भारत में संघीय व्यवस्था

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आपने यह पाया होगा कि जब भी भारत की राजनीतिक पद्धति की प्रकृति, संरचना तथा प्रक्रियाओं पर चर्चा होती है तो यह कहा जाता है कि भारत एक संघीय राज्य है सामान्यतया विश्व में दो प्रकार के राज्य हैं वह राज्य जहाँ पूरे देश में केवल एक ही सरकार है उसे एकात्मक राज्य कहते हैं यूनाइटेड किंग्डम एक एकात्मक राज्य है लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कनाडा ऐसे राज्य, जहाँ दो स्तरों पर सरकारें हैं : एक केन्द्रीय स्तर पर तथा दूसरी राज्य (संघीय इकाई) स्तर पर दो स्तरों की सरकारों के अतिरिक्त संघीय पद्धति की निम्न विशेषताएँ होती हैं :

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(i) लिखित संविधान, (ii) केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का विभाजन, तथा (iii) संविधान की व्याख्या करने के लिए न्यायपालिका की सर्वोच्चता भारत की संघीय पद्धति में भी ये तीनों विशेषताएँ विद्यमान है भारतीय संघीय पद्धति की प्रकृति का परीक्षण हम नीचे कर रहे हैं

भारतीय संघीय पद्धति की विशषताएँ

1. द्धिसोपानीय सरकार : आपने यह सुना होगा कि भारतीय संविधान के दो स्तरों पर
सरकारों का प्रावधान किया गया हैएक सारे देश के लिए, जिसे केन्द्रीय सरकार कहते
हैं तथा दूसरी प्रत्येक इकाई यानि राज्य के लिए, जिसे राज्य सरकार कहते हैं कभीकभी
आपने भारत में त्रिसोपानीय सरकार की चर्चा सूनी होगी क्योंकि केन्द्रीय तथा राज्य सरकारों के अलावा ग्रामीण एवं शहरी स्थानीय सरकारों का एकअलग सोपन होता है किन्तु संविधान के अनुसार भारत में द्विसोपानीय सरकार है स्थानीय सरकारों को अलग अधिकार क्षेत्र नहीं दिए गए हैं ये राज्य सरकारों के अन्दर ही कार्य करते हैं

2. शक्तियों का विभाजन : अन्य संघों की तरह, भारतीय संघ में भी केन्द्र तथा राज्य सरकारों को सांविधानिक स्थिति प्राप्त है उनके कार्य क्षेत्र को भी संविधान द्वारा निर्धारित किया गया है संविधान द्वारा दोनों सरकारों के बीच शक्तियों का विभाजन किया है, कोई भी अपनी सीमा को नहीं छोडता या ही दूसरे के कार्य क्षेत्रों का अतिक्रमण करता है संविधान में तीन सूचियों द्वारा शक्तियों का विभाजन किया गया है संघ सूची, राज्यसूची तथा समवर्ती सूची संघ सूची में राष्ट्रीय महत्व के 97 विषय हैं जैसे, रक्षा, रेलवे, डाक, एवं तार आदि राज्य सूची में स्थानीय महत्व के 66 विषय हैं जैसे लोक स्वास्थय, पुलिस,स्थानीय स्वशासन आदि समवर्ती सूची में 47 विषय रखे गए हैं जैसे शिक्षा, बिजली, श्रमसंघ, आर्थिक एवं सामाजिक योजना आदि इस सूची पर केन्द्र तथा राज्य सरकारों का समवर्ती अधिकार क्षेत्र है हालांकि, संविधान ने विषयों की जो संघ सूची, राज्य सूची तथा समवर्ती सूचीमें नहीं आते, केन्द्र सरकार को सौंपा है ऐसे अधिकारों को अवशिष्ट अधिकार कहा जाता है यदि शाक्ति विभाजन के सम्बन्ध में कोई विवाद हो तो उसका निपटारा न्यायपालिका द्वारा सांविधानिक प्रावधानों के आधार पर किया जाता है

3. लिखित संविधान : जैसा हम लोगों ने पहले देखा है, भारत एक लिखित संविधान है,
जो सर्वोच्च है यह केन्द्र तथा राज्य दोनो सरकारों के लिए शक्ति श्रोत है ये दोनो ही
सरकारें अपने-अपने शासन क्षेत्र में स्वतन्त्र हैं भारतीय संविधान संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान की तरह अनमनीय नहीं है, यह एक नमनीय संविधान भी नहीं है यह अनमनीयता तथा नमनीयता का अनोखा मिश्रण है

क्या आप जानते हैं

संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान में 21 जून 1788 को स्वीकृत होने के बाद केवल 27 संशोधन हुए हैं लेकिन भारतीय संविधा में 26 जनवरी 1950 को लागू होने के बाद जनवरी 2010 तक 95 संशोधन हो चुके हैं

4. स्वतन्त्र न्यायपालिका : संघीय व्यवस्था की एक अन्य विशेषता न्यायपालिका है इसे इसलिए स्वतन्त्र रखा जाता है ताकि वह संविधान की व्याख्या कर सके तथा उसकी
पवित्रता बरकरार रख सके भारत में भी न्यायपालिका स्वतन्त्र है केन्द्र तथा राज्य के बीच के विवादों का निपटारा करना भारत के सर्वोच्च प्रारम्भिक है यदि कोई कानून संविधान का उल्लंघन करता है तो यह कानून को असवैधानिक घोषित कर सकता है

भारतीय संघीय व्यवस्थामजबूत केन्द्र

उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह स्पष्ट है कि भारतीय संविधान में संघीय व्यवस्था की सभी विशेषताएँ विधमान हैं लेकिन क्या कभी आपने यह कथन पढ़ा है भारतीय व्यवस्था का स्वरूप संघीय है लेकिन आत्मा एकात्मक है ऐसा इसलिए हा जाता है, क्योंकि भारत में केन्द्र सरकार बहुत मजबूत है स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय की अवस्था सामाजिकराजनीतिक को ध्यान में रखते हुए जानबुझकर किया गया था लगभग एक महाद्वीप विशाल देश है इसकी विविधताएँ एवं सामाजिक बहुलकवाद भी अनोखा है संविधान निर्माताओं का इसीलिए यह विश्वास था कि भारत में एक ऐसी संघीय व्यवस्था होनी चाहिए जो इन विविधताओं तथा बहुलवाद को समायोजित कर सके जब भारत हुआ तो इसके समक्ष देश की एकता एवं अखण्डता को सुरक्षित रखने तथा सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक परिवर्तन लाने जैसी गंभीर चुनौतियाँ थीं भारत ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए गए प्रान्तों में तो
विभाजित था इनके अतिरिक्त यहाँ 500 से भी अधिक रजवाड़े थे, जिन्हें विभिन्न राज्यों
में समाहित करना था या नए राज्य बनाने थे

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