संवैधानिक उपचारों का अधिकार

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चूंकि मौलिक अधिकार न्याय योग्य हैं, इसी तरह वे प्रत्याभूत हैं। ये प्रवर्तनीय हैं, यदि किसी व्यक्ति के मूलाधिकारों का उल्लंघन होता है। तो वह सहायता के लिए न्यायालय में जा सकता है। परंतु वास्तविकता ऐसी नहीं है। हमारे दैनिक जीवन में मूलाधिकारों का अतिक्रमण और उल्लंघन एक विचारणीय विषय बन गया है यही कारण है कि हमारा संविधान विधायिका तथा कार्यपालिका
को इन अधिकारों को प्रतिबंधित करने की अनुमति नहीं देता संविधान हमार मूलाधिकारों के संरक्षण के लिए कानूनी उपचार प्रदान करता है अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उल्लिखित उसे वैधानिक उपचारों अधिकार कहा जाता है यदि हमारे किसी मूलाधिकार का उल्लंघन होता है तो हम न्यायालय द्वारा न्याय की मांग कर सकते हैं हम सीधे उच्चतम न्यायालय में भी जा सकते हैं इन मूलाधिकारों केप्रवर्तन के लिए निर्देश, आदेश अथवा रिट जारी कर सकता है।संवैधानिक उपचारों का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 32 में अंकित है। इसके जरिए संवधिान द्वारा प्रदत्त तमाम मौलिक अधिकार नागरिकों को मिल सके,यह सुनिश्चित किया गया है। यह अधिकार अन्य अधिकारों को प्रभावी बनाता है। इस अधिकार के आधार पर कोई भी व्यक्ति अपने मौलिक अधिकारों को लागू करवाने के लिए सर्वाेच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। संवैधानिक उपचारों का अनुच्छेद नागरिकों के लिहाज से भारतीय संविधान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का शासन,प्रशासन,अथवा संस्था द्वारा हनन किया जा रहा है तो वह उच्च न्यायालय अथवा उच्चतम न्यायालय की शरण ले सकता है। उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय को इस संबध में कई प्रकार के निर्देश जारी करके नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करते हैं। इस अनुच्छेद की महत्व को देखते हुए ही संविधान के प्रमुख प्रारूपकार डा. भीमराव अंबेडकर ने संवैधानिक उपचार के अधिकार को भारतीय संविधान को ‘आत्मा और हृदय’ कहा है। जाहिर है,संवैधानिक उपचार का अधिकार के बिना भारत में नागरिक स्वतंत्रता की कल्पना करना बहुत मुश्किल है।

भारतीय संविधान की धारा 32 अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष, मूलभूत अधिकारों (fundamental rights) के उपभोग में बाधा प्रमाणित किए जाने के बाद न्यायालय अपनी शक्ति का प्रयोग करने के लिये बाध्य है, जबकि दूसरी ओर उच्च न्यायालय संविधान की धारा 226 के अनुसार उसकी शक्ति उसके विवेक के अधीन है तथा कतिपय अवसरों पर उसका प्रयोग नहीं किया जाता। यदि कथित आपतितजन्य अवैध कार्य द्वारा याचिकादाता (petitioner) को कोई प्रत्यक्ष हानि न होती हो तो उच्च न्यायालय अपनी शक्ति का प्रयोग न करने के लिये भी स्वतंत्र है। इसी प्रकार यदि याचिकादाता के लिये अन्य उपयुक्त वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध है, यदि वह छलयुक्त भावना से (with unclean hands) न्यायालय में उपस्थित होता है अथवा यदि वह अनावश्यक प्रमाद का दोषी है, तो इन दशाओं में साधारणत: न्यायालय याचिकादाता को अनुतोष (relief) प्रदान करना अस्वीकार कर देगा। न्यायालय उन दशाओं में भी हस्तक्षेप करना अस्वीकार कर देगा जबकि वांछित हस्तक्षेप के परिणामहीन तथा अनावश्यक होने की संभावना हो। उन अवसरों की विस्तृत तालिका देना सर्वथा असंभव है जिन दशाओं में उच्च न्यायालय अपनी शक्ति का प्रयोग करना अस्वीकार कर सकता है। प्रत्येक मामले की परिस्थिति, प्रकृति उद्देश्य तथा शक्ति के विस्तारय को दृष्टिगत रखकर ही न्यायालय अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग करेगा।

सामान्यत: मामले से प्रत्यक्ष रूप ते सम्बन्धित व्यक्ति ही सर्वोच्च न्यायालय अथवा उच्च न्यायालयों से उनकी शक्ति के प्रयोग की याचना कर सकता है किंतु यह नियम सर्वथा निरपवाद प्रतीत नहीं होता।

