भारत का उपराष्ट्रपति (vice president of india)

भारत का उपराष्ट्रपति:-

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उपराष्ट्रपति का राज्य सभा का पदेन सभापति होना— उपराष्ट्रपति, राज्य सभा का पदेन सभापति होगा और अन्य कोई लाभ का पद धारण नहीं करेगा। परंतु जिस किसी अवधि के दौरान उपराष्ट्रपति, अनुच्छेद 65 के अधीन राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है या राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन करता है, उस अवधि के दौरान वह राज्य सभा के सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन नहीं करेगा और वह अनुच्छेद 97 के अधीन राज्य सभा के सभापति को संदेय वेतन या भत्ते का हकदार नहीं होगा।

राष्ट्रपति के पद में आकस्मिक रिक्ति के दौरान या उसकी अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति का राष्ट्रपति के रूप में कार्य करना या उसके कृत्यों का निर्वहन

  • (1) राष्ट्रपति की मृत्यु, पदत्याग या पद से हटाए जाने या अन्य कारण से उसके पद में हुई रिक्ति की दशा में उपराष्ट्रपति उस तारीख तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा जिस तारीख को ऐसी रिक्ति को भरने के लिए इस अध्याय के उपबंधों के अनुसार निर्वाचित नया राष्ट्रपति अपना पद ग्रहण करता है।
  • (2) जब राष्ट्रपति अनुपस्थिति, बीमारी या अन्य किसी कारण से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है तब उपराष्ट्रपति उस तारीख तक उसके कृत्यों का निर्वहन करेगा जिस तारीख को राष्ट्रपति अपने कर्तव्यों को फिर से संभालता है।

उपराष्ट्रपति को उस अवधि के दौरान और उस अवधि के संबंध में, जब वह राष्ट्रपति के रूप में इस प्रकार कार्य कर रहा है या उसके कृत्यों का निर्वहन कर रहा है, राष्ट्रपति की सभी शक्तियाँ और उन्मुक्तियाँ होंगी तथा वह ऐसी उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का जो संसद, विधि द्वारा, अवधारित करे और जब तक इस निमित्त इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक ऐसी उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का, जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं, हकदार होगा।

उपराष्ट्रपति का निर्वाचन

(1) उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचकगण के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होगा और ऐसे निर्वाचन में मतदान गुप्त होगा।

(2) उपराष्ट्रपति संसद के किसी सदन का या किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं होगा और यदि संसद के किसी सदन का या किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन का कोई सदस्य उपराष्ट्रपति निर्वाचित हो जाता है तो यह समझा जाएगा कि उसने उस सदन में अपना स्थान उपराष्ट्रपति के रूप में अपने पद ग्रहण की तारीख से रिक्त कर दिया है।

(3) कोई व्यक्ति उपराष्ट्रपति निर्वाचित होने का पात्र तभी होगा जब वह–

(क) भारत का नागरिक है, (ख) पैंतीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका है और

(ग) राज्य सभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए अर्हित है।

(4) कोई व्यक्ति, जो भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के अधीन अथवा उक्त सरकारों में से किसी के नियंत्रण में किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन कोई लाभ का पद धारण करता है, उपराष्ट्रपति निर्वाचित होने का पात्र नहीं होगा।

स्पष्टीकरण–इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए, कोई व्यक्ति केवल इस कारण कोई लाभ का पद धारण करने वाला नहीं समझा जाएगा कि वह संघ का राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल  है अथवा संघ का या किसी राज्य का मंत्री है।

उपराष्ट्रपति की पदावधि

(1) उपराष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा: परंतु–

(क) उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा;

(ख) उपराष्ट्रपति, राज्य सभा के ऐसे संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकेगा जिसे राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत ने पारित किया है और जिससे लोकसभा सहमत है; किंतु इस खंड के प्रयोजन के लिए कई संकल्प तब तक प्रस्तावित नहीं किया जाएगा जब तक कि उस संकल्प को प्रस्तावित करने के आशय की कम से कम चौदह दिन की सूचना न दे दी गई हो;

(ग) उपराष्ट्रपति, अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर भी, तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है।

उपराष्ट्रपति के पद में रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन करने का समय और आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचित व्यक्ति की पदावधि

