भारत की राजव्यवस्था एवं शासन प्रणाली

भारत की राजव्यवस्था एवं शासन प्रणाली ब्रिटिश विरासत की देन है ।
इस पर भारतीय परम्परा और संस्कृति का भी गहरा प्रभाव है। साथ ही
हुआ है। सर्व भवन्तु सुखिनः के पुरो वाक्य के उद्घोष के साथ भारत की
प्रणाली लोकतांत्रिक है, जो गणतंत्र पर आधारित है। एक लोकतंत्र के रूप
में भारत की शासन व्यवस्था. में जनता की सहभागिता को सुनिश्चित किया
गया है। प्रतिनिधियात्मक शासन के अनुरूप जनता अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों
के माध्यम से शासन कार्यों से जुड़ी होती है जबकि गणतंत्र की मूल भावना
के अंतर्गत भारत का राष्ट्राध्यक्ष वंशानुगत न होकर निर्वाचित प्रकार का है।
राष्ट्राध्यक्ष के रूप में राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख है जिसमें देश की समस्त
कार्यपालिकीय शक्तियां अंतर्निहित हैं जबकि इन शक्तियों का वास्तविक प्रयोग
शासनाध्यक्ष के रूप में प्रधानमंत्री एवं उसकी मंत्रिपरिषद् द्वारा की जाती है।
भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत की राजव्यवस्था संघात्मक है तथा
जिस शासन व्यवस्था का प्रावधान किया गया है वह संसदात्मक है। भारत
की राजनीतिक प्रणाली के आधार स्तम्भ संसदीय प्रणाली और संघात्मक ढांचे
का विकास ब्रिटिशकाल में हुआ। संसदीय शासन प्रणाली का प्रारंभ सर्वप्रथम
भारत शासन अधिनियम, 1919 के अंतर्गत द्वैध शासन व्यवस्था के क्रियांवयन
के साथ हुआ। इस प्रकार के शासन में प्रांतीय विषयों को दो भागों – रक्षित
और हस्तांतरित में बांटा गया था । हस्तांतरित विषयों का संचालन मंत्रियों
द्वारा किये जाने का प्रावधान किया गया था, जो अपने कार्य के लिए
विधानसभा के प्रति उत्तरदायी थे। इसी प्रकार संघात्मक ढांचे का बीजारोपण
वैसे तो नेहरू रिपोर्ट और साइमन आयोग रिपोर्ट से हो गया था, परन्तु इसका
विश्व के उन उधार तत्वों पर आधारित है जिनसे भारतीय संविधान निर्मित
पहली बार विस्तृत विवरण भारत शासन अधिनियम, 1935 में प्रस्तुत किया गया था। यद्यपि इस अधिनियम में शामिल संघीय व्यवस्था क्रियांवित नहीं हो सकी थी, तथापि इसका भारतीय संविधान की संघीय व्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ा है।
भारत की शासन व्यवस्था संसदात्मक है। संसद की सर्वोच्चता को स्थापित
करते हुए उसे पूरी राजव्यवस्था का केन्द्र बनाया गया है। उसे विधि निर्माण
का एकमात्र अधिकार प्राप्त है। संसद की अनुमति के बिना न तो कोई कर
लगाया जा सकता है और न ही कोई व्यय किया जा सकता है। कार्यपालिका
अर्थात् मंत्रिपरिषद के निर्माण में संसद की महत्वपूर्ण भूमिका निर्धारित की गई
है। कार्यपालिका की सदस्यता के लिए संसद की सदस्यता को अनिवार्य बनाया
गया है। संपूर्ण मंत्रिपरिषद संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। सामान्यतः
– ससद को संप्रभु घोषित किया गया है परन्तु यह विवादित प्रश्न है कि भारतीय
संसद संप्रभु है। वस्तुतः भारत में संप्रभुता को जनता में निर्धारित किया गया
है। यहां तक कि संविधान का निर्माण जनता के नाम से किया गया है।
हालांकि जनता स्वयं इस संप्रभुता का प्रयोग नहीं कर सकती अतः इसके लिए
संविधान की स्थापना की गई है। संविधान की व्याख्या करने का अधिकार
सर्वोच्च न्यायालय को प्राप्त है। इस आधार पर भारत की संप्रभुता सवच्च
न्यायालय में दिखाई पड़ती है परन्तु संसद द्वारा संविधान में संशोधन की शक्ति
प्राप्त होने के कारण वस्तुस्थिति यह है कि संप्रभुता संसद में अंतनिर्हित है।
जबकि सर्वोच्च न्यायालय संविधान का प्रहरी व अंतिम व्याख्याता है।
भारतीय राजव्यवस्था का मूल स्रोत भारत का संविधान है। अतः
संविधान का विकास, संवैधानिक व्यवस्थाएं एवं कार्यव्यवहार में भारत का
संविधान का व्यापक विश्लेषण अपेक्षित है।

