राजनीति विज्ञान का क्षेत्र आधुनिक दृष्टिकोण

द्वितीय विष्वयुद्ध के बाद राजनीति विज्ञान के क्षेत्र के सम्बन्ध में एक नवीन अवधारणा का जन्म हुआ है जो अधिक व्यापक, यथार्थवादी तथा विकासवादी प्रक्रिया है।

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‘‘राजनीतिविज्ञान का क्षेत्र अब इतना व्यापक हो गया है कि उसमें संस्थात्मक संगठन, निर्णय-निर्माण और क्रियाषीलता की प्रक्रियाओं, नियंत्रण की राजनीति, नीतियों ओर
कार्यो और विधिबद्ध प्रषासन के मानवीय वातावरण को भी षामिल किया जाने लगा है‘‘ चार्ल्स हाइनेमन
आधुनिक राजनीतिविज्ञान का प्रारम्भ और अन्त अब राज्य में नहीं होता न ही वह राज्य की सीमाओं को स्वीकार नहीं करता। वह राजनीतिक समस्याओं का अध्ययन
भी वर्णनात्मक, ऐतिहासिक, आदर्षात्मक और कानूनी पद्धतियों से करना चाहता है। आधुनिक राजनीति विज्ञान की अध्ययन की विशयवस्तु है, राजनीति मनुश्य और उसका
व्यवहार, मनुश्य की समूह के रूप में भूमिका और उसका आचरण, प्रषासन, अन्तर्राश्ट्रीय राजनीति राजनीतिक विचारधाराओं, राजनीतिक मूल्य, राजनीतिक अर्थषास्त्र, राजनीतिक
समाजषास्त्र, आधुनिक सैन्य विज्ञान इत्यादि।
वाल्टर वेजहॉट, वुडरो विल्सन, लार्ड ब्राइस आदि ने राजनीति के यथार्थवादी अध्ययन पर बल दिया। विचारक राजनीति विज्ञान के अध्ययन को वैज्ञानिक ओर निष्चयात्मक
बनाना चाहते थे । 1925 ई. के अमेरिकी राजनीतिविज्ञान संघ के अधिवेषन में चार्ल्स ई मेरियम ने इस विशय के अध्ययन के लिये तकनीकी एवं प्रविधियों के विकास एवं प्रयोग
पर बल दिया। 1930 ई. में हेरल्ड लासवेल ने अपनी पुस्तक ‘साइकोपैथालाजी एण्ड पॉलिटिक्स ;में राजनीतिक घटनाओं एवं
क्रियाओं की व्याख्या के लिये फ्रायड के मनोविज्ञान को आधार बनाया। द्वितीय विष्वयुद्ध के बाद का विष्व इसके पूर्व के विष्व से राजनीतिक संरचना, औद्योगिक विकास, वैज्ञानिक
एवं तकनीकी उपलब्धियों तथा सैन्य क्षमता की दृश्टि से भिन्नता लिये हुए था। अतः इसका परिणाम यह हुआ कि मानव समाज एवं संस्कृति की परम्परागत अवधारणाओं के
स्थान पर नयी अवधारणओं ने जन्म लिया। इसका संपूर्ण समाज विज्ञानों के अध्ययन दृश्टिकोण में परिवर्तन हुआ। अतः इस वातावरण में कई विचारकों ने राजनीतिविज्ञान के
अध्ययन हेतु नवीन एवं वैज्ञानिक तकनीकों के प्रयोग का समर्थन किया।
अतः 1960 के दषक में संयुक्त राज्य अमरीका के षिकागो विष्वविद्यालय में कार्यरत राजनीति वैज्ञानिकों ने इसके अध्ययन को अधिक से अधिक वैज्ञानिक बनाने की
दिषा में प्रयत्न किये। उन्होंने यह स्वीकार किया कि राजनीति विज्ञान एक सामाजिक विज्ञान है और इसके अध्ययन को षुद्ध एवं पूर्ण बनाने के लिये हमें समाजषास्त्र, मनोविज्ञान,
अर्थषास्त्र, मानवषास्त्र जैसी समाज विज्ञानों की वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाना चाहिये। इन प्रमुख राजनीतिविज्ञानियों में षामिल ये-डेविड ईस्टन, कैटलिन, लासवेल तथा
