शैव पाशुपत सम्प्रदाय लिंगायत और कालमुख सम्प्रदाय

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महाभारत कहता है कि विशाख का जन्म स्कन्द के दक्षिणी भाग से हुआ था।

राजतरंगिणी कहती है कि मौर्य सम्राट अशोक बौद्ध बनने से पूर्व शैव था। राजतरंगिणी के रचयिता कल्हण अशोक के पुत्र जालौक की चर्चा करता है जो शैव था। लामा तारानाथ के अनुसार अश्वघोष बौद्ध बनने से पूर्व शैव था।

मन्दसौर अभिलेख में शिव को भवश्रज्य कहा गया है, अर्थात् ब्रह्मा की रक्षा करने वाला। स्कन्दपुराण में भगवान शिव कहते हैं किसृष्टिकर्ता ब्रह्मा के पहले मैं ही अकेला ईश्वर था, वर्तमान में भी मैं ही अकेला ईश्वर हूँ, और भविष्य में भी में ही ईश्वर रहूँगा।

झालरापाटन (राजस्थान) से प्राप्त एक लेख में शिव की चर्चा विश्वमूर्ति के रूप में है।

पाशुपत सम्पद्राय सम्बंधित तथ्य :-

इस सम्प्रदाय का उल्लेख महाभारत के नारायणी खण्ड में मिलता है। महाभारत सांख्य, योग, पांचरात्र और वेद के साथ-साथ पाशुपत शाखा की चर्चा है। पाशुपत सम्प्रदाय के प्रवर्तक लकुलिश हैं। लकुलिश शिव के 28वें एवं अन्तिम अवतार माने गए हैं। वायु पुराण में उल्लेख है कि शिव ने लकुलिश नामक ब्रह्मचारी के रूप में अवतार लिया। लकुलिश के विचार महेश्वर कृत पाशुपतसूत्र तथा वायुपुराण में मिलते हैं। लकुलिश का जन्मस्थल गुजरात का कायावरोहण या कावर्त माना जाता है। लकुलिश को पंचरार्थविद्या एवं पंचाध्यायी नामक ग्रन्थ भी लिखने का श्रेय दिया जाता है। पाशुपत सम्पद्राय के अनुयायी लकुलिश को शिव का अवतार मानते हैं। इस सम्प्रदाय के लोग अपने हाथ में एक लगुड या दण्ड धारण करते थे जिसे शिव का प्रतीक माना जाता था। इसका प्राचीनतम अंकन कुषाण शासक हुविष्क की एक मुद्रा पर मिलता है। गुप्तकाल में भी इस सम्प्रदाय के अनुयायी थे। चन्द्रगुप्त द्वितीय कालीन मथुरा

लेख में उदिताचार्य नामक एक पाशुपत मतानुयायी का उल्लेख मिलता है.

जिसने दो लिंगों की स्थापना करवाई थी।

वर्तमान में पाशुपत सम्प्रदाय से सम्बन्धित एकमात्र केन्द्र नेपाल के काठमाण्डू में स्थित पाशुपत मन्दिर है। पाशुपत मत के अनुसार दु:खों का अन्त करना और महेश्वर के पद को प्राप्त करना शिव उपासक का उद्देश्य है। पाशुपत धर्म के अनुयायी पंचार्थिक कहलाते थे।

भारशिव सम्प्रदाय

इस सम्प्रदाय का उल्लेख वाकाटक शासक प्रवरसेन के अभिलेख से मिलता है। भारशिव से ही वीर शैव सम्प्रदाय निकला है, और वीर शैव सम्प्रदाय को ही लिंगायत सम्प्रदाय के नाम से जानते हैं।

लिंगायत सम्प्रदाय

इस सम्प्रदाय के संस्थापक वासव थे। वासव ने कन्नड़ में वासव पुराण की रचना की। इसके भतीजे चेन्ना वासव ने भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया। वासव कलचुरि शासक बिजला कलचुरि के दरबारी थे। वीर शैव अहिंसा में विश्वास करते थे। ये वर्णाश्रम धर्म और जातिवाद का विरोध करते थे। वासव के अनुसार गुरु की पूजा करना तथा शैव सन्तों का आदर करना प्रत्येक वीर शैव का कर्तव्य है। लिंगायत सम्प्रदाय में जंगम, गुरु तथा लिंग का विशेष महत्व है। जंगम उसे कहा गया है जिसने शिव से एक्य स्थापित कर लिया।

इन्होंने जन-साधारण की भाषा कन्नड़ में इस धर्म का प्रचार किया। वीर शैव के भक्ति गीतों को वचनशास्त्र कहा जाता था। फ्लीट महोदय लिंगायत

