महावीर और जैन धर्म

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भगवान महावीर

तीर्थंकर महावीर
विवरण
अन्य नाम वीर, अतिवीर, वर्धमान, सन्मति
एतिहासिक काल ५९९-५२७ ई.पू.
शिक्षाएं अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांतवाद
पूर्व तीर्थंकर पार्श्वनाथ
गृहस्थ जीवन
वंश इक्ष्वाकु
पिता सिद्धार्थ
माता त्रिशला
पंच कल्याणक
जन्म चैत्र शुक्ल त्रयोदशी
जन्म स्थान कुंडलग्राम, वैशाली के निकट
मोक्ष कार्तिक अमावस्या
मोक्ष स्थान पावापुरी, जिला नालंदा, बिहार
लक्षण
रंग स्वर्ण
चिन्ह सिंह
ऊंचाई ६ फीट (७ हाथ)
आयु ७२ वर्ष
शासक देव
यक्ष मातंग
यक्षिणी सिद्धायिका
गणधर
प्रथम गणधर गौतम गणधर

भगवान् महावीर

पंचशील सिद्धान्त के प्रर्वतक एवं जैन धर्म के चौबिसवें तीर्थकंर महावीर स्वामी अहिंसा के मूर्तिमान प्रतीक थे। जिस युग में हिंसा, पशुबलि, जाति-पाँति के भेदभाव का बोलबाला था उसी युग में भगवान महावीर ने जन्म लिया। उन्होंने दुनिया को सत्य, अहिंसा जैसे खास उपदेशों के माध्यम से सही राह दिखाने की ‍कोशिश की। अपने अनेक प्रवचनों से मनुष्यों का सही मार्गदर्शन किया। नवीन शोध के अनुसार जैन धर्म की स्थापना वैदिक काल में हुई थी। जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक ऋषभदेव थे। महावीर स्वामी ने जैन धर्म में अपेक्षित सुधार करके इसका व्यापक स्तर पर प्रचार किया।

महावीर स्वामी का जन्म वैशाली (बीहार) के निकट कुण्डग्राम में क्षत्रिय परिवार में हुआ था। बचपन का नाम वर्धमान था। पिता सिद्धार्थ, जो कुण्डग्राम के राजा थे एवं माता त्रिशला का संबन्ध भी राजघराने से था। राजपरिवार में जन्म होने के कारण महावीर स्वामी का प्रारम्भिक जीवन सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण बीता। पिता की मृत्यु के पश्चात 30 वर्ष की आयु में इन्होने सन्यास ग्रहण कर लिया और कठोर तप में लीन हो गये। ऋजुपालिका नदि के तट पर सालवृक्ष के नीचे उन्हे ‘कैवल्य’ ज्ञान (सर्वोच्च ज्ञान) की प्राप्ति हुई जिसके कारण उन्हे ‘केवलिन’ पुकारा गया। इन्द्रियों को वश में करने के कारण ‘जिन’ कहलाये एवं पराक्रम के कारण ‘महावीर’ के नाम से विख्यात हुए।

जैन धर्म, महावीर स्वामी के समय में कोशल, विदेह, मगध, अंग, काशी, मिथला आदि राज्यों में लोकप्रिय हो गया था। मौर्यवंश व गुप्त वंश के शासनकाल के मध्य में जैन धर्म पूर्व में उङिसा से लेकर पश्चिम में मथुरा तक फैला था। महावीर स्वामी की मृत्यु के लगभग दो सौ वर्ष पश्चात जैन धर्म मुख्यतः दो सम्प्रदाय में बंट गया:

  1. दिगम्बर जैन और
  2. श्वेताम्बर जैन।

श्वेताम्बर जैन मुनि सफेद वस्त्र धारण करते हैं जबकि दिगम्बर जैन मुनियों के लिये नग्न रहना आवश्यक है। जैन धर्म ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न पक्षों को बहुत प्रभावित किया है। दर्शन, कला, और साहित्य के क्षेत्र में जैन धर्म का महत्वपूर्ण योगदान है। जैन धर्म में वैज्ञानिक तर्कों के साथ अपने सिद्धान्तो को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है। अहिंसा का सिद्धान्त जैन धर्म की मुख्य देन है। महावीर स्वामी ने पशु-पक्षी तथा पेङ-पौधे तक की हत्या न करने का अनुरोध किया है। अहिंसा की शिक्षा से ही समस्त देश में दया को ही धर्म प्रधान अंग माना जाता है।

जैन धर्म से प्रेरित होकर कई राजाओं ने निर्धन वर्ग के लिये औषधालयों, विश्रामालयों एवं पाठशालाओं का निर्माण करवाया। जैन धर्म के 24 तीर्थकंरों के नाम इस प्रकार हैः- 1.ऋषभदेव, 2. अजीतनाथ, 3.सम्भवनाथ, 4.अभिनन्दन, 5.सुमतिनाथ, 6.पद्मप्रभु, 7.सुपार्श्वनाथ, 8.चन्द्रप्रभु, 9.सुविधि, 10.शीतल, 11.श्रेयांश, 12.वासुपुज्य, 13.विमल, 14.अनन्त, 15.धर्म, 16.शान्ति, 17.कुन्थ, 18.अर, 19.मल्लि, 20.मुनि सुब्रत, 21.नेमिनाथ, 22.अरिष्टनेमि, 23.पार्श्वनाथ, 24.महावीर स्वामी।

