदडो से भी मिला है। मैके के अनुसार, 16.55 से.मी. लम्बा, 1.55 से.मी. चौड़ा एवं 675 से.मी. मोटा है तथा एक ओर बराबर दूरी पर नौ का निशान अंकित हैं और दो संकेंत के मध्य की दूरी 0.66 से.मी. है। विद्वानों की मान्यता है कि इस प्रकार के मापदण्ड मिश्र, एशिया माइनर, यूनान, सीरिया आदि प्राचीन सभ्यताओं में भी प्रचलित थे। हड़प्पा से तांबे का मापदण्ड मिला है। माधोस्वरूप वत्स ने निवेदन किया है कि 3.75 से.मी. लम्बे मापदण्ड पर 0.93 से.मी. की विभाजक रेखायें अंकित है जो सम्भवत: 51.55 से.मी. के हस्त परिमापन पर आधारित प्रतीत होती है। लोथल से प्राप्त मापदण्ड, मोहनजोदड़ो से प्राप्त मापदण्ड की तुलना में छोटा होते हुए भी अधिक सही लगता है। यह मापदण्ड 128 मिलीमीटर लम्बा है, कुछ भाग टूट गया है, इस पर 27 विभाजक रेखायें 46 मिलीमीटर की दूरी से अंकित हैं एवं दो इकाइयों के मध्य 1.7 मिलिमीटर की दूरी है।

राजनीतिक संगठनः- सिन्धु सभ्यता के लिपि के पढ़े न जाने के कारण यहाँ की शासन प्रणाली पर केवल अनुमान ही लगाया जाता है। समकालीन मेसोपोटामियां सभ्यता में मन्दिर के प्रमाण मिले हैं वहाँ पर पुरोहितों का शासन माना जाता है परन्तु सिन्धु सभ्यता से ऐसे किसी भी मन्दिर के प्रमाण प्राप्त नही हुए हैं अतः यहाँ पर पुरोहितों का शासन नहीं माना जा सकता हालांकि प्रसिद्ध इतिहासकार 0एल0 बासम ने यहाँ पर पुरोहितों का शासन माना है। डा0 आर0एस0 शर्मा सिन्धु सभ्यता में वणिक वर्ग का शासन मानते हैं जो इस समय विद्वानों में सबसे ज्यादा मान्य है। पिग्गट ने बताया  किस सामराज्य की दो जुड़वा राजधानियाँ हड़प्पा और मोहनजोदड़ों है।

सामाजिक दशा:-

सिन्धु सभ्यता से हमें एक शासक वर्ग का पता चलता है पुरोहितों के प्रमाण भी कुछ मिले हैं यहाँ का शासन वणिक समुदाय द्वारा चलाया जाता था। मकानों के प्रारूप के आधार पर श्रमिक और दासों का अनुमान भी लगाया जाता है अतः वहाँ की सामाजिक संरचना में उपर्युक्त वर्ग की कल्पना की जाती है।

  1. स्त्रियों की दशा:-सिन्धु सभ्यता में सबसे अधिक मृण्य मूर्तियां नारी की प्राप्ति हुई है। इससे अनुमान लगाया जाता है कि समाज में उनकी दशा अच्छी थी परन्तु इस विषय में उल्लेखनीय तथ्य यह है कि राजस्थान और गुजरात से किसी भी नारी की मृण्य मूर्ति के प्रमाण नहीं प्राप्त हुए हैं।
    लोथल और कालीबंगा से युगल शवाधान के आधार पर सती प्रथा का अनुमान लगाया जा सकता है सिन्धु सभ्यता में दास प्रथा प्रचलित थी।
    वस्त्र आभूषण रहन-सहन:-सिन्धु सभ्यता को कपास उपजाने का श्रेय प्राप्त है। यहाँ से सूती वस्त्र के प्रमाण मिले हैं। वस्त्रों पर बुनाई भी होती थी। मोहनजोदड़ो से हाथी के दांत की बनी सुइयों एवं कंघी का प्रमाण है। वही से ताँबे के सीसे प्राप्त हुए हैं। चान्हूदड़ो से लिपिस्टिक काजल आदि के प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं।

