मौर्य कालीन कलाएं

सांची स्तूप:Image result मध्य प्रदेश के भोपाल के निकट सांची मंे तीन स्तूप जिसमें एक बड़ा एंव दो छोटे स्तूप है। सांची के बड़े स्तूप को मूलतः अशोक अथवा उसके किसी प्रतिनिधि ने (तीसरी शती ई. पू.) ईंटो से बनवाया था यद्यपि मौलिक स्तूप ईटों से निर्मित है जिसे (जॉन मार्शल ने उत्खनन द्वारा स्पष्ट किया है) प्रथम शताब्दी ई. पू. में आन्ध्रों के शासनकाल में विस्तृत किया गया। इसका तल व्यास 120 फुट तथा ऊंचाई 58 फुट है। इस पर हर्मिका भी बनी है वर्तमान मंे इसके चारों तरफ वेदिका बनी है जिसमें चारों दिशाओं में चार तोरण द्वार बने है। स्तूप वेदिका एंव तोरण द्वार की इन्जीनियरिंग कला पर विचार करने से ज्ञात होता है कि मौर्यकालीन मौलिक स्तूप से सम्बन्धित वेदिका तथा तोरण द्वार काष्ठ से पाषाण में परिवर्तित कर दिया गया। इसकें अतिरिक्त यहां दो छोटे स्तूप और भी है, जो मौर्यकाल में बने थे। इनमें से एक तो बड़े स्तूप के निकट ही उतर-पूर्व की ओर स्थित है और दूसरा पहाड़ी से थोड़ा नीचे है जो कि तोरण विहीन है।
भरहुत स्तूप: Related image

भरहुत स्तूप भी मध्य प्रदेश में सतना जिले से 16 किलोमीटर दूर यह स्तूप है। यह स्तूप भी मौलिक रूप से अशोक के समय बना था लेकिन इनका जीर्णाेद्धार एवं परिवर्द्धन शुंडगकाल में हुआ। इसकी खोज 1873 ई. में कनिधम ने की। इसके अवशेष कलकत्ता, लंदन, प्रयाग, इलाहबाद एवं रामवन सतना के संग्रहालयों में सुरक्षित है। इस स्तूप का तल व्यास 68 फुट था जो चारों ओर से प्रस्तर वेदिका द्वारा घिरा हुआ था। मौलिक रूप से मौर्य काल में बना यह स्तूप ईंटों का था उसके बाद इस पर पाषाण आवरण किया गया और अलंकृत पाषाण वेदिका से सज्जित किया गया जो परवर्ती शुंडगकाल की देन है।
एकाश्म वेदिका: सारनाथ में अशोक के स्तूप के चारों ओर बनी एक पाषाण वेदिका प्राप्त हुई है। यह मूल गंध कूटी (सारनाथ) के दक्षिणी चैत्य की नींव के नीचे तक सफाई करते समय प्राप्त हुई। 8फुट 4ईंच ऊंची यह वेदिका पाषाण की बनी है और इसमें कोई जोड़ नहीं है। इस पर अशोककालीन कलाकृतियों वाली पॉलिश की हुई है। अनुमान यह लगाया जाता है कि किसी समय यह धर्मराजिका स्तूप की चोटी पर लगी हुई थी। यह धर्मराजिका स्तूप भी सम्भवतया अशोककालीन है। वेदिका आकार में चौकोर है जिसमें दो स्तम्भों के बीच तीन सूक्तियां के ऊपर गोल मुंडेर वाला उष्णीय है। पूरी वेदिका पर अशोक कालीन चमकदार पॉलिश है।
मौर्यकालीन राजकीय कला में अशोक के कलात्मक स्तम्भों का महत्वपूर्ण स्थान है। पाषाण के ये स्तम्भ उस काल की उत्कृष्ट कला के प्रतीक है। इन स्तम्भों पर अशोक ने अपने उद्धार धार्मिक और प्रशासकीय विचार उत्कीर्ण कराए। अपने धर्मलेखों, राजघोषणाओं तथा आदेशों को जनसाधारण के हित में प्रसारित करने के लिये अशोक ने देश के विभिन्न प्रान्तो में स्तम्भ स्थापित करवाये। अधिकतर स्तम्भों का भार लगभग 50टन और ऊँचाई 50 फुट है। प्रत्येक स्तम्भ के तीन भाग है-