महावीर स्वामी ने समाज में प्रचलित वर्ण व्यवस्था का विरोध किया था। भगवान महावीर का आत्म धर्म जगत की प्रत्येक आत्मा के लिए समान था। महावीर का ‘जीयो और जीने दो’ का सिद्धांत जनकल्याण की भावना को परिलाक्षित करता है।

तीर्थंकर महावीर का केवलिकाल ३० वर्ष का था और उनके ११ गणधर थे जिनमें मुख्य इंद्रभूति थे।उनके के संघ में १४००० दिगम्बर मुनि, ३६००० आर्यिकाएँ, १००००० श्रावक और ३००००० श्रविकाएँ थी।भगवान महावीर ने ईसापूर्व 527, 72 वर्ष की आयु में बिहार के पावापुरी (राजगीर) में कार्तिक कृष्ण अमावस्या को निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया। उनके साथ अन्य कोई मुनि मोक्ष नहीं गए |

भगवान् महावीर के अनमोल वचन Lord Mahavir Quotes in Hindi

महावीर का प्रथम उपदेश उस समय प्रारम्भ हुआ , जब उसे सुनने के लिए योग्य पात्र इन्द्रभूति गौतम उनकी सभा में उपस्थित हुआ। दिगम्बर मान्यता के अनुसार महावीर का यह प्रथम उपदेश राजगिरी (राजगृह) में विपुलाचल पर्वत पर हुआ था। श्वेताम्बर मान्यता के अनुसार यह मध्यम पावा के महासेन उद्यान में हुआथा, जो बिहार में राजगिर (राजगृह) के समीप है। इस सभा में इन्द्रभूमि गौतम के अतिरिक्त महावीर के प्रथम देशना सुनने के लिए असंख्य जनसमुदाय उपस्थित था।

Name Lord Mahavir / भगवान् महावीर 
Born 599 BC
Died 527 BC

भगवान् महावीर के अनमोल वचन

Quote 1: The greatest mistake of a soul is non-recognition of its real self and can only be corrected by recognizing itself.

In Hindi: किसी आत्मा की सबसे बड़ी गलती अपने असल रूप को ना पहचानना है , और यह केवल आत्म ज्ञान प्राप्त कर के ठीक की जा सकती है .

Quote 2: Silence and Self-control is non-violence.

In Hindi: शांति और आत्म-नियंत्रण अहिंसा है  .

Quote 3: Every soul is independent. None depends on another.

In Hindi: प्रत्येक जीव स्वतंत्र है . कोई किसी और पर निर्भर नहीं करता .

Quote 4: There is no separate existence of God. Everybody can attain God-hood by making supreme efforts in the right direction.

In Hindi: भगवान् का अलग से कोई अस्तित्व नहीं है . हर कोई सही दिशा में सर्वोच्च प्रयास कर के देवत्त्व प्राप्त कर सकता है .

Quote 5: Every soul is in itself absolutely omniscient and blissful. The bliss does not come from outside.

In Hindi: प्रत्येक आत्मा स्वयं में सर्वज्ञ और आनंदमय है . आनंद बाहर से नहीं आता .

Quote 6: Have compassion towards all living beings. Hatred leads destruction.

In Hindi: हर एक जीवित प्राणी के प्रति दया रखो . घृणा से विनाश होता है .

Quote 7: Respect for all living beings is non‑violence.

In Hindi: सभी जीवित प्राणियों के प्रति सम्मान अहिंसा है .

Quote 8: All human beings are miserable due to their own faults, and they themselves can be happy by correcting these faults.

In Hindi: सभी मनुष्य अपने स्वयं के दोष की वजह से दुखी होते हैं , और वे खुद अपनी गलती सुधार कर प्रसन्न हो सकते हैं .

Quote 9: Non-violence is the highest religion

In Hindi: अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है .

Quote 10: A man is seated on top of a tree in the midst of a burning forest. He sees all living beings perish. But he doesn’t realize that the same fate is soon to overtake him also. That man is fool.

In Hindi: एक व्यक्ति जलते हुए जंगल के मध्य में एक ऊँचे वृक्ष पर बैठा है . वह सभी जीवित प्राणियों को मरते हुए देखता है . लेकिन वह यह नहीं समझता की जल्द ही उसका भी यही हस्र होने वाला है . वह आदमी मूर्ख है .

Quote 11: Fight with yourself, why fight with external foes? He, who conquers himself through himself, will obtain happiness.

In Hindi: स्वयं से लड़ो , बाहरी दुश्मन से क्या लड़ना ? वह जो स्वयम पर विजय कर लेगा उसे आनंद की प्राप्ति होगी .

Quote 12: There is no enemy out of your soul.The real enemies live inside yourself, they are anger, proud, greed, attachmentes and hate.

In Hindi: आपकी आत्मा से परे कोई भी शत्रु नहीं है . असली शत्रु आपके भीतर रहते हैं , वो शत्रु हैं क्रोध , घमंड , लालच ,आसक्ति और नफरत .

Quote 13: It is better to win over self than to win over a million enemies.