अलेकजेन्डर आदि। उन्होंने समाज-एक दृश्टिकोण का विकास किया, जिसकी मान्यता है कि व्यक्तियों के राजनीतिक जीवन को सामाजिक जीवन के संदर्भ में ही उचित
रूप से समझा जा सकता है, अतः राजनीति विज्ञान के अध्ययन में ‘अन्तर अनुषासनात्क दृश्टिकोण‘ ;प्दजमत क्पेबपचसपदंतल ंचचतवंबीद्ध को अपनाया जाना चाहिये। इसके
पूर्व औपचारिक और न्यायिक संरचनाओं पर जोर दिया जा रहा था । अब उसका स्थान प्रक्रियाओं को समझने की प्रवृति ने ले लिया। गैर सरकारी संगठनों की कार्यवाहियों
और सरकारी कार्यवाहियों पर उनकी प्रतिक्रिया के अध्ययन में रूचि ली जाने लगी। राजनीतिविज्ञान का क्षेत्र अब राजनीतिक दर्षन और संस्थाओं के विवरण तक ही सीमित
नहीं रह गया था। संस्थाओं और संगठनों के अध्ययन में भी आनुभविक अध्ययन ;म्उचपतपबंस ैजनकलद्ध की प्रकृति बढ रही थी। षासन के संक्रियात्मक (व्चमतंजपवदंस)
और औपचारिक स्रोतों पर षोध करने के साथ साथ, संस्थाओं के कार्यो पर भी षोध की जाने लगी थी। समकालीन राजनीति विचारकों ने इस बात पर षोध करना प्रारम्भ कर
दिया था समाज में षक्ति का स्रोत कहा है, तथा उस षक्ति का प्रषासन द्वारा पर किस प्रकार प्रयोग किया जाता है? कुछ विचारकों ने उन संास्कृतिक तत्वों की जानकारी पर
बल दिया जो षासन को प्रभावित करते हैं। कतिपय विचारकों ने प्रषासन के संगठनात्मक पक्ष का गहराई से अध्ययन करते हुए नीति निर्माण के तत्वों का विष्लेशण प्रारम्भ किया।
राजनीतिक नेतृत्व की प्रकृति और उसके कार्यों का अध्ययन प्रारम्भ किया। नेतृत्व की विचारधारा और उसके बदलते पारस्परिक सम्बन्धों के बदलते स्वरूपों पर विचार करना
प्रारम्भ किया।
राज-वैज्ञानिकों में सांख्यिकी व सांख्यिकीय प्रविधियों को षोध में लागू करने की तत्परता दिखाई देने लगी। उनके द्वारा की मूल्यों के प्रति आग्रह की अपेक्षा उनके पीछे काम
करने वाली प्रवृतियों को समझने पर जोर दिया जाने लगा। तथ्यों के वस्तुनिश्ठ ;व्इरमजपअमद्ध अध्ययन के आधार पर सामान्यीकरण ;ळमदमतंसपेंजपवदद्ध पर पहंुचने की प्रवृति पाई
जाने लगी। राजनीतिषास्त्र की अध्ययन पद्धति में वास्तविक परिवर्तन, व्यवहारवाद के उद्भव के बाद हुआ। लार्ड ब्राईस वगैराह ने जो तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर जो निश्कर्श
निकाले थे वह वैज्ञानिक दृश्टिकोण की अपेक्षा अर्न्तदृश्टि पर आधारित थे। व्यवहारवादियों ने जिन नवीन प्रविधियों का उपयोग किया वह आधारसामग्री ;क्ंजंद्ध के संकलन ;ब्वससमबजपवदद्ध
उनका प्रोसेसिंग ;च्तवबमेेपदहद्ध और विष्लेशण ;।दंसलेपेद्ध पर आधारित थी। राजनीतिविज्ञान की वर्तमान स्थिति के प्रति असन्तोश पैदा हुआ। अतः किर्कपैट्रिक ने लिखा है