सम्प्रदाय के संस्थापक के रूप में एकान्तरमैया का नाम लेते हैं। वासव उा लिंगायत सम्प्रदाय के प्रवर्तक अल्लारि प्रभु तथा उनके शिष्य वासव को जाता है। ह्वेनसांग ने मुण्डी सम्प्रदाय की चर्चा की है। इसे मतामयूर भी कहा था मध्यभारत एवं दक्कन में कलचुरि-चेदि के समय मतामयूर सम्प्रदाय उत्थान था मल्लारि सम्प्रदाय में शिव घोड़े पर चढ़े हुए तथा कुत्ते से घिरे हुए हैं।

कालामुख सम्प्रदाय

इस सम्प्रदाय की चर्चा आनन्दभूति या माधव के शंकरदिग्विजय, या के मालती माधव में तथा राजशेखर की कर्पूरमंजरी में मिलती है। शंकरदियों में कापालिक का प्रमुख केन्द्र उज्जैन बताया गया है। जबकि मालतीम । इसके संस्थापक अघोरजन्य को बताया गया है एवं प्रमुख केन्द्र के रूप शैल को बताया गया है। ह्वेनसांग कापालिक के केन्द्र के रूप में कपिशा का करता है। कापालिक में नरबलि की प्रथा प्रचलित थी।

वामन पुराण के अनुसार शैव धर्म में गुप्त काल में 4 उप-सम्प्रदा शैव धर्म, कापालिक, पाशुपत, कालामुख। कापालिक सम्प्रदाय के ईष्ट थे। भैरव को शिव का अवतार माना गया है। इस सम्प्रदाय के लोग नर बना। में भोजन करते थे और चिता की भस्म शरीर पर लगाते थे। कालामुख साया के अनुयायी कापालिकों के वर्ग से ही सम्बन्धित थे किन्तु उनसे भी आता एवं भयंकर प्रवृत्ति के थे।

शिवपुराण में इन्हें महाव्रतधर कहा गया है। रसेश्वर सम्प्रदाय में वीर्य की तुलना पारा धातु से की गई है जबकि पार्वती के रज की तुलना अभ्रक से की गई है।

मध्य भारत एवं कश्मीर में कुछ उदारवादी शैव सम्प्रदाय विकसित हुए कश्मीर में प्रत्यभिज्ञा तथा स्पन्दशास्त्र सम्प्रदाय विकसित हुए। अनाया।

उप-सम्प्रदाय के संस्थापक वसुगुप्त एवं स्पन्दशास्त्र उप-सम्प्रदाय के संस्थापक कलाद और सोमानन्द। आगे चलकर आगमन्त, शुद्धशैव, नाथपन्थकी  स्थापना हुई। आगमन्त सम्प्रदाय के संस्थापक अघोर शिवाचार्य थे, शुद्ध सम्प्रदाय के संस्थापक श्रीकान्त शिवाचार्य थे तथा नाथपन्थ सम्प्रदा। योगिनीकौल के संस्थापक मछेन्द्रनाथ थे। इसी सम्प्रदाय से जुड़े हुए गोरखनाथ थे।

नाथपन्थ सम्प्रदाय की स्थापना 10वीं सदी में मछेन्द्रनाथ या मत्स्येता ने की थी। इस पन्थ में शिव को आदिनाथ मानते हुए नवनाथों में दिव्यपुता मान्यता दी गई है। मत्स्येन्द्रनाथ के ग्रन्थों कोलज्ञाननिर्णय तथा अकूलवीरता इस सिद्धान्त की विस्तृत चर्चा की गई है। इस सिद्धान्त के अनुसार शिा नाम अकु तथा उनकी शक्ति का नाम कूल है। इन दोनों के सम्भोग से होती है। ऐसी स्थिति में साधना का समस्त कार्य स्त्री को साथ रखकर किया जाता है।

मत्स्येन्द्रनाथ की यह साधना वज्रयानि बौद्धों की साधना से साम्यता है, इसलिए मत्स्येन्द्रनाथ को अवलोकितेश्वर के रूप में माना गया। 11वी शताब्दी में नाथपन्थ सम्प्रदाय के प्रचार-प्रसार का कार्य बाबा गोरखनाथ ने किया । साधना में स्त्रियों के प्रवेश का विरोध किया और कहा कि इसके सम्भो संसर्ग से साधना सम्भव नहीं है। योगमार्ग और गोरक्षासिद्धान्तसंग्रह नामक में इनके सिद्धान्तों का वर्णन मिलता है।पुलकेशिन द्वितीय के भतीजे नागवद्धन के ताम्रपत्र अभिलेख से पता चलता है कि एक गाँव कापालेश्वर देवता के अनुयायियों के भरण-पोष लिए दिया गया था। हेनसांग ने अपने वृतान्त में हर्षवर्द्धन को बौद्ध धकरने से पूर्व शैव बतलाया है। बाँसखेड़ा एवं मधुबन ताम्रपत्र अभिलेख में पता चलता है की हर्षवर्धन ने खंड्परेशु शिव की पूजा की थी जो थानेश्वर में की गयी थी l

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