भारत की राष्ट्रीय आय (NATIONAL INCOME OF OUR INDIA)

भारत  की राष्ट्रीय आय (NATIONAL INCOME OF INDIA)

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अर्थशास्त्र में राष्ट्रीय आय की गणना करके किसी देश के आर्थिक विकास स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। राष्ट्रीय आय पर ही देश के लोगों का कल्याण निर्भर करता है। परन्तु सिर्फ राष्ट्रीय आय के आधार पर ही आर्थिक विकास का निश्चय कर लेना गलत होगा क्योंकि इसके साथ-साथ देश की जनसंख्या के आंकड़ों पर भी ध्यान देना आवश्यक होता है। इसलिए आधुनिक अर्थशास्त्री राष्ट्रीय आय की तुलना में प्रति व्यक्ति आय को राष्ट्रीय विकास का अधिक विश्वसनीय सूचक मानते हैं।

राष्ट्रीय आय की गणना विभिन्न तरीकों से की जाती है। भारत में राष्ट्रीय आय की गणना एक वर्ष में उत्पादित समस्त वस्तुओं और सेवाओं द्वारा की जाती है और इस बात का ध्यान रखा जाता है कि इस गणना में कोई वस्तु या सेवा दो या अधिक बार न गिन ली जाय। पूर्वी यूरोपीय देशों में राष्ट्रीय आय गणना की भिन्न विधि अपनायी जाती है। वहां राष्ट्रीय आय गणना सिर्फ शुद्ध भौतिक उत्पादन को ही सम्मिलित किया जाता है।

भारत में राष्ट्रीय आय की गणना में सबसे बड़ी समस्या यह है कि अभी भी यहां इसके लिए विश्वसनीय एवं पर्याप्त अॉकड़ों का अभाव है और कई क्षेत्रों में अर्जित होने वाली आय की सूचना ही नहीं उपलब्ध है।

भारत में राष्ट्रीय आय के अनुमान (Estimates of National Income of India)

भारत में ब्रिटिश काल से ही राष्ट्रीय आय की गणना के प्रयास किये जाते रहे हैं। दादाभाई नौरोजी (1868), विलियम डिग्बी (1899), फिन्डले शिराज (1911,1922 और 1931), शाह एवं खम्ब्टा (1921), वी. के. आर. वी. राव (192529 और 1930-31), आर. सी. देसाई (1931-40) आदि अर्थशास्त्रियों ने स्वतंत्रता के पूर्व भारत की राष्ट्रीय आय मापने का प्रयास किया था। परन्तु उनकी गणना पद्धति अधिक विकसित नहीं थी. तथा उनमें से कुछ तो अनुमान पर भी आधारित थे। प्रारम्भिक गणनाओं में इन अर्थशास्त्रियों ने जो विधि अपनाई थी, उसमें सर्वप्रथम कृषि के कुल उत्पादन का अनुमान किया जाता था और फिर उसमें गैर-कृषि क्षेत्र की आय के रूप में कुछ राशि जोड़ दी जाती थी।

वी. के. आर. वी. राव ने इसके लिए कुछ विकसित प्रणाली अपनायी। उन्होंने उत्पादन और आय की गणना (census) पद्धतियों के योग द्वारा राष्ट्रीय आय का अनुमान लगाया। अर्थव्यवस्था भागों में बांटकर प्रथम वर्ग में कृषि, खानें, वन

राशि प्राप्त हुई, उसमें विदेशों से प्राप्त शुद्ध आय को जोड़ दिया गया। यही अंतिम

राशि देश की राष्ट्रीय आय हुई।

स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरान्त भारत सरकार ने राष्ट्रीय आय की गणना के लिए गम्भीरतापूर्वक प्रयास किया। इसी उद्देश्य से सरकार ने अगस्त, 1949 में प्रो. पी. सी. महालनोबिस की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय आय समिति (National Income Committee) की स्थापना की, जिसके अन्य सदस्य प्रो. डी. आर. गाडगिल और प्रो. वी. के. आर. राव थे। इस समिति ने साइमन कुजनेत्स, जे. आर. स्टोन और डॉ. डर्कसन को अपना परामर्शदाता नियुक्त किया। समिति ने अपनी प्रथम रिपोर्ट 1951 में तथा अन्तिम रिपोर्ट 1954 में प्रस्तुत की।