कि ‘‘असन्तोश ने क्षोभ को जन्म दिया और क्षोभ के परिणाम स्वरूप क्षेत्र में परिवर्तन आया।‘‘ अतः व्यवहारवादी पद्धति को अभिव्यक्ति मिली।
आज राजनीतिविज्ञान का स्वरूप और क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। इस विशय के अध्ययन के लिए नयी अवधारणायें ;ब्वदमबमचजेद्ध, पद्धतियां ;डमजीवकवसवहलद्ध
व तकनीक विकसित की जा रही हैं। राजनीतिक संस्थाये ही अब षोध और विष्लेशण की मूल इकाई नहीं रह गयी है। अब राजनीतिविज्ञान के अध्ययन का आधार राजनीतिक
परिवेष में व्यक्तियों के व्यवहार को माना जाने लगा है। कैटलिन जैसे विद्वान यह मानने लगे हैं कि राजनीतिविज्ञान एक व्यवहारवादी विज्ञान है। आज राजनीतिषास्त्र जो पहिले
दर्षनषास्त्र ;च्ीपसवेवचीलद्ध व नीतिषास्त्र ;म्जीपबेद्ध का अंग माना जाता था, अब उससे निकलकर सामाजिक विज्ञानों का अंग माना जाने लगा है। अतः अध्ययन की
आधुनिक पद्धतियों ने इस विशय के अध्ययन के अराजनीतिक जीवन को तथा उसके समूह के आचरण को अध्ययन क्षेत्र में षामिल कर लिया गया है।

आधुनिक दृश्टिकोण की आधारभूत अवधारणाएँ
राजनीति के आधुनिक दृश्टिकोण की आधारभूत अवधारणाएं निम्नलिखित हैं-
1. अध्ययन क्षेत्र में यथार्थवादी दृश्टिकोण अपनाया जाना चहिये।
2. राजनीति विज्ञान की विशयवस्तु में अन्तर अनुषासनात्मक दृश्टिकोण अपनाया जाना चाहिये।
3. राजनीति विज्ञान की विशयवस्तु के अध्ययन के लिये वैज्ञानिक उपागमों का प्रयोग किया जाना चाहिये।
4. आधुनिक दृश्टिकोण का मत है कि परम्परागत राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में अध्ययन के बारे में औपचारिक पद्धति को अपनाया गया है, जबकि इसकी अध्ययन पद्धति में
अनौपचारिक मत को अपनाया जाना चाहिये।उपरोक्त विवरण से यह तथ्य उभरकर आता है कि आधुनिक राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन के बारे में विद्वानों में मतभेद है। फिर भी आधारभूत बातों में उनमें सहमति
है। जैसे वह सभी मानते हैं कि-
1. राजनीतिविज्ञान का अध्ययन क्षेत्र यथार्थवादी होना चाहिये।
2. इसके अध्ययन में अन्तर अनुषासनात्मक दृश्टिकोण अपनाया जाना चाहिये।
3. इस बात की आलोचना की जाती है कि नवीन अध्ययन पद्धति के आधार पर भी वैज्ञानिक प्रामाणिकता एवं सुनिष्चितता प्राप्त नहीं हो सकती है।
4. यथार्थवादी अध्ययन के नाम पर राजनीतिविज्ञान का मानवीय मूल्यों ;भ्नउंद टंसनमेद्ध से सम्बन्ध तोड़ लिया गया है। तथा इस षास्त्र को मूल्यहीनता का
समर्थक बना दिया गया है।
5. पिनाक एण्ड स्मिथ ;च्मददवबा ंदक ेूपजीद्ध जैसे राज-वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है कि राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन के साथ व्यवहारिक राजनीतिक
अध्ययन के साथ, राजनीतिक संस्थाओं के संगठनात्मक एवं मूल्यात्मक अध्ययन को भी स्थान दिया जाना चाहिये।

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