In Hindi: खुद पर विजय प्राप्त करना लाखों शत्रुओं पर विजय पाने से बेहतर है .

Quote 14: The soul comes alone and goes alone, no one companies it and no one becomes its mate.

In Hindi: आत्मा अकेले आती है अकेले चली जाती है , न कोई उसका साथ देता है न कोई उसका मित्र बनता है .

Quote 15: Can you hold a red-hot iron rod in your hand merely because some one wants you to do so? Then, will it be right on your part to ask others to do the same thing just to satisfy your desires? If you cannot tolerate infliction of pain on your body or mind by others’ words and actions, what right have you to do the same to others through your words and deeds?

In Hindi: क्या तुम लोहे की धधकती छड़ सिर्फ इसलिए अपने हाथ में पकड़ सकते हो क्योंकि कोई तुम्हे ऐसा करना चाहता है ? तब , क्या तुम्हारे लिए ये सही होगा कि तुम सिर्फ अपनी इच्छा पूरी करने के लिए दूसरों से ऐसा करने को कहो . यदि तुम अपने शरीर या दिमाग पर दूसरों के शब्दों या कृत्यों द्वारा  चोट बर्दाश्त नहीं कर सकते हो तो तुम्हे दूसरों के साथ अपनों शब्दों  या कृत्यों द्वारा ऐसा करने का क्या अधिकार है ?

जैन धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है। ‘जैन’ उन्हें कहते हैं, जो ‘जिन’ के अनुयायी हों। ‘जिन’ शब्द बना है ‘जि’ धातु से। ‘जि’ यानी जीतना। ‘जिन’ अर्थात जीतने वाला। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपनी वाणी को जीत लिया और अपनी काया को जीत लिया, वे हैं ‘जिन’। जैन धर्म अर्थात ‘जिन’ भगवान का धर्म। वस्त्र-हीन बदन, शुद्ध शाकाहारी भोजन और निर्मल वाणी एक जैन-अनुयायी की पहली पहचान है। यहाँ तक कि जैन धर्म के अन्य लोग भी शुद्ध शाकाहारी भोजन ही ग्रहण करते हैं तथा अपने धर्म के प्रति बड़े सचेत रहते हैं।

जैन धर्म

जैन धर्म के अनुयायियों की मान्यता है कि उनका धर्म ‘अनादि’और सनातन है। सामान्यत: लोगों में यह मान्यता है कि जैन सम्प्रदाय का मूल उन प्राचीन पंरपराओं में रहा होगा, जो आर्यों के आगमन से पूर्व इस देश में प्रचलित थीं। किंतु यदि आर्यों के आगमन के बाद से भी देखा जाये तो ऋषभदेव और अरिष्टनेमि को लेकर जैन धर्म की परंपरा वेदों तक पहुँचती है।

अन्तिम अनुबद्ध (केवली) श्री 1008 जम्बूस्वामी

महाभारत के युद्ध के समय इस संप्रदाय के प्रमुख नेमिनाथथे, जो जैन धर्म में मान्य तीर्थंकर हैं। ई. पू. आठवीं सदी में 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ हुए, जिनका जन्म काशी (वर्तमान बनारस) में हुआ था। काशी के पास ही 11वें तीर्थंकरश्रेयांसनाथ का जन्म हुआ था। इन्हीं के नाम पर सारनाथ का नाम प्रचलित है। जैन धर्म में श्रमण संप्रदाय का पहला संगठन पार्श्वनाथ ने किया था। ये श्रमण वैदिक परंपरा के विरुद्ध थे।महावीर तथा बुद्ध के काल में ये श्रमण कुछ बौद्ध तथा कुछ जैन हो गए थे। इन दोनों ने अलग-अलग अपनी शाखाएँ बना लीं। भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे, जिनका जन्म लगभग ई. पू. 599 में हुआ और जिन्होंने 72 वर्ष की आयु में देहत्याग किया। महावीर स्वामी ने शरीर छोडऩे से पूर्व जैन धर्म की नींव काफ़ी मजबूत कर दी थी। अहिंसा को उन्होंने जैन धर्म में अच्छी तरह स्थापित कर दिया था। सांसारिकता पर विजयी होने के कारण वे ‘जिन’ (जयी) कहलाये। उन्हीं के समय से इस संप्रदाय का नाम ‘जैन’ हो गया।

