संविधान की उद्देशिका(Preamble)

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संविधान की प्रस्तावना में भारतवासियों की ओर से यह घोषणा की गई है कि भारत को एक प्रभुता संपन्न, लोकतंत्रीय गणराज्य (जिसे 42वें संशोधन द्वारा प्रभुतासंपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रीय गणराज्य कर दिया गया) बनाने का संकल्प करते हुए वे एक ऐसा संविधान अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मसमर्पित कर रहे थे जिसके अग्रलिखित उद्देश्य दृष्टि होते हैं

  • सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न : भारत आन्तरिक व विदेशी मामलों में किसी के अधीन नहीं है। वह पूर्णत: एक स्वतंत्र राष्ट्र है।  धर्मनिरपेक्षतावादी राज्य : भारत का कोई राष्ट्रीय धर्म नहीं हैं। प्रत्येक

व्यक्ति विशेष को अपनी पसंद के अनुसार धर्म चुनने की स्वतंत्रता है।  जनता की संप्रभुता : सत्ता का स्रोत जनता है। इसी के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि शासन करते हैं और ये प्रतिनिधि जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं।

  • न्याय की स्थापना : राज्य सभी को उचित न्याय उपलब्ध कराएगा चाहे वह सामाजिक हो, आर्थिक हो या राजनीतिक हो। स्वतंत्रता : विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म एवं उपासना की स्वतंत्रता। भारत एक गणराज्य:भारत में राज्य का अध्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपति होगा। स्वतंत्रता, समानता व बधुत्व , एकता और अखण्डता : देश की एकता व अखण्डता को बनाए रखना राज्य व जनता का प्रथम दायित्व होगा।
  • विशेषताएं :-
  •  यह संविधान का महत्वपूर्ण अंग नहीं है क्योंकि यह राज्य के तीनों अंगो को कोई शक्ति नहीं देती है। वे अपनी शक्तियाँ संविधान के अन्य अनुच्छेदों से प्राप्त करती है। इसी प्रकार यह उनकी शक्ति पर कोई रोक भी नहीं लगाती है।
  •  संविधान के किसी भाग पर यह कोई विशेष बल नहीं देती है संविधान के अनुच्छेद तथा इसमें संघर्ष होने पर अनुच्छेद को वरीयता मिलेगी।
  • न्यायालय में इस के आधार पर कोई वाद नहीं लाया जा सकता है न ही वे इसे लागू कर सकते है।
  • इस कारण इसे कई बार मात्र शोभात्मक आभूषण भी कहा गया है। सर्वोच्च न्यायालय भी इस की सीमित भूमिका मानता है इसका प्रयोग संविधान में विध्यमान अस्पष्टता दूर करने हेतु किया जा सकता है।
  • यह बताती है कि संविधान जनता के लिए हैं तथा जनता ही अंतिम सम्प्रभु है।
  • उद्देशिका लोगो के लक्ष्यों-आकाक्षओं को प्रकट करती है।
  •  इसका प्रयोग किसी अनुच्छेद में विद्यमान अस्पष्टता को दूर करने में हो सकता है।
  •  यह जाना जा सकता है कि संविधान किस तारीख को बना तथा लागू हुआ था।
  • अपेक्षाएं (स्वतंत्रता, न्याय, समानता है), लक्ष्य है जबकि आदर्श (जनतांत्रिक, समाजवादी) उपाय हैं।
  • पुराना  मत — उद्देशिका को संविधान का भाग नहीं मानता है क्योंकि यदि इसे विलोपित भी कर दे तो भी संविधान अपनी विशेष स्तिथि बनाये रख सकता है
    इसे पुस्तक के पूर्व परिचय की तरह समझा जा सकता है यह मत सर्वोच्च न्यायालय ने बेरुबारी यूनियन वाद 1960 में प्रकट किया थानया  मत— इसे संविधान का एक भाग बताता है केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य 1973 में दिये निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे संविधान का भाग बताया है। संविधान का एक भाग होने के कारण ही संसद ने इसे 42वें संविधान संशोधन से इसे सशोधित किया था तथा समाजवादी, पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़ दिये थे। वर्तमान में नवीन मत ही मान्य है।

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