सामाजिक सुधार आंदोलन को जन्म देने वाली परिस्थितियां

सामाजिक सुधार आंदोलन को जन्म देने वाली परिस्थितियां

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भारतीय सुधार आंदोलन, मौटे तौर पर, भारतीय समाज पर पश्चिमी प्रभाव के कारण हुआ। 18वीं सदी में भारतीय समाज में कई जातिगत प्रथाएँ प्रचलित थीं। साथ-साथ खानपान, अन्तरस्तरीय विवाह और छुआछूत की वजना इनमें से कुछ है। निचली जातियों की स्थिति बहुत खराब थी। उन्हें अछूत माना जाता था। उन्हें अलग जगहों पर रहना पड़ता था, क्योंकि ऐसा माना जाता था कि उनकी छाया भी उच्च जाति के हिन्दू की दूषित कर देगी। उन्हें शिक्षा नहीं दी जाती थी। पुरातनवादी इन जाति बंधनों और वर्जनाओं की दैवीय इच्छा मानते थे और किसी भी परिवर्तन और विकास की निन्दा करते थे।

18वीं सदी के भारत में निचली जातिओं के बाद महिलाओं की स्थिति काफी खराब थी। बाल विवाह का प्रचलन था और समय का यह रिवाज था कि 10 और 16 साल की उम्र के लड़कों और 6 और 10 साल की उम्र की लड़कियों की शादी कर दी जाती थी। क्योंकि उन दिनों शिशुओं की मृत्यु दर बहुत ज्यादा थी, इसलिए कई लड़कियाँ जवान होने से पहले ही विधवा हो जाती थीं। इन युवा विधवाओं को दुबारा शादी नहीं करने दी जाती थी और उनकी आम हालत बहुत ही खराब थी। इसके ठीक विपरीत, विधुरों पर कोई मनाही नहीं थी, यहाँ तक वे कई शादियाँ कर सकते थे। बहुपत्नी प्रथा, ऊँची जाति के हिन्दुओं में (विशेषकर बंगाल के कुलीन ब्राहमणों में) और मुसलमानों में प्रचलित थी। हिन्दू और मसलमान दोनों की औरतों के लिए पर्दा जिन्दगी का एक हिस्सा ही बन गया था। उन्हें अपने कक्ष से बाहर आने-जाने की इजाजत नहीं थी और न ही वे अपना अनढका चेहरा दनिया को दिखा सकती थीं। संक्षेप में, भारतीय समाज़ अमानवीय परम्पराओं और प्रथाओं कै दबाव में छटपटा रहा था। लोग न्याय और मानवता के सभी अहसास को छोड़ चुके थे। सबसे बुरी बात यह थी कि लोगों की सृजनात्मक प्रवृति को नज़रअंदाज किया जा रहा था।

19वीं सदी का समाज सुधार आंदोलन कुछ हद तक एक पारम्परिक समाज का पश्चिमी प्रभाव का जवाब और उपनिवेशिक शक्तियों को चुनौती था। क्योंकि बंगाल में पश्चिमी प्रभाव सबसे पहले महसूस किया गया, इसलिए पश्चिमी शिक्षा प्राप्त बंगालियों ने सबसे पहले विद्रोह का झंडा उठाया।

लगभग इसी समय भारतीय समाज का सम्पर्क ईसाई मिश्नरियों से हुआ। ऐलेक्जैंडर डफ, विलियम कैरी जैसे मिशनरियों ने अपने शिक्षा संस्थानों से अपने धर्म का प्रचार किया और उन्होंने इसे फैलाने के लिए अपना पूरा पैसा और शक्ति लगा दी। मिश्नरी हिन्दूवाद को अन्धविश्वास और क्रूर प्रथाओं की जड़ मानते थे और ईसाई धर्म को आदर्श बताते थे। हालांकि, मिशनरी एक बड़े जनसमूह का धर्म परिवर्तन करने में असफल रहे, लेकिन उनके, उत्साह का एक दूसरा परिणाम सामने आया और वह यह कि इससे जागरूक भारतीयों में,अपनी आस्थाओं और धर्म के प्रति जिज्ञासा पैदा हुई। इससे एक बार फिर, वेद को पढ़ने धर्मक प्रचलता प्रथाओं को, बर्थात् प्रचलता हिंदूवाद के सही धर्म मानने से इंकार कर दिया l

. .

स्वयं इंग्लैंड में 19वीं सदी एक बड़े परिवर्तन का दौर रही। यह सुधार विधेयक, गुलामी प्रथा को खत्म करने और नारियों के उत्थान का युग था। पील, विलियम ग्लैडस्टोन, बैंजामिन डिज़रैली जैसे महान् प्रधानमंत्री तथा फलोरेन्स नाइटीगेल और एलीज़ाबेथ फ्राइ जैसे सामाजिक कार्यकर्ता भी इसी युग में हुये। अंग्रेज़ी पढ़े हुए भारतीय लोगों पर भी इंग्लैंड में हो रहे परिवर्तनों का काफी प्रभाव पड़ा। भारत में अंग्रेजी शिक्षित बुद्धिजीवी वर्ग में इसी दौरान चेतना पैदा हुई। राजा राममोहन राय ने ब्रह्मों समाज के नाम से बंगाल में समाज सुधार आंदोलन चलाया, जो हिन्दुओं में उस समय की प्रचलित कुप्रथाओं का विरोध करता था। अक्षय कुमार दत्त, ईश्वरचंद विद्यासागर, देवेन्द्रनाथ टैगोर, माइकेल मधुसूदन