आर्थिक दशाः- 1. कृषि:- हड़प्पा वासी सामान्यतः जाड़े में नवम्बर- दिसम्बर में अपनी फसलों को बोते थे तथा अगली बरसात आने के पूर्व मार्च-अप्रैल में काट लेते थे। इन लोगों को 9 प्रकार की फसलें ज्ञात थी- गेहँ, जौ, कपास, सरसो, राई, तिल, मटर तरबूज, खजूर। हड़प्पाई लोग फसलों के बोने में भ्वम (हो) (हल की प्रारम्भिक अवस्था) का प्रयोग करते थे। फसल काटने के लिए पत्थर के हशिये का प्रयोग किया जाता था। वनावली से मिट्टी के हल के प्रमाण मिलें है वहाँ से बढि़या किस्म का जौ प्राप्त हुआ है।
चावल:- सिन्धु सभ्यता के लोगों को चावल का ज्ञान नहीं था परन्तु  इसके कुछ प्रमाण मिले है लोथल से चावल प्राप्त हुआ है जबकि रंगपुर से धान की भूंसी । परन्तु सामान्यतः यहाँ चावल के अस्तित्व को नही माना जाता।
सिंचाई:- सिंचाई के साधनों में वर्षा जल का प्रयोग होता था। लेकिन नहरों का प्रयोग नहीं होता था। नहरों का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद में प्राप्त होता है। नहरों का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य खारवेल के हाथी-गुफा अभिलेख में मिलता है।
पशुपालन:-सिन्धु सभ्यता में पशुओं का ज्ञान विभिन्न प्रकार की मृण्य मूर्तियों और मुहरों पर उनके अंकन से होता है। कूबढ़ वाले बैल की महत्ता सबसे अधिक थी। एक श्रंगी साँड भी था। गाय का प्रमाण यद्यपि माना जाता है परन्तु इसका अंकन न तो मुहरों पर मिलता है और न ही इसकी कोई मृण्य मूर्ति प्राप्त होती है हलांकि एस0आर0 राव ने लोथल से गाय की मृण्य मूति प्राप्त होने का दावा किया है।
घोड़ा:-सिन्धु सभ्यता के लोगों को घोड़ों का ज्ञान नहीं था परन्तु इसके कुछ प्रमाण प्राप्त हुए हैं जैसे-लोथल एवं रंगपुर से मृण्य मूर्ति, सुर कोटडा से सैन्धव कालीन से अस्थि पंजर आदि। बलुचिस्तान में स्थित राना घुड़ई से घोड़े के दाँत मिले हैं लोथल से घोड़े की मृण्य मूति प्राप्त हुई है इसी तरह मोहनजोदड़ों के उपरी स्तर से घोड़े के प्रमाण मिले हैं।
बाघ:- सिन्धु सभ्यता के लोगों को बाघ का ज्ञान था लेकिन शेर का ज्ञान नहीं था।
उद्योग धन्धे:- सूती वस्त्र यहाँ का सबसे प्रमुख उद्योग रहा होगा चूँकि कपास सैन्धव लोगों की मूल फसल थी सूती वस्त्र के प्रमाण मोहनजोदड़ों से प्राप्त हुए हैं। वस्त्रों पर बुनाई भी की जाती थी। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक व्यक्ति तिपतिया शाल ओढ़े हुए हैं यूनानी कपास के कारण ही इसे सिन्डन कहते थे।
ताँबे सैन्धव सभ्यता में प्रमुख रूप से प्रयोग की जाने वाली धातु थी। ताँबा मुख्य रूप से राजस्थान के खेतड़ी से (झुन-झुन जिला) प्राप्त किया जाता था। बलुचिस्तान और मगन (मध्य एशियाई देश) से भी ताँबा के प्रमाण मिले हैं। ताँबें में टिन मिलाकर काँसा तैयार किया जाता था। टिन अफगानिस्तान से मंगाया जाता था। ताँबे से बनी वस्तुयें काँसें की अपेक्षा अधिक मात्रा में मिली हुई है।