Website worth
http://fkrt.it/DvnHdTuuuN

प्रमुख अनुच्छेद :
मौलिक अधिकार : अनु. 12 से 35 (भाग-3)
स्वतन्त्रता का अधिकार : अनु. 19
अस्पृश्यता का अंत : अनु. 17
प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार : अनु. 21
कांरखानों या खान में 14 वर्ष से कम आयु के बालकों के नियोजन
पर प्रतिबन्ध : अनु. 24
राज्य के नीति निर्देशक तत्व : अनु. 36 से 51 भाग-4
मौलिक कर्तव्य : अनु. 51 के (भाग-4 क)
धन विधेयक : अनु. 110
वार्षिक वित्तीय विवरण : अनु. 112
लेखानुदान : अनु. 116
राष्ट्रीय आपात : अनु. 352
राज्यों में आपात (राष्ट्रपति शासन) : अनु. 356
वित्तीय आपात : अनु. 360
संविधान संशोधन : अनु. 368
जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष प्रावधान : अनु. 370
हिन्दी भाषा में संविधान का प्राकृतिक पाठ : अनु. 394क
पंचायती राज : अनु. 40, 243-243
नगरपालिका : अनु. 243 त, 243 य, छ
प्रमुख पदाधिकारियों के लिए निर्धारित आयुसीमा
राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति बनने के लिए कम से कम आयु : 35 वर्ष
राज्यपाल बनने के लिए कम से कम आयु : 35 वर्ष
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु : 65 वर्ष
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु : 62 वर्ष
लोक सभा का सदस्य बनने के लिए कम से कम आयु : 25 वर्ष
‘राज्य सभा का सदस्य बनने के लिए कम से कम आयु : 30 वर्ष
मतदाता की कम से कम आयु : 18 वर्ष
विवाह के लिए लड़के की कम से कम आयु : 21 वर्ष
विवाह के लिए लड़की की कम से कम आयु : 18 वर्ष
संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य का कार्यकाल: 65 वर्ष की आयु तक
अथवा 6 वर्ष का कार्यकाल, जो भी पहले हो ।
राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य का कार्यकाल : 62 वर्ष की आयु तक
अथवा 6 वर्ष का कार्यकाल, जो भी पहले हो।
प्रमुख संस्थाओं की सदस्य संख्या :
* संविधान सभा : 389 (292 प्रान्तों से, 93 देशी रियासतों से व 4 कमिश्नरी
क्षेत्रों से)
लोक सभा (अधिकतम सदस्य संख्या ) : 552 (530 राज्यों से + 20 संघीय
क्षेत्रों + 2 राष्ट्रपति द्वारा नामित)
राज्य सभा (अधिकतम सदस्य संख्या) : 250 (238 राज्यों से + 12 राष्ट्रपति
द्वारा नामित)
विधान सभा : अधिकतम सदस्य संख्या -500, न्यूनतम-60
विधान सभा जहाँ साठ से कम सदस्य संख्या है : गोवा- 40, मिजोरम-40,
सिक्किम-32, पांडिचेरी-30

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