बंगाल में हिन्दवाद के नाम पर अन्याय और अन्धविश्वास के खिलाफ लड़ाई में अपने

, उत्कृष्ट कार्यों के लिए प्रसिद्ध हैं।

परिवर्तन की इच्छा देश के दूसरे भागों में भी जागृत हुई। पश्चिमी भारत में गोपाल

सलिगन, और नारायण गुरूस्वामी पश्चिम भारत में दयानंद सरस्वती और सैयद अहमद खान इन क्षेत्रों के कुछ प्रमुख सुधारक थे। इन सुधारकों के आंदोलन प्रयासों और इनके द्वारा चलाए गए आदोलनों से भारतीय समाज में चेतना जागी।

भाग में हाम 19वीं सदी के समाज सुधारकों के बीच के समूान विचारों की ओर ध्यान

यह चर्चा प्राय: होती है कि सुधारक पुनरुत्थानवादी थे या नहीं। एक तरह से वे दोनों थे, सुधारक भी और पुनरुत्थानवादी भी। वह हमारे अतीत को अच्छी चीजों को करना चाहते थे और साथ ही मौजूदा अमानवीय और अतार्किक परम्परा को छोड़ देना या सुधारना चाहते थे। जो लोग भूतकाल की ओर लौटना चाहते थे, उनका उपहास करते हुए रानाडे ने सवाल किया, “जब हम अपनी संस्थाओं और परंपराओं को पुनर्जीवित करना चाहते हैं’इतिहास के क्रिस खास काल को पुराना माना जाएगा? रानाडे ने इंगित किया कि कैसे परंपराएं और उनके व्यवहार में निरंतर बदलाव हो रहे हैं। दूसरी बात, अतीत के प्रचलनों का मात्र अंधा पुनरुत्थान न बुद्धिमतापूर्ण और न ही व्यवहारिक है। रानाडे ने

क्या हम चाहेंगे कि ब्राह्मण पुराने दिनों की तरह भिखारी बन जाएं और राजाओं कि कोई भी पुनरुत्थानवादी अब उन चीजों को फिर से इस्तेमाल करने की

। कर सकेगा,” ऐसा रानाडे का कहना था।

अतीत का पूरी तरह परिन्याग नहीं किया, बल्कि अतीत की कुछ परम्पराओं के बुरा नहीं माना। वे इस अर्थ में पुनरुत्थानवादी नहीं थे, कि वे हमारे काफी हद स्वर्णकाल में हर चीज़ का बखान करें। उन्होंने अतीत को आलोचनात्मक

 

सचेत लोग थे, जिन्होंने महसूस किया कि यदि अतीत की ओर लौटना न संभव है

योग्य, तब अतीत से पूर्ण विलगाव भी असंभव और अवांछनीय था। पुरानी और नई परिस्थितियों में सामंजस्य के पक्षधर थे। पश्चिमी

और भारत के एक सुधारक न्यायमूर्ति तेलंग के शब्दों में, “ये हरेक का कर्तव्य है कि वह अतीत को समझे और उसका मूल्यांकन करे और उसमें से उन चीजों को ही चुने जो संभव हो और आज की बदली हुई परिस्थितियों पर लागू हो। यह सब कुछ संयम, बुद्धिमत्ता और सही दिशा के साथ किया जाना था।

3.3.2 परिवर्तन और सुधारक का विचार सुधारक विकास, परिवर्तन और प्रगति के नियम में विश्वास करते थे। वे कर्म अथवा पुनर्जन्म के हिन्दू सिद्धांत के आलोचक थे, जिसके अनुसार वर्तमान दुर्दशा को हमारे पिछले जीवन के कार्यों (कम) का कारण बताया जाता था और “माया” का विचार अथवा भौतिक संसार के भ्रांतिपूर्ण विचार के कारण ऐसे विश्वासों से लोग जीवन को निष्क्रिय होकर कबूल कर लेते थे, जो उनकी सृजनात्मक क्षमता को खत्म कर देता था। इसके बजाय सुधारक मानते थे कि व्यक्ति अपनी प्रगति को स्वयं तय कर सकता है और वह परिवर्तन का कारण भी स्वयं है। यह मानना कि हमारा वर्तमान हमारे अतीत से तय हुआ है और इस कारण हमें इसे चुपचाप स्वीकार कर लेना चाहिए का अर्थ हुआ, एक प्रेरणाहीन आदर्श में विश्वास करना, जो कि केवल यथास्थिति को बना कर रखेगा।

सुधारक प्रगति में विश्वास करते थे। दरअसल गोपाल कृष्ण गोखले प्रगति को एक ऐसा क्रांतिकारी विचार मानते थे, जिसे हमने पश्चिम से पाया। कोई व्यवस्था जो परिवर्तन से इंकार करती हो, और नई परिस्थितियों के अनुकूल अपने को नहीं ढालती हो, तो वह समाज की सुरक्षा और सेवा करने की बजाय उस पर बोझ बन जाती है।

सुधारकों ने भारतीय समाज के उन क्षेत्रों को बदलने की कोशिश की, जहाँ यथास्थिति न केवल समाज पर एक बोझ थी, बल्कि इससे राजनीतिक दमन और पिछड़ापन पैदा हो गया था। सुधारकों के लिए प्रगति और परिवर्तन जीवन, जीवंतता और सृजनात्मकता के चिहन थे। रानाडे ने सामाजिक सुधार विचारधारा के इस पहलू का उपसंहार किया जब उन्होंने देखा कि “जिस परिवर्तन की हमें कोशिश करनी चाहिए वह परिवर्तन प्रतिबंध से स्वतंत्रता, भोलेपन से आस्था, हैसियत से अनुबंध, सत्ता से विवेक, असंगठित से संगठित जीवन, धमन्धिता से सहिष्णुता, अंधभाग्यवाद से मानव सम्मान की भावना के लिए पूी,गमाज विकास का अर्थ, मैं समझता हूँ, इस देश के लोगों और समाज दोनों