मतभेद तथा विभाजन

मौर्य सम्राट अशोक के अभिलेखों से यह पता चलता है कि उसके समय में मगध में जैन धर्म का प्रचार था। लगभग इसी समय मठों में बसने वाले जैन मुनियों में यह मतभेद शुरू हुआ कि तीर्थंकरों की मूर्तियाँ कपड़े पहनाकर रखी जाएँ या नग्न अवस्था में। इस बात पर भी मतभेद था कि जैन मुनियों को वस्त्र पहनना चाहिए या नहीं। आगे चलकर यह मतभेद और भी बढ़ गया। ईसा की पहली सदी में आकर जैन मतावलंबी मुनि दो दलों में बंट गए। एक दल ‘श्वेताम्बर’ और दूसरा दल ‘दिगम्बर’ कहलाया। ‘श्वेताम्बर’ और ‘दिगम्बर’ इन दोनों संप्रदायों में मतभेद दार्शनिक सिद्धांतों से अधिक चरित्र को लेकर है। दिगम्बर आचरण पालन में अधिक कठोर माने जाते हैं, जबकि श्वेताम्बर कुछ उदार हैं। श्वेताम्बर संप्रदाय के मुनि श्वेत वस्त्र धारण करते हैं, जबकि दिगम्बर मुनि निर्वस्त्र रहकर साधना करते हैं। यह नियम केवल मुनियों पर लागू होता है। दिगम्बर संप्रदाय यह मानता है कि मूल आगम ग्रंथ लुप्त हो चुके हैं, ‘कैवल्य ज्ञान’ प्राप्त होने पर सिद्ध को भोजन की आवश्यकता नहीं रहती और स्त्री शरीर से ‘कैवल्य ज्ञान’ संभव नहीं है; किंतु श्वेताम्बर संप्रदाय ऐसा नहीं मानते हैं।

शाखाएँ

जैन धर्म की दिगम्बर शाखा में तीन शाखाएँ हैं-

  1. मंदिरमार्गी
  2. मूर्तिपूजक
  3. तेरापंथी

श्वेताम्बर में शाखाओं की संख्या दो है-

  1. मंदिरमार्गी
  2. स्थानकवासी

दिगम्बर संप्रदाय के मुनि वस्त्र नहीं पहनते। ‘दिग्‌’ अर्थात दिशा। दिशा ही अंबर है, जिसका वह ‘दिगम्बर’। वेदों में भी इन्हें ‘वातरशना’ कहा गया है। जबकि श्वेताम्बर संप्रदाय के मुनि सफ़ेद वस्त्र धारण करते हैं। लगभत तीन सौ वर्षों पहले श्वेताम्बरों में ही एक अन्य शाखा और निकली ‘स्थानकवासी’। ये लोग मूर्तियों की पूजा नहीं करते हैं।

  • जैनियों की अन्य शाखाओं में ‘तेरहपंथी’, ‘बीसपंथी’, ‘तारणपंथी’ और ‘यापनीय’ आदि कुछ और भी उप-शाखाएँ हैं। जैन धर्म की सभी शाखाओं में थोड़ा-बहुत मतभेद होने के बावजूद भगवानमहावीर तथा अहिंसा, संयम और अनेकांतवाद में सबका समान विश्वास है।

धर्म का प्रचार-प्रसार

ईसा की पहली शताब्दीं में कलिंग के राजा खारवेल ने जैन धर्म स्वीकार किया। ईसा की आरंभिक सदियों में उत्तर में मथुरा और दक्षिण में मैसूर जैन धर्म के बहुत बड़े केंद्र थे। पाँचवीं से बारहवीं शताब्दीं तक दक्षिण के गंग, कदम्ब, चालुक्य और राष्ट्रकूट राजवंशों ने जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में बहुत सहयोग एवं सहायता प्रदान की। इन राजाओं के यहाँ अनेक जैन कवियों को आश्रय एवं सहायता प्राप्त थी। ग्याहरवीं सदी के आस-पास चालुक्य वंश के राजा सिद्धराज और उनके पुत्र कुमारपाल ने जैन धर्म को राजधर्म बना दिया तथा गुजरात में उसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया। हिन्दी के प्रचलन से पूर्व अपभ्रंश भाषा का प्रयोग होता था। अपभ्रंश भाषा के कवि, लेखक एवं विद्वान हेमचन्द्र इसी समय के थे। हेमचन्द्र राजा कुमारपाल के दरबार में ही थे। सामान्यत: जैन मतावलंबी शांतिप्रिय स्वभाव के होते थे। इसी कारण मुग़ल काल में इन पर अधिक अत्याचार नहीं हुए। उस समय के साहित्य एवं अन्य विवरणों से प्राप्त जानकारियों के अनुसार अकबर ने जैन अनुयाइयों की थोड़ी बहुत मदद भी की थी। किंतु धीरे-धीरे जैनियों के मठ टूटने एवं बिखरने लगे। जैन धर्म मूलत: भारतीय धर्म है। भारत के अतिरिक्त पूर्वी अफ़्रीका में भी जैन धर्म के अनुयायी मिलते हैं।

जैन अनुश्रुति

मथुरा में विभिन्न कालों में अनेक जैन मूर्तियाँ मिली हैं, जो जैन संग्रहालय मथुरा में संग्रहीत हैं। अवैदिक धर्मों में जैन धर्म सबसे प्राचीन है, प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव माने जाते हैं। जैन धर्म के अनुसार भी ऋषभदेव का मथुरा से संबंध था। जैन धर्म की प्रचलित अनुश्रुति के अनुसार नाभिराय के पुत्र भगवान ऋषभदेव के आदेश से इन्द्र ने 52 देशों की रचना की थी। शूरसेन देश और उसकी राजधानी मथुरा भी उन देशों में थी। जैन `हरिवंश पुराण’ में प्राचीन भारत के जिन 18 महाराज्यों का उल्लेख हुआ है, उनमें शूरसेन और उसकी राजधानी मथुरा का नाम भी है। जैन मान्यता के अनुसार प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के सौ पुत्र हुए थे।