मुहरें मनके मृदभाण्ड धातु मूर्तियां और नगर बनाने वाले लोगों का भी समुदाय था।
व्यापार:- व्यापार मूलतः दो प्रकार का होता था आन्तरिक व्यापार एवं वाह्य व्यापार।
आन्तरिक व्यापार:- सैन्धव लोगों का आन्तरिक व्यापार अत्यन्त उन्नत अवस्था में था एक ही तरह के बाट-माप का प्रयोग और उनका 16 गुने के रूप में होना विभिन्न नगरों में अन्नागार प्राप्त होना बैलगाड़ी के पहिए का ठोस होना उनमें आपस में किसी न किसी तरह से सम्बन्ध को प्रदर्शित करता है।
क्षेत्र:- सिन्धु सभ्यता के लोग महाराष्ट्र कर्नाटक और तमिलनाडु तक व्यापार करने के लिए जाते रहे होगें। महाराष्ट्र के दैमाबाद से एक काँसे का रथ प्राप्त हुआ है जिसे एक नग्न पुरुष चला रहा है। दैमाबाद का सम्बन्ध सिन्धु क्षेत्र से लगाया जा रहा है। कर्नाटक के कोलार से सैन्धव लोग सोना प्राप्त करते थे इसी तरह तमिलनाडु के दोछा बेक्टा से वे हरा पत्थर प्राप्त करते थे। इस तरह सुदूर दक्षिण तक सैन्धव लोगों का व्यापारिक सम्बन्ध पहले से ही था।
बंगाल बिहार और उत्तर-पूर्वी राज्यों से उनके किसी व्यापारिक सम्बन्ध का पता नहीं चलता।
वाह्य व्यापार:- सैन्धव लोगों के वाह्य व्यापार का साक्ष्य भी मिला है। एक प्रकार के बाट-माप मुहरों की उपस्थिति बन्दरगाह नगरों का होना लोथल से गोदी बाड़े का प्रमाण प्राप्त होना। लोथल में फारस की मुहर प्राप्त होना इनके वाह्य व्यापार को प्रदर्शित करता है।
सिन्धु सभ्यता की बेलनाकार मुहरें मेसोपोटामियां के आधा दर्जर नगरो (उर, किश, तिल अस्मर नित्पुर, टेटे गावरा, हमा) से प्राप्त हुए हैं। मेसोपोटामिया के शासक सारगोन काल की मिट्टी की पट्टिकाओं पर मेलुहा, ढिलमुन और मगन से व्यापार का उल्लेख मिलता है। मेलुहा की पहचान मोहनजोदड़ों से की जाती है। ढिल्मुन की पहचान बहरीन से, मगन की पहचान अभी संदिग्ध है परन्तु इसका उल्लेख ताँबे के प्रमुख स्रोत के रूप में हुआ है। सम्भवतः यह आधुनिक ओमान अथवा बलुचिस्तान का कोई क्षेत्र रहा होगा।
व्यापारिक देशः-1- मेसोपोटामियां (ईराक, ईरान, अफगानि -स्तान, ढिल्मुन (बहरीन) रूस का दक्षिणी तुर्कमेनिस्तान, मिश्र, कुबैत (फैल्का द्वीप) तिब्बत।
नोट:- इस व्यापार में यूरोपीय देश, दक्षिणी पूर्वी एशियाई देश, चीन और अमेरीकी देशों ने भाग नहीं लिया।
निर्यात की वस्तुयें:- सूती वस्त्र, मसाला, हाथी दांत, काली लकड़ी, मुहरें आदि।
आयातित वस्तुयेंः-
1- लाजवर्द मणि-अफगानिस्तान का बदख्सा क्षेत्र।
2- चाँदी – अफगानिस्तान
3- टिन – ईरान, अफगानिस्तान
4- संगमराब अथवा हरिताश्म ;श्रमकद्ध ईरान से।
5- फिरोजा टिन और चांदी – ईरान से।
6- फिलन्ट एवं चर्ट के पत्थर – त्वीतप (रोड़ी) पाकिस्तान के सिन्ध एवं  .. नाानत (सक्खर) क्षेत्र से।
सैन्धव लोगों ने अफगानिस्तान में अपना व्यापारिक उपनिवेश बसाया जबकि ढिलमुन (बहरीन) उनके बीच व्यापारिक बिचौलिए का कार्य करता था।

 

 

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