3.3.3 व्यक्ति तमाम चीजों के केन्द्र के रूप में

समाज सुधार विचारधारा व्यक्ति को तमाम लोक प्रयासों का केन्द्र मानती थी। समाज अपने सदस्यों के चारों तरफ घूमता है। इस दुनिया में व्यक्ति का कल्याण और सुख ही तमाम सामाजिक सुधारों का मुख्य प्रेरणा स्रोत बना। उदाहरणस्वरूप, सुधारक सनातनियों के इस तर्क को मानने से इंकार करते थे कि सती होना अगले जन्म में महिलाओं के लिए अच्छा साबित होगा। वे सती के खात्मे की वकालत करते थे, क्योंकि इससे महिलाओं को बहुत दु:ख और पीड़ा पहुंचती थी। इस मायने में, सुधारक व्यक्तिवाद के पश्चिमी बैंथम के उपयोगितावाद सिद्धांत से, बहुत ज्यादा प्रभावित थे।

सामाजिक सुधार के मुख्य लक्ष्य थे व्यक्ति की पुर्नखोज, उसकी बुद्धि को मुक्त करके उसे एक बार फिर एक मुक्त, सूजनात्मक ओर खुशहाल व्यक्ति बनाना। सुधारकों ने इस सोच को नकारा कि कोई काम सिर्फ इसलिए न हो क्योंकि मात्र सत्ता (पुजारियों या शास्त्रों) ने वैसा करने का आदेश दिया हो। सुधारकों ने इस बात पर जोर दिया कि कोई भी काम तब ही किया जाना चाहिए जब कि वह तर्क संगत हो और वह मानवता की वर्तमान समृद्धि और सुख के लिए हो। दूसरे शब्दों में, उन्होंने मध्ययगीन संगठन का सिद्धांत जो कि सत्ता

H पर आधारित था, उसे नकारा और बदले में एक सुधरे हुये संगठन की वकालत की, जो कि तर्क पर आधारित हो।

और

इसका अर्थ यह नहीं होता कि सुधारक धर्म या धार्मिक सत्ता के खिलाफ थे। वे तो सिर्फ विरोध कर रहे थे, उस अन्धी प्रवृति का जो कि धर्म के नाम पर कुछ लोगों द्वारा कही गयी हर बात को मानने की सूचक थी। जैसे रानाडे उपदेश देते कि हम भगवान की संतान हैं, मनुष्य की नहीं, और सिर्फ भगवान की आवाज ही हम सुन सकते थे। इसीलिए, हम

हैं। उनका तर्क था कि इस श्रद्धा और सम्मान को आत्मा की आवाज में आड़े नहीं आना चाहिए। यह अपने भीतर की विवेक की आवाज है जिसे उन्होंने हमारे भीतर के ‘आदेश” कहा l

क्या राजनीतिक सुधार से पहले सामाजिक सुधार होने चाहिए?

एक सवाल जो बार-बार सुधार के काल में और आज़ तक उठाया जाता रहा है, वह यह है:

मत जो बम्बई के विख्यात पारसी सुधारक मलवलि द्वारा प्रतिपादित किया गया, वह यह था कि राजनीतिक सधार के पूर्व सामाजिक सुधार जरूरी है। यह तर्क दिया गया कि राज्य परिवार पर आधारित है और इसलिए, राज्य को सुधारने के पूर्व यह कोशिश की जानी चाहिए कि परिवार को सुधारा जाये। ऐसे लोग जिनके परिवार दूषित हों, जिनकी महिलाएं अज्ञानी और अंधविश्वासी हों, जो तमाम पूर्वाग्रहों की बेड़ियों में बंधे हों और क्रूर और अमानवीय परम्पराओं को झेल रहे हों, कभी भी उच्च राजनीतिक विशेषाधिकारों को भोगने या उपयोग करने की आशा अभी नहीं कर सकते हैं। इस मत का विश्वास था कि राजनीतिक सुधार (स्व-शासन) की कोई भी कोशिश निश्चित रूप से निराशापूर्ण होगी। इसका मतलब यह नहीं है कि सामाजिक सुधारक राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ थे या अंग्रेजों को भारत के बाहर कर रहे थे। वे स्व-शासन के पक्ष में थे, परन्तु महसूस करते थे कि असली राजनीतिक स्वतंत्रता या स्व-शासन तब ही संभव हो सकता है, जब समाज में नैतिक सुधार हों, और वह जातीय अयोग्यताओं और अंधविश्वासों से अपने आपको मुक्त करें। जैसा राजा राममोहन राय ने तर्क दिया, अंग्रेजी शासन के कुछ प्रशासनिक तरीके प्रतिबंधित करने लायक थे। परन्तु, लोगों की सामाजिक परिस्थितियाँ, जो अतार्किक और

उनके आदेशों को दूषित करती हैं, निश्चित रूप से ज्यादा बुरी थीं। इसीलिए, उन्होंने अंग्रेजों से संबंधों का न केवल स्वागत किया, बल्कि एक अल्पकालिक सुधार के तरीके के रूप में इनकी हिमायत भी की। गोखले यह भी मानते थे कि अंग्रेजी शासन हमारा ‘सौभाग्य” था जो भारतीयों को खुद को सुधारने की वैदिक योजना का एक हिस्सा था।

इसके स्थ ही, यह कहना भी गलत होगा कि सामाजिक सुधारकों ने समाज के विभिन्न पहलुओं के बीच के अन्तसबंधों को महसूस नहीं किया। वे इस तथ्य के प्रति पूरी तरह सचेत थे। यह वात रानाडे के शब्दों से साफ हो जाती हैं, “आपके पास तब तक एक अच्छी