धर्म ग्रंथ

जैन धर्म ग्रंथ पर आधारित धर्म नहीं है। भगवान महावीर ने सिर्फ़ प्रवचन ही दिए थे। उन्होंने किसी ग्रंथ की रचना नहीं की थी, लेकिन बाद में उनके गणधरों ने उनके अमृत वचन और प्रवचनों का संग्रह कर लिया। यह संग्रह मूलत: प्राकृत भाषा में है, विशेष रूप से मागधी में। प्रोफेसर महावीर सरन जैन का मत है कि जैन साहित्य की दृष्टि से दिगम्बर आम्नाय के आचार्य गुणधर एवं आचार्य धरसेन के ग्रंथों में मागधी प्राकृत का नहीं अपितु शौरसेनी प्राकृत का प्रयोग हुआ है। ये ग्रंथ गद्य में हैं। आचार्य धरसेन का समय सन् 87 ईसवीं के लगभग मान्य है। आचार्य गुणधर का समय आचार्य धरसेन के पूर्व माना जाता है। आचार्य गुणधर की रचना कसाय पाहुड सुत्त तथा आचार्य धरसेन एवं उनके शिष्यों आचार्य पुष्पदंत तथा आचार्य भूतबलि द्वारा रचित षटखंडागम है जिनमें प्रथम शताब्दी के लगभग की शौरसेनी प्राकृत का प्रयोग हुआ है।

धर्मः सर्व सुखाकरो हितकरो, घर्म बुधाश्चिन्वते ।
धर्मेणैव समाप्यते शिवसुखं, धर्माय तस्मै नमः ।
धर्मान्नास्त्यपरः सुहृद्भवभृतां, धर्मस्य मूलं दया ।
धर्मे चित्तमहं दधे प्रतिदिनं, हे धर्म ! माँ पालय ।।1 ।।

समस्त आगम ग्रंथों को चार भागों मैं बाँटा गया है-

  1. प्रथमानुयोग
  2. करनानुयोग
  3. चरर्नानुयोग
  4. द्रव्यानुयोग।

12 अंगग्रंथ

आचार, सूत्रकृत, स्थान, समवाय, भगवती, ज्ञाता धर्मकथा, उपासकदशा, अन्तकृतदशा, अनुत्तर उपपातिकदशा, प्रश्न-व्याकरण, विपाक और दृष्टिवाद। इनमें 11 अंग तो मिलते हैं, किंतु बारहवाँ दृष्टिवाद अंग नहीं मिलता।

12 उपांगग्रंथ

औपपातिक, राजप्रश्नीय, जीवाभिगम, प्रज्ञापना, जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति, चंद्र प्रज्ञप्ति, सूर्य प्रज्ञप्ति, निरयावली या कल्पिक, कल्पावतसिका, पुष्पिका, पुष्पचूड़ा और वृष्णिदशा।

10 प्रकीर्णग्रंथ

चतुःशरण, संस्तार, आतुर प्रत्याख्यान, भक्तपरिज्ञा, तण्डुल वैतालिक, चंदाविथ्यय, देवेन्द्रस्तव, गणितविद्या, महाप्रत्याख्यान और वीरस्तव।

6 छेदग्रंथ

निशीथ, महानिशीथ, व्यवहार, दशशतस्कंध, बृहत्कल्प और पञ्चकल्प।

4 मूलसूत्र

उत्तराध्ययन, आवश्यक, दशवैकालिक और पिण्डनिर्य्युक्ति।

2 स्वतंत्र ग्रंथ

अनुयोग द्वार और नन्दी द्वार।

जैन पुराण परिचय

जैन परम्परा में 63 शलाका महापुरुष माने गए हैं। पुराणों में इनकी कथाएँ तथा धर्म का वर्णन आदि है। प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश तथा अन्य देशी भाषाओं में अनेक पुराणों की रचना हुई है। दोनों सम्प्रदायों का पुराण साहित्य विपुल परिमाण में उपलब्ध है। इनमें भारतीय इतिहास की महत्त्वपूर्ण सामग्री मिलती है। मुख्य पुराण हैं- जिनसेन का ‘आदिपुराण’ और जिनसेन (द्वि.) का ‘अरिष्टनेमि’ (हरिवंशपुराण), रविषेण का ‘पद्मपुराण’ और गुणभद्र का ‘उत्तरपुराण’। प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं में भी ये पुराण उपलब्ध हैं।भारत की संस्कृति, परम्परा, दार्शनिक विचार, भाषा, शैली आदि की दृष्टि से ये पुराण बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।

अन्य ग्रंथ

षट्खण्डागम, धवला टीका,षट्खण्डागम- सिद्धान्तचिन्तामणि टीका, महाधवला टीका, कसायपाहुड, जयधवला टीका, समयसार, योगसार प्रवचनसार, पञ्चास्तिकायसार, बारसाणुवेक्खा, आप्तमीमांसा, अष्टशती टीका, अष्टसहस्री टीका, रत्नकरण्ड श्रावकाचार, तत्त्वार्थसूत्र, तत्त्वार्थराजवार्तिक टीका, तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक टीका, समाधितन्त्र, इष्टोपदेश, भगवती आराधना, मूलाचार, गोम्मटसार, द्रव्यसङ्ग्रह, अकलङ्कग्रन्थत्रयी, लघीयस्त्रयी, न्यायकुमुदचन्द्र टीका, प्रमाणसङ्ग्रह, न्यायविनिश्चयविवरण, सिद्धिविनिश्चयविवरण, परीक्षामुख, प्रमेयकमलमार्तण्ड टीका, पुरुषार्थसिद्ध्युपाय भद्रबाहु संहिता आदि।