राष्ट्रीय आय समिित की अन्तिम रिपोर्ट प्राप्त होने के पश्चात् भविष्य के राष्ट्रीय आय के आकलन का कार्य केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन (CSO) को सौंप दिया गया।

केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन ने राष्ट्रीय आय का आकलन करने हेतु सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को 14 क्षेत्रों में विभाजित किया है

  1. प्राथमिक क्षेत्र- 1. कृषि, 2. वानिकी, 3. मत्स्यन, 4. खनन, II. द्वितीयक क्षेत्र- 5. विनिर्माण, 6. निर्माण, 7. विद्युत, गैस व जलापूर्ति, III. परिवहन, संचार एवं व्यापार- 8. परिवहन, भण्डारण और संचार, 9. व्यापार, होटल और रेस्त्रां
  2. वित्त और वास्तविक सम्पदा- 10. बैंकिग और बीमा, 11. वास्तविक सम्पदा, भवनों का स्वामित्व तथा व्यावसायिक सेवाएं,
  3. सामुदायिक व निजी सेवाएं- 12. सार्वजनिक प्रशासन और सुरक्षा, 13. अन्य सेवाएं,
  4. 14. विदेशी क्षेत्र। इनमें से कृषि, वानिकी, मत्स्यन, खनन तथा विनिर्माण क्षेत्र की आय का अनुमान उत्पाद-विधि (output method) से तथा शेष क्षेत्रों की आय का आकलन आय-विधि (Income-method) से किया जाता है।

विदेशी क्षेत्र। इनमें से कृषि, वानिकी, मत्स्यन, खनन तथा विनिर्माण क्षेत्र की आय का अनुमान उत्पाद-विधि (output method) से तथा शेष क्षेत्रों की आय का आकलन

आय-विधि (Income-method) से किया जाता है। उत्पाद-विधि में उत्पादित वस्तु कुल मात्रा को बाजार कीमतों से गुणा करके उसका मूल्य ज्ञात कर लिया जाता है और फिर उसमें से उत्पादन के दौरान प्रयुक्त आगतों और मूल्य हास का मूल्य घटा दिया जाता है। आय विधि में विभिन्न क्षेत्रों की आय का अनुमान अलग-अलग तरीकों से किया जाता है, जैसे- छोटे स्तर के उत्पादन क्षेत्रों में श्रमिकों की कुल संख्या को उनकी औसत मजदूरी से गुणा करके उनकी आयु निर्धारित की जाती है। साथ ही मजदूरी (वेतन) के अतिरिक्त अन्य प्रकार के पारिश्रमिक (वेतन को छोड़कर) के लिए उसमें 20% मूल्य और जोड़ दिया जाता है। बैंकिंग व बीमा-क्षेत्र की आय की गणना उनके बैलेन्स-शीट के आधार पर की जाती है। साथ ही उसमें अपने कामगारों को दिये गये वेतन, भत्ते आदि का मूल्य भी जोड़ दिया जाता है।

 

राष्ट्रीय आय का लेखांकन

राष्ट्रीय आय लेखा मौजूदा अर्थव्यवस्था के ढ़ाँचे की माप करता है। राष्ट्रीय लेखा इस प्रकार से तैयार किया जाता है कि यह दर्पण की भाँति अर्थव्यवस्था के ढ़ाँचे को दर्शाता है। लेखे के माध्यम से कार्य करना समष्टि अर्थव्यवस्था के काम को समझने की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम है।

आर्थिक गतिविधियों को तीन प्रकार से मापा जा सकता है :

  1. अर्थव्यवस्था में कुल उत्पादन
  2. उत्पादन कर्ता की अर्जित आय
  3. अंतिम उपभोक्ता द्वारा किया गया कुल व्यय

ऊपर दिए गए तीनों तरीकों से राष्ट्रीय आय की गणना मुद्रा में की जाए तो समान गणना आएगी।

क. आय का चक्रीय प्रवाह

वित्तीय प्रवाह आरेख परस्पर आर्थिक संबंधों के अध्ययन में उपयोगी है जो प्राप्त आय और प्रत्येक सेक्टर में दिये गए वेतन को दिखाता है।

राष्ट्रीय आय की गणना की तीनों विधियों का समान परिणाम अर्थव्यवस्था में मुद्रा प्रवाह को दिखाता है।