हाशिए में नीचे पाते हैं, न ही आप राजनीतिक अधिकारों का उपयोग करने के लायक हैं। जब तक आपकी सामाजिक व्यवस्था तर्क और न्याय पर आधारित नहीं हों, आपके पास एक अच्छी अर्थव्यवस्था नहीं हो सकती। और जब आपकी सामाजिक व्यवस्था अपूर्ण हो। अगर आपके धार्मिक आदर्श निम्न या भ्रष्ट हो गए हों, आप सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक क्षेत्र में कामयाब नहीं हो सकते यह अन्तर निर्भरता कोई संयोग नहीं है, बल्कि हमारी ही प्रकृति का नियम है।” किन्तु, उनका मोटा नज़रिया कम से कम, विरोध का था। के.टी. तेलांग ने इस रणनीति की कुछ इस प्रकार से व्याख्या की ‘पहले उन सुधारों को प्राप्त करो, जो आसानी से हो जाएं और तब अपने प्रयासों को उन सुधारों की दिशा में लगाओ यहाँ ज़्यादा परेशानियां आड़े आएंगी। इस प्रकार कामियाबी से आपको सुधार के लिए ताकत मिलेगी, इस तरह बड़ी तेजी के साथ प्रगति का काम हो सकेगा, दूसरे ढंग से काम करने पर शायद न कर पाएं।” ●

इस काल के दूसरे महान् व्यक्ति दादा भाई नौरोजी, जो आमतौर पर “भारत के ग्रैंड ओल्ड मैन” के नाम से जाने जीते थे, ने कहा कि हमें अलग-अलग दोनों सुधारों, राजनीतिक और सामाजिक, के लिए काम करना होगा। दादा भाई ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को उन्हीं समस्याओं को उठाना चाहिए जिसमें सब लोगों का समान हित हो न कि ऐसी समस्याओं को जिनसे आपसी द्वंद्व बढ़ने की सम्भावना हो। दादा भाई उस आक्रमणशील प्रचार के खिलाफ बोल रहे थे, जो मलबारी ने ‘एज ऑफ कॉन्सेन्ट बिल’, जिसमें भारतीय लड़कियों के विवाह की न्यूनतम उम्र निर्धारित करने की वकालत थी, के विरोध में भारत और इंग्लैंड में किया था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को संबोधित अपने प्रसिद्ध अध्यक्षीय भाषण में दादा भाई ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को उन्हीं सवालों तक सीमित रखना चाहिए जिसमें पूरा राष्ट्र सीधे तौर पर या गा स्व-शासन की मांग और सामाजिक सुधार ऐसे ही मुद्दे हैं अन्य वर्गीय सवालों के समन्वय को उससे संबंधित संगठनों के स् ‘ के लिए छोड देना चाहिए।सामाजिक सुधार के तरीके 19वीं सदी के सधारक यह अपेक्षा करते थे कि राज्य सामाजिक सुधारों में सहायता करेगा, यद्यपि यह कहना गलत होगा कि सुधारक विधेयक को सामाजिक सुधारों का एकमात्र तरीका मनाते थे तथा वे विधेयक के बारे में अति उत्साही थे। अपने समय के महान सधारक, बड़ौदा के गायकवाड़ सैयाजी राव ने कहा, विधेयक और अनुनय सुधार के दो बड़े तरीके प्रतीत होते हैं। विधेयक अनुनय से तेज और आसान है, लेकिन ये सिर्फ कुछ खास बुराइयों को रोक सकता है और इसके प्रभाव और समग्रता कम होते हैं इसके अलावा, कुछ मायनों में यह हमारे राष्ट्रीय मन:स्थिति के ज्यादा अनुकूल दिखता है, जो यूरोप के कुछ महाद्वीपीय लोगों से मिलता-जुलता है जो लोकप्रिय महलकदमों को सरकारी कार्यवाहियों से

हैं से नहीं निपट सकते इससे सिर्फ शिक्षा निपट सकती है।

एक बात निश्चित है। सुधारक, तिलक जैसे जुझारू राष्ट्रवादियों के इस तर्क को मानने के लिए तैयार नहीं थे जिसमें वे राजनीतिक स्वायत्तता या स्वशासन पर जोर देते थे और जिसमें उन्होंने सुधारकों द्वारा अपनी परम्परा, संस्थाओं और प्रचलनों की निरन्तर आलोचना करके अपने राष्ट्रीय गौरव को कमजोर व बबांद करने की बात की। उदाहरणस्वरूप तिलक राज्य के हस्तेक्ष की न्याय व मानवता के लिए आवश्यक मानते थे, भले ही शास्त्र राज्य के सुधारवादी हस्तक्षेप का विरोध करते हों। तिलक का तर्क था कि भले ही 1858 के उद्घोषणा द्वारा भारत में ब्रिटिश सरकार ने धार्मिक मामलों में तटस्थ रहने की कसम खाई हो, इससे संप्रभु को यह अधिकार नहीं मिलता कि वह जनता को अंवांछनीय नुकसान से न बचाकर अपने सर्वोच्च कत्तव्य में लापरवाही की।

यह स्पष्ट है कि 19वीं सदी के सुधारवादी बड़े सर्तक लोग थे। वे न तो पश्चिमी जीवन का अन्धानुकरण करने वाले थे और न ही वे दु:साहसी क्रांतिकारी थे। वे धीमे, विकासशील और रचनात्मक परिवर्तन के पक्षधर थे। इस कारण हम पाते हैं कि वे सभी लोगों में चेतना लाने के लिए शिक्षा और उनके हृदय परिवर्तन पर जोर देते हैं। वे आधुनिक और पश्चिमी शिक्षा की अहमियत देते हैं क्योंकि उन्होंने इसकी विमोचनकारी भूमिका को सभझा था। पूर्वी भारत में जहां ब्रहम समाज ने स्कूल खोले वहीं पश्चिमी भारत में प्रार्थना समाज ने भी कुछ इसी तरह का काम किया। बड़ौदा के महाराजा ने अपने राज्य में प्राईमरी शिक्षा को मुक्त और आवश्यक कर दिया। जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा “बिना शिक्षा के बिना कोई भदेसाई ताह कोज सकता हैऔर बिना इसाके कई स्थाई प्रति कम नाहीं खी जा स् ”