1) पृथ्वी में गढ़ा हुआ आधार भाग।
(2) पृथ्वी के ऊपर का गोल या मध्य भाग तथा
(3) उच्चतम स्थान पर बना हुआ शीर्ष भाग।
स्तम्भों को कई फुट नीचे की ओर पृथ्वी मे गाढ़ा जाता था पृथ्वी के ऊपर वाले मध्य भाग पर अद्भूत चमक तथा चिकनाई मिली है। ऊँचाई के साथ-साथ इन स्तम्भो की गोलाई कम होती जाती है तथा बिलकुल शीर्ष स्थान पर चिन्हस्वरूप अनेक प्रकार के पशुओं की मूर्तियां स्थापित की गई है। पूरे स्तम्भ मंे शीर्ष भाग सबसे सुन्दर एवं महत्वपूर्ण है। मौर्ययुगीन स्तम्भों मे अनेक तो नष्ट हो गये लेकिन फिर भी अनेक सुरक्षित है और कई थोड़े बहुत खण्डितावस्था में है। अब तक प्राप्त स्तम्भ निम्नलिखित है-
1. सारनाथ का सिंह स्तम्भ 2. सांची सतम्भ
4. रामपुरवा स्तम्भ (लेखरहित) 6. लौरिया अरराज स्तम्भ
8. कौशाम्बी स्तम्भ
10. निगलीवा स्तम्भ
12. संकाश्य स्तम्भ
3. रामपुरवा स्तम्भ
5. लौरियानन्दगढ़ सिंह शीर्षक युक्त स्तम्भ 7. इलाहबाद स्तम्भ
9. रूम्मिनदेई या लुम्बिनी स्तम्भ
11. वाखिरा या कोल्हुआ स्तम्भ
13. पटना की सदर गली से प्राप्त वृष शीर्षकयुक्त स्तम्भ खण्ड 14. पटना बसाढ स्तम्भ 16. दिल्ली मेरठ स्तम्भ 15. दिल्ली टोपरा स्तम्भ
17. पटना संग्रहालय में सुरक्षित चार वृषभों के संघाट युक्त स्तंभ शीर्षक 18. लखनऊ संग्रहालय स्तम्भ (बस्सी से प्राप्त) इनके अतिरिक्त अभी भी अशोक के स्तम्भो के मिलने का क्रम जारी है।
अशोककालीन ये स्तम्भ समकालिक कला के ही वाहक नहीं संदेश वाहक भी है। वास्तव में अशोक के दार्शनिक विचारों के वाहक है, जो उसके दार्शनिक सन्देश को प्रशस्त कर रहे है। प्राप्त अधिकांश स्तम्भ लेखयुक्त है। परन्तु अशोक के पूरे सातों लेख केवल दिल्ली-टोपरा स्तम्भ पर ही मिले है। अशोककालीन स्तम्भों का सबसे महत्वपूर्ण कलात्मक भाग उसका शीर्ष है जो वास्तु ही नहीं मूर्तिशिल्प के भी प्रमाण है। अशोककालीन शिल्प-कला का सर्वोत्तम उदाहरण सारनाथ स्तम्भ शीर्ष है। इस शीर्ष में मौर्यकाल का सर्वोत्तम विकास देखा जा सकता है। यह शीर्ष मूलतः 50फुट ऊँचे स्तम्भ पर स्थित था। इस स्तम्भ को गढ़ने मंे शिल्पी ने धर्मचक्र, चार सिंहो के शरीर सौष्ठव, गोल चौकी में उत्कीर्ण चार पशु (अश्व, वृष, सिंह एवं गज) एवं चार धर्म चक्र तथा पदकोश आदि शीर्ष के विविध भागों के सन्तुलन एंव सौन्दर्य के मध्य तालमेल बैठाकर अपने कला नैपुण्य का परिचय दिया है। जॉन मार्शल ने इसे भारत की सर्वश्रेष्ठ शिल्पकृति कहा है।