उपरोक्त रेखाचित्र में मौद्रिक प्रवाह किसी अर्थव्यवस्था में कैसे होता है, दर्शाया गया है। किसी भी अर्थव्यवस्था को 4 क्षेत्रों में बांटा जा सकता है : 1. पारिवारिक क्षेत्र (Household) 2. उत्पादन क्षेत्र (Firms), 3. सरकारी क्षेत्र (Government), 4. शेष विश्व क्षेत्र (Rest of the world)

पारिवारिक क्षेत्र अपना श्रम और अपनी सेवाएं फर्मों को और सरकार को प्रदान करता है और बदले में उन्हें मजदूरी, लगान, ब्याज तथा लाभ के रूप में मौद्रिक आय प्राप्त होती है। पारिवारिक क्षेत्र फर्मों में और सरकार के लिए श्रम करके मजदूरी प्राप्त करता है।

सरकारी और कॉरपोरेट बांडों से ब्याज और अर्थव्यवस्था-संघों से लाभांश परिवार क्षेत्र की अन्य प्राप्तियाँ हैं। सरकार सामाजिक सुरक्षा लाभ, वृद्धावस्था लाभ और कल्याण निधि से भी कुछ राशि परिवारों को देती है। इस प्रकार के भुगतान के लिए प्राप्तकर्ता सरकार को कोई वस्तु/सेवा श्रम नहीं प्रदान करते। इसे हस्तांतरित भुगतान कहा जाता है। ये सभी प्राप्तियां परिवार द्वारा कुल आय का निर्माण करती हैं।

परिवारिक क्षेत्र उपभोग के लिए वस्तुएं एवं सेवाएं फर्मों से खरीदता है जिसके लिए उत्पादन क्षेत्र को भुगतान करता है और सरकार को कर देता है। यह परिवार क्षेत्र के कुल भुगतान का निर्माण करता है। परिवार क्षेत्र की कुल आय और कुल भुगतान का अंतर बचत है। यह बचत आय का वह भाग है जो व्यय के रूप में चक्रीय प्रवाह में नहीं आता, इसलिए यह वापसी का एक प्रकार है। आयात भी एक वापसी है क्योंकि परिवारिक क्षेत्र आयात के रूप में पैसे को अर्थव्यवस्था के आय के प्रवाह से बाहर कर देता है।

फर्में सरकारी क्षेत्र और परिवारिक क्षेत्र को वस्तुएं एवं सेवाएं बेचती हैं और उनसे आय प्राप्त करती हैं। उत्पादक क्षेत्र सरकार को कर देता है एवं उनसे आर्थिक सहायता भी प्राप्त करता है। शेष विश्व क्षेत्र उपभोग के लिए उत्पादक क्षेत्र से वस्तुएं एवं सेवाएं लेता है और इससे निर्यात का भुगतान करता है।

ख. राष्ट्रीय आय की माप विधि

राष्ट्रीय आय लेख का प्रयोग मौजूदा आर्थिक गतिविधि को मापने में किया जाता है।

किसी भी समय की अवधि के दौरान, आर्थिक गतिविधि निम्न 3 तरीकों से मापी जा सकती है :

  1. अर्थव्यवस्था में कुल उत्पादन
  2. उत्पाद के निर्माता द्वारा प्राप्त आय- इसको आय विधि कहते हैं।
  3. अंतिम उपभोक्ताओं द्वारा किया गया कुल व्यय – इसको व्यय विधि कहते हैं।

उपर्युक्त तरीकों में से किसी से भी गणना की जाए तो मौद्रिक राष्ट्रीय आय समान होगी।

  1. व्यय विधि

एक लेखा वर्ष में बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद पर किए गए अंतिम व्यय को जोड़ कर आकलन किया जाता है। सकल घरेलू उत्पाद निम्न चार प्रमुख तरह के व्यय को जोड़ कर मिलता है : निजी उपभोग, निवेश, सरकारी उपभोग और शुद्ध निर्यात।

क. निजी उपभोग

घरेलू बाजार में उपभोक्ता- परिवारों द्वारा किए गए व्यय को निजी उपभोग कहते हैं। यह व्यय का मूल भाग होता है। 2010 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में इसका भाग 56 % था। उपभोग पर किए गए व्यय को मुख्य रूप से इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है :-