तिलक ने मालवारी, जो इस बात के लिये बहुत उत्साही दिखायी पड़ते थे की पत्र में, लिखा कि “जनमत की शिक्षा के एक बड़ी सामाजिक शक्ति के रूप में मेरा विश्वास लगभग असीमित है और मेरा मानना है कि शिक्षा के परिणाम दीर्घकाल में न केवल स्थायी होंगे बल्कि, यह विरोधाभाषी लग सकता है, वे इस प्रकार के कृत्रिम उपायों के परिणामों जो आपके नोट में प्रभावित किये गये हैं, से काफी तेज होंगे।”

सुधारक मनुष्य के विवेक में आस्था रखते थे। वे मानते थे कि प्रत्येक व्यक्ति के विवेक में एक सार्वभौमिक विवेक निहित होता है और इस विवेक को शिक्षित और सम्पूर्ण किया जा सकता है। इसका अर्थ व्यक्ति की आत्म चेतना को जगाना तथा व्यक्ति के अच्छे व बरे के भाव को जगाना था। सभी समाज सुधारकों ने शिक्षा पर बहुत जोर दिया।

धार्मिक सुधार

19वीं सदी में धामैिक सुधार के प्रयासों के दो पक्ष थे। पहला पक्ष मूर्ति पूजन और धार्मिक अंधविश्वासों को दूर करना चाहता था और दूसरा एकेश्वरीय आदर्श प्रस्तुत करना चाहता था।

मूर्तिपूजा और अंधविश्वास की आलोचना

प्रारंभिक सामाजिक सुधारकों ने मूर्तिपूजन और बहु-ईश्वरीय मूर्ति पूजन के प्रति मूर्तिभजक रवैया अपनाया। उदाहरण के तौर पर ब्रहमोसमाज का प्रयास था कि हिन्दुवाद से मूर्ति पूजा को दूर किया जाए। उनका मानना था कि देवी-देवताओं की पूजा वैदिक काल में नहीं थी और बाद में शुरू हुई। बहुमूर्ति पूजा को इस आधार पर उचित ठहराया जाता था कि इसका असली मतलब एकेश्वरवाद है। राजा राममोहन राय ने इस तर्क को मानने से इंकार कर दिया क्योंकि रूढ़ीवादी हिन्दू के लिए सभी देवताओं का अलग-अलग अस्तित्व था। “राय का मान’ था कि कोई भी हिन्दू इन देवताओं की पूजा को मानसिक उत्थान का कारण नहीं भानता था जबकि वह इनकी सिर्फ पूजा की चीज मानता था।

जबकि मूर्तिपूजकों का तर्क था कि मूर्तिपूजन अहानिकर है। इससे लाभ होता है; कोई हानि नहीं है। सुधारकों ने जवाब में विभिन्न भगवानों की पूजा करने वालों की, जिनकी पूजा की विधि अलग-अलग थी, आपसी लड़ाई की ओर इंगित किया। पहले तर्क के जवाब में राजा राममोहन राय ने ‘ये भक्तगण अपने विश्वासों के प्रति इतने दृढ़ हैं कि जब ये हरिद्वार जैसे धार्मिक स्थान पर भी मिलते हैं तो अपनी-अपनी वरीयता का त्याग करने के लिए भी तैयार नहीं होते और गाली-गलौच और मारपीट तक करने लगते हैं।” दूसरे तर्क के संबंध में बंगाली सुधारकों ने कृष्ण और काली की पूजा का उदाहरण दिया जिसमें मनुष्यों और पशओं का बलिदान दिया जाता था और शराब और लाइसेंस व्यवस्था थी।

कुछ आलोचकों ने 19वीं सदी के सुधारकों और विशेषकर ब्रहमी समाज पर यह आरोप लगाया कि उस पर ईसाई धर्म का प्रभाव है और वह हिन्दूवाद का इसाईकरण करना चाहते हैं। यह आरोप सही नहीं है। सभी बंगाली सुधारकों ने हिन्दूवाद को मुक्त और विवेकसंगत करने की और उसको एक विवेकी आधार देने की कोशिश की थी ताकि हिन्दुओं को उनके अतीत से अलग किए बिना उनको सर्वागीण विकास के लिए उत्प्रेरित किया जा सके। इन सुधारकों की तुलना बेकन, डिग्रराइली और लूथर जैसे लोगों जिन्होंने मध्ययुगीन यूरोपीय समाज की जड़ों पर चोट की, से की जा सकती है। प्रारम्भिक बंगाली सुधारवादियों ने अपने

निरंकुशता और धर्म की अन्धभक्ति के खिलाफ आवाज उठाई।

नए ईश्वरवादी विचार 19वीं सदी के धार्मिक सुधार आंदोलन ने न केवल बहुमूर्ति पूजन की भत्सना की