इसी प्रकार मिलता जुलता अन्य कई स्तम्भों पर अंकन हुआ है लेकिन सारनाथ जितना उत्कृष्ट नहीं। इन स्तम्भों में धर्मचक्र अशोक की धार्मिक आस्था का प्रतीक, चार सिंह सम्राट की तेजस्विता, उसके साम्राज्य की विविध प्रजा तथा उसकी एकता के द्योतक है। वस्तुतः इस धार्मिक प्रतीक मंे समाज, धर्म तथा विश्व के विषय में सम्राट अशोक के दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति हुई है। मौर्य स्तम्भों का निरीक्षण करने पर दृष्टा के हृदय पर सौन्दर्यजन्य प्रभाव पड़ता है। इनका कलात्मक रूप सारगर्भित और मौलिक है। स्तम्भों का निर्माण, स्थानान्तरण तथा स्थापना मौर्यकालीन शिल्पकार की कल्पना, बुद्धि और कुशलता का प्रमाण है।
गुहाएं
प्रागैतिहासिककाल से ही भारतीय पर्वतों को काटकर गुहाओं का निर्माण करना भारतीय कला रही है। इनकी पुनरावृति पुनः मौर्य युग विशेषतः अशोक के समय में हुई। ये गुफाएं जैन एवं बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों के लिये आश्रय का साधन बनने लगी। इन गुफाओं को संस्कृत में लयनम् तथा प्राकृत भाषा में लेण कहा जाता था। सम्राट अशोक के काल में सर्वप्रथम आजीविकों के लिये खलतिक पर्वत (गया के निकट आधुनिक बराबर पर्वत)Image result for सुदामा गुफा: पर गुफाएं उत्कीर्ण की गई। बिहार प्रान्त में गया से 19 मील दूर बराबर तथा नागार्जुनी पहाड़ी में कुल सात गुफाओं की प्राप्ति हुई है जिन्हे ‘सातघर’ की संज्ञा प्राप्त है? अशोक तथा उसके पुत्र दशरथ ने इन्हे आजीविकों को दानस्वरूप भेंट किया था। इन गुफाओं की दीवारें बहुत चिकनी एवं बड़ी पक्की है इन पर बारीक पच्चीकारी की गई है। मौर्यकालीन गुफा निर्माण कला से प्रेरणा पाकर ही भविष्य में अजन्ता तथा एलोरा जैसी गुहा-कला का जन्म हुआ। इन सात गुफाओं में चार बराबर मंे एंव तीन नागार्जुनी पहाड़ी पर है इन गुफाओं में लिखे लेख के आधार पर पता चलता है कि इनका निर्माण अशोक ने आजीविक सम्प्रदाय के
सुदामा गुफा: यह सबसे प्राचीन गुफा है! यह बराबर की पहाड़ी पर है। इसकी छत ढोलाकार है तथा 12 फुट 3 इं ऊँची है। इसके भीतर 32 फुट 9 इंच लम्बा तथा 19फुट 6इंच चौड़ा बड़ा कक्ष है। इसकी भीतरी दीवारों पर चमकदार पॉलिश है। इसे अशोक ने अपने राज्यारोहण के 12वें वर्ष बनवाया था।
 कर्ण चौपड़: यह अशोक ने अपने राज्यारोहण के 19वें वर्ष मंे बनवाई। यह चतुष्कोणिक वृहत्वकक्ष से युक्त है जिसक लम्बाई 3 फुट व चौड़ाई 14 फुट है। इसकी दीवारों पर 4 फुट 8 ईंच की मेहराबदार छत है। इसकी छत की ऊँचाई 6 फुट 7 इंच है। यह भी तेलिया पत्थर को खोदकर बनाई गई है।Image result for सुदामा गुफा:
विश्व झोपड़ी: इसका निर्माण अशोक ने 12वें वर्ष करवाया। इसमें दो कक्ष है 11 फुट व्यास का भीतरी कक्ष अधुरा बना