(1) उपराष्ट्रपति की पदावधि की समाप्ति से हुई रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन, पदावधि की समाप्ति से पहले ही पूर्ण कर लिया जाएगा।

(2) उपराष्ट्रपति की मृत्यु, पदत्याग या पद से हटाए जाने या अन्य कारण से हुई उसके पद में रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन, रिक्ति होने के पश्चात्‌ यथाशीघ्र किया जाएगा और रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचित व्यक्ति, अनुच्छेद 67 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अपने पद ग्रहण की तारीख से पाँच वर्ष की पूरी अवधि तक पद धारण करने का हकदार होगा।

उपराष्ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान

प्रत्येक उपराष्ट्रपति अपना पद ग्रहण करने से पहले राष्ट्रपति अथवा उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी व्यक्ति के समक्ष निम्नलिखित प्ररूप में शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा, अर्थात्‌: — ईश्वर की शपथ लेता हूँ

मैं, अमुक ———————————कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञा करता हूँ, श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा तथा जिस पद को मैं ग्रहण करने वाला हूँ उसके कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करूँगा।

भारत के उप-राष्ट्रपति
नाम कार्यकाल
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1888 – 1975) 1952 – 1962
डॉ. जाकिर हुसैन (1897 – 1969) 1962 – 1967
वराहगिरि वेंकटगिरि (1884 – 1980) 1967 – 1969
गोपाल स्वरूप पाठक (1896 – 1982) 1969 – 1974
बी.डी. जत्ती (1913 – 2002) 1974 – 1979
न्यायमूर्ति मोहम्मद हिदायतुल्लाह (1905 – 1992) 1979 – 1984
आर. वेंकटरमण (जन्म – 1910) 1984 – 1987
डॉ. शंकर दयाल शर्मा (1918 – 1999) 1987 – 1992
के. आर. नारायणन (1920 – 1925) 1992 – 1997
कृष्णकांत (1927 – 2002) 1997 – 2002
भैरों सिंह शेखावत (जन्म – 1923) 2002 – 2007
मोहम्मद हामिद अंसारी (जन्म – 1937) अगस्त 11, 2007 से वर्तमान तक

 

Salary ₹125,000 (US$1,900) per month(February 2015)

 

नाम: श्री मो. हामिद अंसारी
पिता का नाम: श्री मोहम्मद अब्दुल अज़ीज़ अंसारी
माता का नाम: श्रीमती आसिया बेगम
जन्म तिथि: 1 अप्रैल, 1937
जन्म स्थान: कलकत्ता
वैवाहिक स्थिति: विवाहित
पत्नी का नाम: श्रीमती सलमा अंसारी
संतान: दो पुत्र और एक पुत्री
शैक्षणिक योग्यताएं: बी.ए. (आनर्स); एम.ए. (राजनीतिक विज्ञान)
पता: उपराष्ट्रपति निवास,
6, मौलाना आज़ाद रोड,
नई दिल्ली – 110 011
दूरभाष: 011-23016422, 23016344
ई-मेल: vpindia[at]nic[dot]in

प्रकाशित पुस्‍तकें: संपादित, इरान टुडे: ट्वेन्‍टी फाइव इयर्स आफ्टर द इस्‍लामिक रिवोल्‍युशन, नई दिल्‍ली, 2005 ; पश्चिम एशियाई राजनीति पर अनेक शैक्षिक शोध पत्र और समाचार पत्रों में लेख लिखे हैं।

पुरस्‍कार: पद्म श्री (1984)

 

 

उपराष्ट्रपति का निर्वाचन

  1. उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचकगण द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है और ऐसे निर्वाचन में मतदान गुप्त होता है। उपराष्ट्रपति के पद के लिए किसी व्यक्ति को निर्वाचित किए जाने हेतु निर्वाचकगण में संसद के दोनों सदनों के सदस्य होते हैं।*
  2. उपराष्ट्रपति संसद के किसी सदन का या किसी राज्य के विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं होता है। यदि संसद के किसी सदन का या किसी राज्य के विधानमंडल के किसी सदन का कोई सदस्य उपराष्ट्रपति निर्वाचित हो जाता है, तो यह समझा जाता है कि उसने उस सदन में अपना स्थान उपराष्ट्रपति के रूप में अपने पद ग्रहण की तारीख से रिक्त कर दिया है।
  3. कोई व्यक्ति उपराष्ट्रपति तभी निर्वाचित हो सकता है जब वह-
  4. (क) भारत का नागरिक है;
  5. (ख) पैंतीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका है, और
  6. (ग) राज्य सभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए अर्हित है।