इस्लाम के समान एकेश्वरवाद मत पर जोर दिया। उन्होंने इस प्रकार इस धर्म के त्रिदेव

के सिद्धांत का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि भगवान, उनके लड़के और पवित्र भावना को अलग-अलग मानना बेहूदा है। ब्रह्म समाज के अन्सार भगवान शास्वत, रहस्यमय अपरिवर्तनशील है और ब्रह्माण्ड का निर्माता व संरक्षक हैं। जाति, रंग-भेद और नस्ल किसी शर्त के बिना सभी मनुष्य उसकी आराधना कर सकते हैं। ब्रहम समाज ने दावा किया यह अवधारणा उपनिषदों में प्राचीन छन्दू संतों-साधुओं द्वारा लिखी हुई है। वह चाहता था कि हिन्दूवाद को सभी अन्धविश्वासों और अमानवीय प्रथाओं से मुक्त कर के पवित्र रूप में पुनस्थापित किया जाए। इसने मूर्तिपूजन की आलोचना करते हुये सभी धर्मों के भक्तों को एक भगवान की पूजा करने को कहा।

सुधारकों ने नैतिकता से बंधी हुई सभी प्रथाओं पर हमला किया। क्योंकि इनका मुख्य आधार जाति था। इसलिए सुधारकों ने इसी को मुख्य निशाना बनाया। जाति से लड़ने के लिए सुधारकों ने दोतरफा नीति अपनायी, उन्होंने पहले तर्क दिया कि जाति पवित्र और आदम धर्म का हिस्सा नहीं थी बल्कि यह बाद में एक हानिकारक रूप में विकसित हुई। राजा राममोहन राय ने महा निर्वाण का हवाला देते हुए बताया कि जाति शादी के लिए बंधन नहीं है न ही यह समाज के संगठन के लिए जरूरी है। उन्होंने कहा ‘ उम्र, जाति, और नस्ल का विवाह के लिए कोई बंधन नहीं है।”

जाति व्यवस्था पर प्रहार

ईश्वर द्वारा दिये गये बड़े भाग्य को पूरी करेगा। इससे बड़ा सत्य नहीं हो सकता कि जाति व्यवस्था, जो सभी सामाजिक बुराइयों की जड़ है, को नष्ट करके ही इस ऊँचे भाग्य

को प्राप्त किया जा सकता है।

सधारकों ने न केवल आलोचना की और उपदेश दिये बल्कि अपने-अपने तरीके से कभी-कभी अति उग्र तरीके से स्वयं पर इन सुधारों को लागू किया। उदाहरण के लिये देवेन्द्र नाथ टैगोर ने जनेऊ पहनना छोड़ दिया और एक गैर ब्राह्मण को समाज में मंत्री ; नियक्त कर दिया और उन सभी ब्राह्मण मंत्रियों को जो जनेऊ पहनने की जिद ठाने थे, निकाल दिया। केशवचन्द्र सेन ने खुलेआम अन्तजांतीय विवाह को बढ़ावा दिया और अपनी लडकी की शादी अपनी जाति के बाहर की।

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कैसे प्रथा और स्वाभाविक रूप से बंगाली सुधारकों ने अपना पूरा ध्यान इसको दूर दिया। अंग्रेजी प्रशासन नारियों की समस्याओं में, विशेषकर पेशवा राज्य को हथियाने के बाद हस्तक्षेप करने से हिचकिचा रहा था। 1812 और 1817 में ब्रिटिश प्रशासकों ने सती प्रथा में हस्तक्षेप किया था और

सामने आये और 1818 में उस ज्ञापन के विरोध में एक ज्ञापन दिया, जिसमें उन्होंने सती से जुड़ी कूर-प्रथाओं का वर्णन किया और इसे हत्या बताकर निंदित किया।

अपने ज्ञापन में राजा ने लिखा कि किस तरंह महिलाओं को उनके निकट संबंधी सती होने के लिये राजी करते थे और किस तरह महिलायें अपने द:ख के पहले क्षणों में सती होने के लिये तैयार हो जाती थी और बाद में किस तरह उन्हें हरे बांसों व रस्सियों से बांधकर चिता पर चढ़ा दिया जाता था।

सती के विरूद्ध अपनी लड़ाई में सुधारक अपने विरोधियों के खिलाफ धर्म ग्रन्थों का उपयोग करने में जरा भी नहीं हिचके राजा राममोहन राय ने मनु यज्ञनवलक्य और दूसरों का संदर्भ देते हुए दिखाया कि सती होना जरूरी नहीं था। वास्तव में मनु ने नारियों के लिये सुझाव दिया “उन्हें स्वेच्छा से शुद्ध फूल, जड़ और फलों” पर निर्भर रहना चाहिए तथा ‘दूसरे पुरुष का नाम नहीं लेना चाहिए”। राजा राममोहन राय का मानना था कि मनु के ऐसे विचारों के अनुसार नारियों के लिए सती होना आवश्यक नहीं था।

राजा राममोहन राय ने संती की निन्दा करते हुए बंगाली में कई पर्चे निकाले। बंगाली सुधारकों ने रूढ़िवादी हिन्दुओं द्वारा सती के पक्ष में दिये सभी तकों जैसे सती न करने पर पशु के रूप में पुनर्जन्म, सती होने का मतलब अपने पति के साथ अनन्त काल तक सुख

स्वतन्त्रता, कानून और तर्क अधिकांशा सधारक पश्चिमी ज्ञान से प्रभावित थे। कान्ट व मिल जैसे पश्चिमी दाशनिकों ने उन्हें खास तौर पर प्रभावित किया। रानाडे, जो कान्वादी नैतिकता से बहुत प्रभावित थे, के लिए स्वतंत्रता या स्वाधीनता का अर्थ नैतिक इच्छा की स्वतंत्रता था। तमाम प्राणियों में सिर्फ मनुष्य ही अच्छे और बरे के बीच भेद करने की क्षमता रखता है और इसलिए उसे