लगता है। दूसरा कक्ष आयताकार एवं छत सपाट है। दीवारों पर पॉलिश है।
लोमस ऋषि की गुफा: इस पहाड़ी पर यह सबसे महत्वपूर्ण गुफा है। तिथि के दृष्टि से सबसे बाद की गुफा ह लेकिन सबसे श्रेष्ठ है। इसका द्वार सबसे विशिष्ट है। इसमें उपासना गृह भी है जो अण्डाकार है। इसके प्रवेश द्वार के मेहराब पर ‘गजपक्ति’ की पच्चीकारी की हुई है। इस प्रकार की पच्चीकारी प्राचीनकाल में की जाती थी। ये सभी (उपरोक्त चारों) गुफाएं बराबर की पहाड़ी पर बनी है। नागार्जुनी पहाड़ी पर तीन गुफाएं है जो मौर्यकालीन है, इस प्रकार है-
गोपी गुुफा: यह एक सुरंगनुमा गुफा है। इसकी छत ढोलाकार है इसमें लेख अंकित है जिससे पता चलता है कि
इसका निर्माण अशोक के पौत्र दशरथ ने करवाया। यह 44 फुट लम्बी, 19 फुट चौड़ी तथा 10 फुट ऊँची है।
वड़थिका गुफा: यह भी आजविकों के लिये निर्मित गुफा थी इसमें लिखित लेखानुसार इसका निर्माण भी दशरथ के
समय में हुआ था।
वहियक गुफा: यह एक कक्ष के सदृश्य लगती है। यह कक्ष 16 फुट 9 इंच लम्बा, 11फुट 3 इंच चौड़ा तथा 10 फुट ऊँचा है। इसका मुखमण्डप छोटा सा है। इसके लेख से दशरथ द्वारा निर्मित होने का उल्लेख मिलता है। इन समस्त गुफाओं की अन्दर की दीवारों पर चमकदार पॉलिश है जो मौर्यकला की विशेषता है।
मूर्तिकला
मौर्यकाल मंे मूर्तिकला का भी पर्याप्त विकास हो चुका था। इस युग में अनेक सजीव एंव आकर्षक मूूर्तियों का निर्माण किया गया है। स्तम्भों पर बनी विभिन्न पशु पक्षियों की मूर्तियां न केवल सजीव है बल्कि सुन्दरता लिये हुये भी है। इसी प्रकार अनेक मानव आकार की मूर्तियां भी प्राप्त हुई है इनमें सम्मुख दर्शन की विशेषता है। मौर्यकालीन प्राप्त मूर्तिेयों में सर्वाधिक प्रसिद्ध मूर्ति आगरा-मथुरा के मध्य परखम ग्राम में मिली है। यह सात फीट ऊँची है तथा भूरे बलुए प्रस्तर की बनी हुई है। ऊपर सुन्दर वज्रलेप है, किन्तु इस मूर्ति का मुख तथा भुजाएं भग्न है। यह वस्त्र धारण किये हुये है। अंकित वस्त्र मौर्यकालीन वेशभूषा के परिचायक है। इसी प्रकार बेसनगर से प्राप्त स्त्री मूर्ति जो 6 फुट 7इंच ऊँची है। इसकी भुजाएं एंव मुख टूटा हुआ है। पटना एंव दीदारगंज से भी मानव मूर्तियां मिली है। इस सभी पर मौर्यकालीन ओपदार पॉलिश है। जायसवाल एंव श्री रामप्रसाद चन्दा, नीहार रंजन राय भी इन्हें मौर्यकालीन बताते है।
पटना के दीदारंगज से प्राप्त स्त्री मूर्ति चंवर धारिणी यक्षिणी की मूर्ति :- लिये हुये हैं। यह साढ़े पांच फीट ऊँची है तथा एक चौकी पर खड़ी है। चौकी के साथ ही सम्पूर्ण मूर्ति एक प्रकार के बलुए प्रस्तर से निर्मित है, जिस पर विशिष्ट चमक है। मूर्ति का मुख मण्डल गोलाकार है, शरीर भरा हुआ तथा होठों पर हल्की मुस्कान है, पेट की नसे और मांसल देह तथा पेट की सलवटें स्पष्ट है। इसके दाहिने हाथ में चंवर है, केशराशि गूंथी हुई है, हाथ की कलाई में चूड़ियां तथा भारी कड़ा है, हाथ टूटा हुआ है, गले में मुक्तहार है जो कि वक्ष के स्तनों के मध्य डोलायमान है। यह मूर्ति की मौर्यकालीन चमकदार पॉलिश से युक्त है।