एक प्रसंग

जीवंधर कुमार नाम के एक राजकुमार ने एक बार मरते हए कुत्ते को महामंत्र णमोकार सुनाया, जिससे उसकी आत्मा को बहुत शान्ति मिली और वह मरकर सुंदर देवता यक्षेन्द्र हो गया। वहाँ जन्म लेते ही उसे याद आ गया कि मुझे एक राजकुमार ने महामंत्र सुनाकर इस देवयोनि को दिलाया है| तब वह तुरंत अपने उपकारी राजकुमार के पास आया और उन्हें नमस्कार किया। राजकुमार तब तक उस कुत्ते को लिये बैठे हुए थे, देव ने उनसे कहे- “राजन् ! मैं आपका बहुत अहसान मानता हूँ कि आपने मुझे इस योनि में पहुँचा दिया।” जीवंधर कुमार यह दृश्य देखकर बड़े प्रसन्न हुए और उसे सदैव उस महामंत्र को पढ़ने की प्रेरणा दी। देव ने उनसे कहा- “स्वामिन् ! जब भी आपको कभी मेरी ज़रूरत लगे तो मुझे अवश्य याद करना और मुझे कुछ सेवा का अवसर अवश्य प्रदान करना। मैं आपका उपकार हमेशा स्मरण करूँगा।”

जैन धर्म का महामंत्र इस प्रकार है-

णमो अरिहंताणं।
णमो सिद्धाणं।
णमो आइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं।
णमो लोए सव्वसाहूणं॥

अर्थात- अरिहंतो को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार, सर्व साधुओं को नमस्कार।

जैन शास्त्रों के अनुसार हस्तिनापुर तीर्थ करोड़ों वर्ष प्राचीन माना गया है। श्री जिनसेनाचार्य द्वारा रचित आदिपुराण ग्रन्थ के अनुसार प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने युग की आदि में यहाँ एक वर्ष के उपवास के पश्चात् राजा श्रेयांस के द्वारा जैन विधि से नवधा भक्ति पूर्वक पड़गाहन करने के बाद इक्षु रस का आहार ग्रहण किया था। उनकी स्मृति में वहाँ जम्बूद्वीप तीर्थ परिसर में उनकी आहार मुद्रा की प्रतिमा विराजमान हैं। उसके दर्शन करके भक्तगण प्राचीन इतिहास से परिचित होते हैं।

तीर्थंकर

जैन धर्म में 24 तीर्थंकर माने गए हैं, जिन्हें इस धर्म में भगवान के समान माना जाता है। ‘तीर्थंकर’ शब्द का जैन धर्म में बड़ा ही महत्त्व है। ‘तीर्थ’ का अर्थ है- “जिसके द्वारा संसार समुद्र तरा जाए, पार किया जाए।” जैन धर्म अहिंसा प्रधान धर्म है। इसमें उन ‘जिनों’ एवं महात्माओं को तीर्थंकर कहा गया है, जिन्होंने प्रवर्तन किया, उपदेश दिया और असंख्य जीवों को इस संसार से ‘तार’ दिया। इन 24 तीर्थंकरों ने अपने-अपने समय में धर्ममार्ग से च्युत हो रहे जन-समुदाय को संबोधित किया और उसे धर्ममार्ग में लगाया। इसी से इन्हें धर्ममार्ग और मोक्षमार्ग का नेता तीर्थ प्रवर्त्तक ‘तीर्थंकर’ कहा गया है। जैन सिद्धान्त के अनुसार ‘तीर्थंकर’ नाम की एक पुण्य कर्म प्रकृति है। उसके उदय से तीर्थंकर होते और वे तत्त्वोपदेश करते हैं। आचार्य विद्यानंद ने स्पष्ट कहा है- “बिना तीर्थंकरत्वेन नाम्ना नार्थोपदेशना” अर्थात बिना तीर्थंकर-पुण्यनामकर्म के तत्त्वोपदेश संभव नहीं है।