का अर्थ है अपने भीतर ईश्वर की आवाज के प्रति उत्तरदायी होना है”। उदारवादियों के लिए स्वतंत्रता का अर्थ किसी इच्छित वस्तु की आकांक्षा की आजादी नहीं थी। बल्कि उनका मानना था कि स्वतंत्रता का मतलब स्वेच्छा से हीन मनोभावों और आकांक्षाओं की अपने उच्च स्वभाव (नैतिक आत्मा) के लिए छोड़ना था। वे राज्य और समाज को सार्थक सिर्फ इसलिए मानते थे कि ये इस तरह की नैतिक स्वतंत्रता के विकास में योगदान करते थे। एक उदारवादी समाज अपने नागरिकों को खुद की चेतना के अनुरूप रहने की स्वतंत्रता

राजनीतिक वातावरण उपलब्ध कराते हैं। स्वतंत्रता को इस प्रकार को समझ से राजनीतिक वातावरण पैदा होता है। स्वतंत्रता की इस समझ का तर्क या कानून से विरोधाभास नहीं है।

संविधानवाद और प्रतिनिधि सरकार भारतीय उदारवादी सुधारक कई चीजों के लिए राज्य की ओर देखते थे। किन्तु साथ ही वे यह भी जानते थे कि निरंकुश सत्ता शासकों को भ्रष्ट और पतीत करती है। इसी वजह से । वे केन्द्रीकरण के विरोधी थे और सांविधानिक व्यवस्था, जिसमें सरकार जनता के प्रत्येक सरकार को कानून के अनुरूप होना चाहिए, न की स्वेच्छाचारी। इसे विकेन्द्रीयकृत होना चाहिए। सुधारकों का यह दृष्टिकोण जान स्टूअर्ट मिल के दर्शन जिसका मानना था कि सरकार जनता की अधिक से अधिक भागीदारी की जिम्मेदारी राजनीतिक शिक्षा के रूप में ले, के अध्ययन से लिया गया था। गोखले ने रायल कमीशन के समक्ष विकेन्द्रीकरण पर

उन्हें (जनता को) खुद लगाम थामने की इज़ाजत होनी चाहिए।। उदारवादियों ने नौकरशाही से अपने पर थोपे गए अस्वस्थ विलगाव तथा ब्राहमण होने के । उच्च जातीय दृष्टिकोण को त्यागने की अपील की। नौकरशाही को भारतीय जनमत के 4 प्रति संवेदनशील होना चाहिए और गोपनीयता के अपने पर्दे को हटा देना चाहिए। गोखले

ने आफीशियल सीकेट एक्ट, 1903 पर बोलते हुए सरकार से अनुरोध किया कि वह बहुत भरिएवय सारे गोपनीय सरकूलर न निकाले क्योंकि सरकारी गोपनीयता से अफवाह बढ़ती है जिससे कि जनता के बीच सरकार की छवि खराब होती है। उदारवादियों ने बार-बार नौकरशाही से अनुरोध किया कि वह ज्यादा जिम्मेदार बने और जनता के साथ ज्यादा घुले मिले।

उदारवादियों ने राजनीतिक और प्रशासनिक सुधारों की वकालत की जिससे जनता की भागीदारी बढ़ सके। उन्होंने म्युनिस्पल सरकारों को मजबूत करने की हिमायत की तथा जिला सलाहकार परिषदों के गठन की अपील की। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और दादाभाई नौरोजी । जैसे लोगों ने उच्च सेवाओं में भारतीयों के रोजगार के सवाल पर ध्यान केन्द्रित किया और

उसे उन्होंने स्वतंत्र और बराबरी की प्रतियोगिता परीक्षाओं में भर्ती के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा को भारतीय संघ के प्रशासन के साथ जोड़ा। सेवाओं के भारतीयकरण का तक आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक आधारों पर था। सेवाओं से भारतीयों को अलग रखने का अर्थ न सिर्फ विदेशी नौकरशाहों को वेतन और पैशन की अदायगी के रूप में न केवल भारतीय धन का बाहर जाना था बल्कि, जैसा दादा भाई नौराजी ने बताया इसका परिणाम ‘एक कौम का बौनाकरण” था। लोगों की योग्यताओं के दरुपयोग के कारण उनकी क्षमताएं घट रही थी तथा जनता अंग्रेजी शासन और सरकार में विश्वास खो रही थी।

राजनीतिक चेतना और भागीदारी की बढ़ाने के लिए उदारवादियों ने विभिन्न संघों की स्थापना की। बंगाल में ब्रिटिश इंडिया एसोसिएशन और इंडियन एसोसिएशन। जगन्नाथ शंकर सेठ और दादाभाई नौरोजी ने बंबई में बाम्बे एसोसिएशन शुरू की। पुणे में चिपलंकर और अन्य लोगों ने सार्वजनिक सभा शुरू की स्थापना की। 1882 में एलेन ओकटेवियन ह्यूम नामक एक अंग्रेज ने राष्ट्रीय कांग्रेस बनाने में पहलकदमी की। कलकत्ता , विश्वविद्यालय के स्नातकों को एक खुली चिट्ठी में उन्होंने कहा, ‘आप सबसे शिक्षित । भारतीयों के एक बड़े तबके का हिस्सा हैं, इसीलिए स्वाभाविक तौर पर आपको भारत के तमाम बौद्धिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास का हिस्सा जानना पड़ेगा।” अपने स्थापना काल से ही कांग्रेस ने भारतीय उदारवादियों को आकर्षित किया और बहत बड़े नाम इससे जुड़ गए थे। 1906 तक दादाभाई नौरोजी इसके प्रभावशाली व्यक्ति थे। 1885 और 1905 के बीच गोखले फिरोजशाह मेहता, डब्ल्यू.सी. बनर्जी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी,