संविधानप्रदत्त मूलभूत अधिकारों के प्रवर्तन के लिये न्यायालय द्वारा जारी किए जानेवाले निर्देश, आदेश अथवा प्रादेश राज्य के नाम जारी किए जाते हैं। संविधान की धारा (12) में राज्य की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि संसद तथा केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार एवं राज्य विधान मंडल, भारतीय सीमांतगत स्थित अथवा भारतीय शासन के अधीनस्थ कार्य करनेवाले सभी स्थानीय अथवा अन्य अधिकारीगण (इस व्याख्या के अनुसार) राज्य की परिधि में आते हैं। बंदी प्रत्यक्षीकरण (उच्च न्यायालय द्वारा) उस व्यक्ति विशेष के नाम भी जारी किया जा सकता है जिसकी अवैध हिरासत में कोई व्यक्ति बंदी हो। राष्ट्रपति तथा राज्यपाल के आधिकारिक कार्यों (official acts) के विरुद्ध कोई निर्देश, आदेश अथवा प्रादेश जारी नहीं किया जा सकता है जिसकी अवैध हिरासत में कोई व्यक्ति बंदी हो। राष्ट्रपति तथा राज्यपाल के आधिकारिक कार्यों (official acts) के विरुद्ध कोई निर्देश, आदेश अथवा प्रादेश जारी नहीं किया जा सकता। संविधान की धारा 329 (ब) के अनुसार भारतीय संसद् अथवा राज्य-विधान-मंडल के निर्वाचन से सम्बन्धित अधिकारी की चुनाव सम्बन्धी आज्ञाओं में उच्च न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इसी प्रकार संविधान की 122 तथा 212 वीं धाराओं के अनुसार संसद् तथा विधानमंडलों के विरुद्ध, उनकी आन्तरिक गतिविधियों के मार्ग में बाधा उपस्थित कर उनकी आंतरिक कार्यवाहियों की अनियमितता तथा वैधता अवैधता की जाँच के सम्बन्ध में कोई आदेश उच्च न्यायालय जारी नहीं कर सकता।

संविधान के अंतर्गत बनाए गए कानूनों द्वारा सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालयों की शक्तियों को सीमित नहीं किया जा सकता। न्यायालयों की शक्ति की समाप्ति अथवा उनमें न्यूनता केवल संविधान में संशोधन करने के पश्चात् ही की जा सकती है। अथवा संविधान की धारा 359 (1) के अनुसार राष्ट्रपति मूलभूत अधिकारों का न्यायालयों द्वारा प्रवर्तन स्थगित कर सकता है। सारांश यह कि युद्ध अथवा बाह्य आक्रमणकाल में या देश की अथवा देश के किसी भाग की सुरक्षा खतरे में डालनेवाले किसी गृहसंकट के समय मूलभूत अधिकारों का न्यायालय द्वारा प्रवर्तन स्थगित किया जा सकता है। पर ऐसे समय में भी उच्च न्यायालयों के अधिकार प्रवर्तन की शक्ति – मूलभूत अधिकारों के प्रवर्तन की शक्ति को छोड़कर – अक्षुण्ण रहती है।


‘संवैधानिक उपचारों का अधिकार’ को डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान की आत्मा कहा है.
अनुच्छेद 32: इसके तहत मौलिक अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए समुचित कार्यवाहियों द्वारा उच्चतम न्यायालय में आवेदन करने का अधिकार प्रदान किया गया है. इस सन्दर्भ में सर्वोच्च न्यायालय को पांच तरह के रिट निकालने की शक्ति प्रदान की गई है जो निम्न हैं:
(a) बंदी प्रत्यक्षीकरण
(b) परमादेश
(c) प्रतिषेध लेख
(d) उत्प्रेषण
(e) अधिकार पृच्छा लेख

(1) बंदी प्रत्यक्षीकरण:
 यह उस व्यति की प्रार्थना पर जारी किया जाता है जो यह समझता है कि उसे अवैध रूप से बंदी बनाया गया है. इसके द्वारा न्यायालय बंदीकरण करने वाले अधिकारी को आदेश देता है कि वह बंदी बनाए गए व्यक्ति को निश्चित स्थान और निश्चित समय के अंदर उपस्थित करे जिससे न्यायालय बंदी बनाए जाने के कारणों पर विचार कर सके.
(2) परमादेश: परमादेश का लेख उस समय जारी किया जाता है, जब कोई पदाधिकारी अपने सार्वजनिक कर्तव्य का निर्वाह नहीं करता है. इस प्रकार के आज्ञापत्र के आधार पर पदाधिकारी को उसके कर्तव्य का पालन करने का आदेश जारी किया जाता है.
(3) प्रतिषेध लेख: यह आज्ञापत्र सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय द्वारा निम्न न्यायालयों तथा अर्द्ध न्यायिक न्यायाधिकरणों को जारी करते हुए आदेश दिया जाता है कि इस मामले में अपने यहां कार्यवाही न करें क्यूंकि यह मामला उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर है.
(4) उत्प्रेषण: इसके दवरा अधीनस्थ न्यायालयों को यह निर्देश दिया जाता है कि वे अपने पास लंबित मुकदमों के न्याय निर्णयन के लिए उससे वरिष्ठ न्यायालय को भेजें.
(5) अधिकार पृच्छा लेख: जब कोई व्यक्ति ऐसे पदाधिकारी के रूप में कार्य करने लगता है जिसके रूप में कार्य करने का उससे वैधानिक रूप से अधिकार नहीं है न्यायालय अधिकार-पृच्छा के आदेश के द्वारा उस व्यक्ति से पूछता है कि वह किस अधिकार से कार्य कर रहा है और जब तक वह इस बात का संतोषजनक उत्तर नहीं देता वह कार्य नहीं कर सकता है.

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