मथुरा, अहिच्छत्र, कौशाम्बी, गाजीपुर, पटना से भी मिट्टी की मूर्तियां मिली है। इनके अलावा बुलन्दीबाग, कुम्हरार सा और बक्सर से खिलौने प्राप्त हुये है।
मानव मूर्तियों के अतिरिक्त पशु आकृतियां भी महत्वपूर्ण है। सारनाथ के सिंह स्तम्भ पर चार सिंहो की आकृति तत्कालीन मूर्तिकला के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कहे जा सकते है। उड़ीसा में धौली नामक स्थान पर चट्टान से काटकर एक विशाल हरित प्रतिमा मिली है जो कि मौर्यकालीन है। यह अधुरी मूर्ति है हाथी का केवल अग्र भाग ही निर्मित हो पाया है इस मूर्ति में विशालता, मांसल एंव जीवनता विशेष है।
इस प्रकार मौर्यकालीन मूर्तिकला भी उन्नति पर थी, प्राप्त अवशेषों से यह पुख्ता हो जाती है।
चित्रकला
मौर्यकाल में स्थापत्य और मूर्तिकला के अतिरिक्त चित्रकला के क्षेत्र मे भी प्रगति हई। मौर्य युग में भवनांे तथा भित्तियों के अतिरिक्त वस्त्रों पर भी चित्र बनाये जाने लगे थे। पटचित्रों के निर्माण के क्षेत्र मंे बौद्ध कला ने विशेष ख्याति अर्जित की। उसका सूत्रपात अशोक के ही समय मंे हो चुका था। बौद्ध पिटको जातकों और गाथा विषयक ग्रन्थों के विभिन्न सन्दर्भो से ज्ञात होता है कि तत्कालीन समाज में चित्रकला को मनोरंजन का श्रेष्ठ माध्यम माना जाने लगा था। इसी उद्देश्य से अनेक शासकों ने अपने यहां बहुमूल्य विशाल चित्रशालाओं एवं चित्रसंग्राहलयों की स्थापना की थी।

Website worth
http://fkrt.it/DvnHdTuuuN

About freecivilexam 659 Articles
1.myself suraj pratap Pursuing J.R.F(Junior Research Fellowship) PhD and my facebook page link:- https://www.facebook.com/tgtpgthigher/ 2.this is the group for ias/pcs/other competitive exams hope you like and share in facebook account or twitter/ whatsapp. 3.My aim is to work innovatively for the enhancement and betterment of education. I aspire to work for an institution like my website which offers career growth and chances to learn and improve my knowledge. 4.if you want to read the content in english than click-translate than click hindi language(हिन्दी) than(after convert in hindi) click english language(अंग्रेजी)..ok suraj pratap

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*