  • बदरुद्दीन तैयब्जी, के.सी. तेलांग, आर.सी.दत्त और राशबिहारी घोष जैसे अन्य दिग्गज कांग्रेस से जुड़े हुए थे। ये तमाम उदारवादी स्वशासन की ओर एक निश्चित लेकिन धीमे

के ढाँचे के तहत स्वशासन जैसे विषयों पर एकमत थे।

उदारवादियों की यह राजनीतिक आकांक्षा थी कि भारत के विभिन्न समुदाय जैसे हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई, परसी, एक साथ सबसे उच्च राजनीतिक संस्था, इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल से लेकर स्थानीय निकायों और नगरपालिकाओं तक, में काम करें। उदारवादी इस बात के विषय में आस्वास्त थे कि अगर भारतीय जनता की सरकार में बराबर का हिस्सेदार नहीं माना गया तो वह सिर्फ सरकार के आलोचक बन जाएंगे और जैसा गोखले ने कहा, एक बार स्वस्थ आलोचना की हद हो जाएगी तब सिर्फ अस्वस्थ आलोचना ही होगी।

आर्थिक राष्ट्रवादी और लोक कल्याणकारी राज्य का विचार

19वीं सदी के उदारवादियों ने ब्रिटिश धार्मिक नीतियों की जबरदस्त आलोचना का भी विकास किया था और राज्य के हस्तक्षेप से आर्थिक पुनर्रचना के लिए पृष्ठभूमि तैयार की थी। रमेश दत्त जैसे आलोचकों ने साफ तौर पर अनुभव किया कि कैसे भारतीय बाजारों के विकास की ब्रिटिश नीति उसमें उद्योगों के लिए तथा देश के लिए विनाशकारी साबित हो रही थी। ब्रिटिश नीति के कारण न सिर्फ भारतीय शहरी हस्तकलाओं का विनाश हो रहा था बल्कि उसने बेरोजगार शहरी काश्तकारों को गांव जाने के लिए मजबूर किया। जिसके परिणामस्वरूप भारतीय कृषि पर दबाव बढ़ गया, जमीन का और ज्यादा बेंटवारा हुआ, गैर उत्पादक कर्ज की बढ़ोतरी (अपव्ययी का और बेईमान उधार के कारण) हुई जिससे अतंत आमतौर पर गैर खेतीहरों की जमीन का हस्तांतरण हुआ।

की अवधारणा देने के लिए उदारवादियों के आभारी हैं। सरकार को ज्यादा खुला और कम गोपनीय होने की उनकी सलाह, नौकरशाही को ज्यादा जवाबदेह होने और जनता संवैधानिक तरीकों की प्रभावोत्पादकता के प्रति आस्थावान होने की सलाह और दूरगामी सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक लक्ष्यों को पाने में शिक्षा की भूमिका, आज भी हमारे

लिए सार्थक है।

शब्दावली

सकारात्मकवाद : वह सिद्धांत जिसके अनुसार धर्मशास्त्र और पराभौतिकी ज्ञान के प्राचीन ! एवं अपूर्ण तरीके हैं और सकारात्मक (सच्चा) ज्ञान प्रमाणयोग तथ्य, अवलोकन और प्रयोग । पर आधारित होता है।

सनातनी : राय ने इस शब्द का इस्तेमाल सुधारों के कट्टरपंथी विरोधियों, जिनका विश्वास था कि प्राचीन (धर्मग्रंथ) विवेक बाहय और अपरिवर्तनशील, के लिए किया है। एकात्मकतावाद : यह विचार जिसका विश्वास है कि भगवान तमाम चीजों में व्यापक है । और तमाम चीजें भगवान में विलीन हो जाती हैं। , नीतिशास्त्र : नैतिक सिद्धांत, कर्तव्य और दायित्वों से संबंधित विषय।

फरलो : खासकर सिपाहियों को उनकी अनुपस्थिति में छुट्टी देना।

 उपयोगी पुस्तकें

चाल्स एच. हेमसेथ, इंडियन नेशनलिज्म एण्ड हिन्दू सोशल रिफार्म, प्रिंसटन युनिवर्सिटी प्रेस, यू.एस.ए., 1964

शंकर घोष, 1984, मॉर्डन इंडियन पॉलिटिकल थॉट, एलाईड पब्लिशर्स, नई दिल्ली। पी.जे. जागीरदार, 1963, स्टडीज़ इन बी सोशल थॉट ऑफ एम.जी, रानाडे, एशियन

ए.वी. शाह एण्ड एस.पी. अय्यर, 1966, गोखले एण्ड मॉर्डन इंडिया, (सेन्टीनरी लेक्चरस) (मानक तालास बंबई)। बी.बी. मजूमदार 1967, हिस्ट्री ऑफ इंडियन सोशल एण्ड पॉलिटिकल आईडियाज़, बुकलैंड, इलाहाबाद।

एम.ए. बुख, राईज एण्ड ग्रोथ ऑफ इंडियन लिबरलिज्म। बी. चंद्रा 1974, राईज ऑफ इकॉनामिक नेशनलिज्म इन इंडिया, नई दिल्ली। आर.पी. मसानी 1939, दादाभाई नौरोजी दी ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया, जॉर्ज एलेन, लदन।

एस.नटराजन, ए सेंचुरी ऑफ सोशल रिफार्मस इन इंडिया। बी.सी. जोशी (एडिटेड) राममोहन राय सोशल रिफार्मस इन इंडिया।

बी.सी. जोशी (एडिटेड) राम मोहन राय एण्ड दी प्रोसेज ऑफ मॉडिनाईजेशन दिल्ली, ‘ विकास पब्लिशिंग हाउस, पब्लिशड फॉर एन, एम.एम.एल., 1975.

 

 

 

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