तीर्थंकर ऋषभदेव

ऋषभदेव

जैन तीर्थंकरों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव हैं। जैन साहित्य में इन्हें प्रजापति, आदिब्रह्मा, आदिनाथ, बृहद्देव, पुरुदेव, नाभिसूनु और वृषभ नामों से भी समुल्लेखित किया गया है। युगारंभ में इन्होंने प्रजा को आजीविका के लिए कृषि, मसि, असि शिल्प, वाणिज्य और सेवा- इन षट्कर्मों (जीवनवृतियों) के करने की शिक्षा दी थी, इसलिए इन्हें ‘प्रजापति’, माता के गर्भ से आने पर हिरण्य (सुवर्ण रत्नों) की वर्षा होने से ‘हिरण्यगर्भ’, विमलसूरि- दाहिने पैर के तलुए में बैल का चिह्न होने से ‘ॠषभ’, धर्म का प्रवर्तन करने से ‘वृषभ’ शरीर की अधिक ऊँचाई होने से ‘बृहद्देव’एवं पुरुदेव, सबसे पहले होने से ‘आदिनाथ’ और सबसे पहले मोक्षमार्ग का उपदेश करने से ‘आदिब्रह्मा’कहा गया है। ऋषभदेव के  का नाम नाभिराय होने से इन्हें ‘नाभिसूनु’ भी कहा गया है। इनकीमाता का नाम मरुदेवी था। ऋषभदेव भगवान का जन्म कोड़ा कोड़ी वर्ष पूर्व अयोध्या नगरी में चैत्र कृष्ण नवमी के दिन माता मरुदेवी के गर्भ से हुआ था। पुनः लाखों वर्षों तक राज्य सत्ता संचालन करने के बाद चैत्र कृष्णा नवमी के दिन ही उन्होंने जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली थी, ऐसा जैन शास्त्रों में कथन मिलता है। उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष दिगंबर जैन समाज की ओर से जन्मदिन का मेला आयोजित किया जाता है। अयोध्या दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी के वर्तमान अध्यक्ष स्वस्ति श्री कर्मयोगी पीठाधीश रवीन्द्रकीर्ति स्वामी जी – जम्बूद्वीप, हस्तिनापुर वाले हैं।उनके नेतृत्व में पूरे देश की जैनसमाज के श्रद्धालु भक्त मेले में भाग लेने हेतु अयोध्या पहुँचते हैं। वहाँ भगवान ऋषभदेव का मस्तकाभिषेक – रथयात्रा – सभा आदि का आयोजन होता है। इस वर्ष यह वार्षिक मेला 4 अप्रैल – 2013 चैत्र कृष्णा नवमी को आयोजित हो रहा है।

तीर्थंकर उपदेश

जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों ने अपने-अपने समय में धर्म मार्ग से च्युत हो रहे जनसमुदाय को संबोधित किया और उसे धर्म मार्ग में लगाया। इसी से इन्हें ‘धर्म मार्ग-मोक्ष मार्ग का नेता’ और ‘तीर्थ प्रवर्त्तक’ अर्थात ‘तीर्थंकर’ कहा गया है। जैन सिद्धान्त के अनुसार ‘तीर्थंकर’ नाम की एक पुण्य, प्रशस्त कर्म प्रकृति है। उसके उदय से तीर्थंकर होते और वे तत्त्वोपदेश करते हैं।

  • आचार्य विद्यानंद ने स्पष्ट कहा हैकि ‘बिना तीर्थंकरत्वेन नाम्ना नार्थोपदेशना’ अर्थात बिना तीर्थंकर-पुण्यनामकर्म के तत्त्वोपदेश संभव नहीं है।
  • इन तीर्थंकरों का वह उपदेश जिन शासन, जिनागम, जिनश्रुत, द्वादशांग, जिन प्रवचन आदि नामों से उल्लिखित किया गया है। उनके इस उपदेश को उनके प्रमुख एवं प्रतिभाशाली शिष्य विषयवार भिन्न-भिन्न प्रकरणों में निबद्ध या ग्रथित करते हैं। अतएव उसे ‘प्रबंध’ एवं ‘ग्रन्थ’ भी कहते हैं। उनके उपदेश को निबद्ध करने वाले वे प्रमुख शिष्य जैनवाङमय मेंगणधर कहे जाते हैं। ये गणधर अत्यन्त सूक्ष्मबुद्धि के धारक एवं विशिष्ट क्षयोपशम वाले होते हैं। उनकी धारणाशक्ति और स्मरणशक्ति असाधारण होती है।

भरत ऋषभदेव पुत्र

तीर्थंकर पार्श्वनाथ
ऋषभदेव के पुत्र भरत बहुत धार्मिक थे। उनका विवाह विश्वरूप की कन्या पंचजनी से हुआ था। भरत के समय से ही अजनाभवर्ष नामक प्रदेश भारत कहलाने लगा था। राज्य-कार्य अपने पुत्रों को सौंपकर वे पुलहाश्रम में रहकर तपस्या करने लगे। एक दिन वे नदी में स्नान कर रहे थे। वहाँ एक गर्भवती हिरणी भी थी। शेर की दहाड़ सुनकर मृगी का नदी में गर्भपात हो गया और वह किसी गुफ़ा में छिपकर मर गयी। भरत ने नदी में बहते असहाय मृगशावक को पालकर बड़ा किया। उसके मोह से वे इतने आवृत्त हो गये कि अगले जन्म में मृग ही बने। मृग के प्रेम ने उनके वैराग्य मार्ग में व्याघात उत्पन्न किया था, किन्तु मृग के रूप में भी वे भगवत-भक्ति में लगे रहे तथा अपनी माँ को छोड़कर पुलहाश्रम में पहुँच गये। भरत ने अगला जन्म एक ब्राह्मण के घर में लिया। उन्हें अपने भूतपूर्व जन्म निरंतर याद रहे। ब्राह्मण उन्हें पढ़ाने का प्रयत्न करते-करते मर गया, किन्तु भरत की अध्ययन में रुचि नहीं थी।

जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांत

 