1)   टिकाऊ उपभोग, जिसमें लंबे समय तक उपयोगी सामान जैसे कार टी. वी., फर्नीचर इत्यादि आते हैं।

2)   अर्ध टिकाऊ, अल्पावधि उपयोगी सामान जिनमें खाद्य पदार्थ, और ईंधन तेल आदि सामान आते हैं।

3)   सेवाएं, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात सुविधाएँ, आर्थिक सेवाएँ आदि।

ख. निवेश

निर्माण कर किए जाने वाले व्यय जैसे कि सीमेंट, स्टील, ईंट, श्रम व पूंजी उपकरणों पर किए गए व्यय अथवा स्टाक में होने वाले भौतिक परिवर्तनों पर किए जाने वाले व्यय को मिलाकर अर्थव्यवस्था के कुल निवेश संख्या की गणना होती है। भारत के 2010 के सकल घरेलू उत्पाद का 37 प्रतिशत भाग निवेश का था।

ग. सरकारी उपभोग

तीसरा सबसे बड़ा व्यय सरकारी अंतिम उपभोग व्यय है। उद्यमों द्वारा सरकार को बेची गई कुल बिक्री एवं सरकार द्वारा विदेशों से की गई खरीद के कुल जमा से कुल सरकारी उपभोग व्यय की राशि मिलती है। भारत में सन् 2010 में सरकारी उपभोग सकल घरेलू उत्पाद का 1 प्रतिशत था। सरकार हस्तांतरण भुगतान भी करती है, जिसके बदले में वह किसी वस्तु या सेवा की खरीद नहीं करती। सामाजिक सुरक्षा लाभ, वृद्धावस्था लाभ, छात्रवृत्तियाँ आदि हस्तांतरण भुगतानों को इस अंश में नहीं गिना जाता। इनकी गणना सरकारी उपभोग में इसलिए नहीं होती क्योंकि यह आर्थिक सहायता या हस्तांतरण भुगतान फर्मों या परिवारों को दिए जाते हैं, जो फिर बाजार में जाकर इस रकम को खर्च करते हैं। यह खरीदी फिर निजी उपभोग या निवेश का रूप लेती है।

घ. शुद्ध निर्यात

निर्यात व आयात की गई वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य-अंतर को शुद्ध निर्यात कहा जाता है। निर्यातित वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन किसी देश में होता है पर उसका उपभोग विदेशी करते हैं। 2010 में निर्यात सकल घरेलू उत्पाद का 22 प्रतिशत था। आयात उन वस्तुओं एवं सेवाओं का किया जाता है जिनका उत्पादन विदेश में होता है किंतु उपभोग व्यय घरेलू देश में होता है। यह 2010 के सकल घरेलू उत्पाद का 26 प्रतिशत था।

निर्यात का उत्पादन किसी देश के साधनों द्वारा किया जाता है। इसलिए उसे सकल घरेलू उत्पाद में जोड़ा जाता है। क्योंकि आयात का असर घरेलू उत्पादित वस्तुओं पर नहीं पड़ता है, इसलिए उसे घटा दिया जाता है।

बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद = निजी उपभोग ‌+ सरकारी उपभोग + शुद्ध निर्यात

  1. आय विधि

आय विधि के आधार पर, राष्ट्रीय आय में आठ प्रकार की आय का समावेश होता है। उत्पादकों द्वारा किया गया मुनाफा जिसमें सरकार को दिया गया कर भी शामिल है। ये आठ भाग इस प्रकार हैं :

क. मजदूरी तथा वेतन या कर्मचारियों का पारिश्रमिक

कर्मचारियों के पारिश्रमिक में मजदूरी तथा वेतन, बोनस, कमीशन, महंगाई भत्ता, नि: शुल्क आवास, वर्दी, चिकित्सा सुविधाएं, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में मालिकों का योगदान तथा सेवा निवृत्त कर्मचारियों की पेंशन आदि शामिल हैं।

ख. मिश्रित आय

मिश्रित आय से अभिप्राय है गैर- निगम स्वरोजगारों की आय। स्वरोजगार जैसे कि डॉक्टर पूँजी के भी स्वामी होते हैं, तो स्वरोजगार आय में मजदूरी, ब्याज एवं लाभ सम्मिलित होता है।

ग. किराए से प्राप्त आय

भूमि या भवन के स्वामित्व से प्राप्त आय को किराया कहते हैं। लेखकों द्वारा प्राप्त रॉयल्टी भी इसी का अंश है।

घ. निगम लाभ

निगम के पास मजदूरी, ब्याज और किराया देने के बाद जो धनराशि बचती है उसे निगम लाभ कहते हैं। निगम लाभ का वह भाग जो हिस्सेदारों में बाँटा जाता है, उसे लाभांश कहते हैं। निगम लाभ से निगम-लाभ कर का भुगतान करने के बाद लाभांश बाँटा जाता है; जो इसी का एक अंश होता है। फर्में निगम शेष लाभ बचत के रूप में अपने पास रख लेती हैं।

ड. शुद्ध ब्याज

व्यक्तिगत द्वारा प्राप्त ब्याज और दूसरे को ब्याज के भुगतान के अंतर को शुद्ध ब्याज कहते हैं। ब्याज दिए गए ऋणों पर प्राप्त किया जाता है।

च. उत्पाद और आयात पर कर

इसमें अप्रत्यक्ष व्यापार कर जैसे बिक्रीकर और आबकारी कर सीमा शुल्क होते हैं अथवा परिवार क्षेत्र द्वारा दिया गया मोटर गाड़ी लायसेंस पर कर और आवासीय भवनों पर कर शामिल होते हैं।

छ. व्यापारी द्वारा हस्तांतरण भुगतान

व्यापारी जब सरकार या अन्य व्यक्तियों को भुगतान करता है किंतु वह भुगतान किसी भी वस्तु, सेवा या मजदूरी के लिए नहीं होता है, उसे व्यापारी द्वारा किया हस्तांतरण भुगतान कहते हैं। धर्मार्थ दान इसका एक उदाहरण है।

ज. सरकारी उद्यमों का अधिशेष

सरकारी उद्यमों का अधिशेष सरकारी उद्यमों का मौजूदा वर्ष का लाभ होता है। इन आठों को जोड़ने के बाद घिसावट और विदेशों से शुद्ध साधन आय को जोड़ा जाता है। अंतत: वह जोड़ सकल घरेलू उत्पाद कहलाता है।

भारत में राष्ट्रीय आय के अनुमान लगाने में कठिनाइयां

राष्ट्रीय आय के अनुमान लगाने हेतु शुद्ध आंकड़ों का उपलब्ध होना आवश्यक है। चूंकि भारत एक अल्पविकसित देश है और देश में अशिक्षा का प्रकोप काफी व्यापक रूप में फैला हुआ है, अतः सभी क्षेत्र से आय सम्बन्धी स्पष्ट एवं सही जानकारी नहीं प्राप्त हो पाती। इस सम्बन्ध में आने वाली प्रमुख समस्याएं निम्न हैं

  1. सैद्धान्तिक समस्याएं- राष्ट्रीय आय के अनुमान हेतु सर्वप्रमुख सैद्धान्तिक समस्या इस विषय को लेकर है कि क्या सेवाओं को राष्ट्रीय आय में शामिल किया जाए और यदि किया जाए, तो किन सेवाओं को शामिल किया जाय? केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन ने राष्ट्रीय आय गणना में सिर्फ उन्हीं ‘सेवाओं’ को शामिल किया है, जिन्हें मुद्रा के रूप में मापा जा सकता है। दूसरी महत्वपूर्ण सैद्धान्तिक समस्या-प्रशासनिक सेवाओं के राष्ट्रीय आय में योगदान को लेकर है।

अन्य समस्याएं व्यावहारिक हैं और वे भारतीय अर्थव्यवस्था के संरचनात्मक स्वरूप से सम्बन्धित रही हैं। उनमें प्रमुख हैं

  1. देश की अर्थव्यवस्था का बहुत बड़ा अंश गैरमौद्रीकृत ओर असंगठित है। 3. देश में काले धन का अस्तित्व काफी विशाल है। 4. क्षेत्रीय असमानताओं की अधिकता के कारण सर्वेक्षण कार्य गहन रूप में करना आवश्यक है, अतः नमूना सर्वेक्षण विधि से एकत्रित जानकारी गलत हो जाती है। 5. देश की कार्यकारी जनसंख्या के व्यावसायिक वितरण के विषय में पूर्ण जानकारी का अभाव है। 6. अन्य प्रकार के आकड़े भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है।

 

 

 

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