जैन धर्म के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं:-

  • निवृत्तिमार्ग
  • ईश्वर
  • सृष्टि
  • कर्म
  • त्रिरत्न
  • ज्ञान
  • स्यादवादया अनेकांतवाद या सप्तभंगी का सिद्धान्त
  • अनेकात्मवाद
  • निर्वाण
  • कायाक्लेश
  • नग्नता
  • पंचमहाव्रत
  • पंच अणुव्रत
  • अठारह पाप
  • जैन धर्म की प्रासंगिकता
  • जैन ग्रंथ भगवान महावीर एवं जैन दर्शन में जैन धर्म एवं दर्शन की युगीन प्रासंगिकता को व्याख्यायित करते हुए यह मत व्यक्त किया है कि आज के मनुष्य को वही धर्म-दर्शन प्रेरणा दे सकता है तथा मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, राजनीतिक समस्याओं के समाधान में प्रेरक हो सकता है जो वैज्ञानिक अवधारणाओं का परिपूरक हो, लोकतंत्र के आधारभूत जीवन मूल्यों का पोषक हो, सर्वधर्म समभाव की स्थापना में सहायक हो, अन्योन्याश्रित विश्व व्यवस्था एवं सार्वभौमिकता की दृष्टि का प्रदाता हो तथा विश्व शान्ति एवं अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का प्रेरक हो। लेखक ने इन प्रतिमानों के आधार पर जैन धर्म एवं दर्शन की मीमांसा की है

महत्वपूर्ण तथ्य

(1) जैन धर्म के संस्थापक और पहले तीर्थंकर थे- ऋषभदेव.

(2) जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर थे- पार्श्वनाथ

(3) पार्श्वनाथ काशी के इक्ष्वाकु वंशीय राजा अग्रसेन के पुत्र थे.

(4) पार्श्वनाथ को 30 साल की उम्र में वैराग्य उत्पन्न हुआ, जिस कारण वो गृह त्यागकर संयासी हो गए.

(5) पार्श्वनाथ के द्वारा दी गई शिक्षा थी- हिंसा न करना, चोरी नृ करना, हमेशा सच बोलना, संपत्ति न रखना.

(6) महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हैं.

(7) महावीर का जन्म 540 ई. पू. पहले वैशाली गणतंत्र के क्षत्रिय कुण्डलपुर में हुआ था.

(8) इनके पिता राजा सिद्धार्थ ज्ञातृक कुल के सरदार थे और माता त्रिशला लिच्छिवी राजा चेटक की बहन थीं.

(9) महावीर की पत्‍नी का नाम यशोदा और पुत्री का नाम अनोज्जा प्रियदर्शनी था.

(10) महावीर के बचपन का नाम वर्द्धमान था.

(11) महावीर का साधना काल 12 साल 6 महीने और 15 दिन का रहा. इस अवधि में भगवान ने तप, संयम और साम्यभाव की विलक्षण साधना की. इसी समय से महावीर जिन (विजेता), अर्हत (पूज्य), निर्ग्रंध (बंधनहीन) कहलाए.

(12) महावीर ने अपना उपदेश प्राकृत यानी अर्धमाग्धी में दिया.

(13) महावीर के पहले अनुयायी उनके दामाद जामिल बने.

(14) प्रथम जैन भिक्षुणी नरेश दधिवाहन की बेटी चंपा थी.

(15) महावीर ने अपने शिष्यों को 11 गणधरों में बांटा था.

(16) आर्य सुधर्मा अकेला ऐसा गंधर्व था जो महावीर की मृत्यु के बाद भी जीवित रहा.

(17) जैन धर्म दो भागों में विभाजित है- श्वेतांबर जो सफेद कपड़े पहनते हैं और दिगंबर जो नग्नावस्था में रहते हैं.

(18) भद्रबाहु के शिष्य दिगंबर और स्थूलभद्र के शिष्य श्वेतांबर कहलाए.

(19) दूसरी जैन सभा 512 में वल्लभी गुजरात में हुई.

(20) जैन धर्म के त्रिरत्न हैं- सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक आचरण.

(21) जैन धर्म में ईश्‍वर नहीं आत्मा की मान्यता है.

(22) महावीर पुनर्जन्म और कर्मवाद में विश्वास रखते थे.

(23) जैन धर्म ने अपने आध्यात्मिक विचारों को सांख्य दर्शन से ग्रहण किया.

(24) जैन धर्म को मानने वाले राजा थे- उदायिन, वंदराजा, चंद्रगुप्त मौर्य, कलिंग नरेश खारवेल, राजा अमोघवर्ष, चंदेल शासक.

(25) मौर्योत्तर युग में मथुरा जैन धर्म का प्रसिद्ध केंद्र था.

(26) जैन तीर्थंकरों की जीवनी कल्पसुत्र में है.

(27) जैन तीर्थंकरों में संस्कृत का अच्छा विद्वान नयनचंद्र था.

(28 ) मथुरा कला का संबंध जैन धर्म से है.

(29) 72 साल में महावीर की मृत्यु 468 ई. पू. में बिहार राज्य के पावापुरी में हुई थी.

(30) मल्लराजा सृस्तिपाल के राजप्रसाद में महावीर को निर्वाण प्राप्त हुआ था.

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