कोई व्यक्ति, जो भारत सरकार के या किसी राज्य सरकार के अधीन या किसी अधीनस्थ स्थानीय प्राधिकरण के अधीन कोई लाभ का पद धारण करता है, वह भी इसका पात्र नहीं है।

  1. उपराष्ट्रपति की पदावधि की समाप्ति से हुई रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन, पदावधि की समाप्ति से पहले ही पूर्ण कर लिया जाता है। यदि रिक्ति मृत्यु, पदत्याग या पद से हटाए जाने या अन्य कारण से होती है, तब उस रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन, रिक्ति होने के पश्चात् यथाशीघ्र किया जाता है**। इस प्रकार निर्वाचित व्यक्ति अपने पद ग्रहण की तारीख से पूरे पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करने का हकदार होता है।

उपराष्ट्रपति के निर्वाचन का अधीक्षण:

भारत का निर्वाचन आयोग उपराष्ट्रपति के पद के लिए निर्वाचन कराता है।

उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित महत्वपूर्ण उपबंध:

  1. अगले उपराष्ट्रपति का निर्वाचन निवर्तमान उपराष्ट्रपति की पदावधि की समाप्ति के 60 दिनों के भीतर किया जाना होता है।
  2. उपराष्ट्रपति निर्वाचनों को संचालित करने के लिए सामान्यत: नियुक्त निर्वाचन अधिकारी चक्रानुक्रम में संसद के किसी भी सदन का महासचिव होता है। निर्वाचन अधिकारी विहित प्रपत्र में अभ्यर्थियों का नामांकन आमंत्रित करते हुए निर्वाचन के संबंध में इस आशय की सार्वजनिक सूचना जारी करता है और उस स्थान को विनिर्दिष्ट करता है जहां नामांकन पत्र प्रस्तुत किए जाएंगे।

निर्वाचित होने के लिए अर्हित तथा उपराष्ट्रपति के रूप में निर्वाचन के लिए खड़े होने वाले किसी भी व्यक्ति को कम से कम 20 संसद सदस्यों द्वारा प्रस्तावक के रूप में और कम से कम 20 संसद सदस्यों द्वारा समर्थक के रूप में नामित किया जाना अपेक्षित है।

निर्वाचन अधिकारी को नामनिर्देशन पत्र ऐसे स्थान पर व ऐसे समय व तारीख तक प्रस्तुत किये जाने होते हैं जिन्हें सार्वजनिक सूचना में विनिर्दिष्ट किया गया हो। किसी अभ्यर्थी द्वारा या उसकी ओर से अधिकतम चार नामांकन-पत्र प्रस्तुत किए जा सकते हैं या निर्वाचन अधिकारी द्वारा स्वीकार किए जा सकते हैं।

  1. उपराष्ट्रपति के रूप में निर्वाचन चाहने वाले अभ्यर्थी को 15,000/- रू. की जमानत राशि जमा करनी होती है। अभ्यार्थी की ओर से दायर नामांकन पत्रों की संख्या चाहे कितनी भी हो, उसे सिर्फ यही राशि जमा करानी होगी।
  2. नामांकन पत्रों की संवीक्षा निर्वाचन अधिकारी द्वारा विनिर्दिष्ट तिथि पर अभ्यर्थी व उसके प्रस्तावक या समर्थक तथा विधिवत् प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति की उपस्थिति में की जाती है।
  3. कोई भी अभ्यर्थी विनिर्दिष्ट समय के भीतर निर्वाचन अधिकारी को विहित प्रपत्र में लिखित सूचना देकर अपनी अभ्यर्थिता वापस ले सकेगा।
  4. निर्वाचन में निर्वाचक के पास उतनी ही वरीयताएं होती हैं जितने अभ्यर्थी होते हैं। अपना मत डालने में, मतदाता को अपने मत-पत्र पर उस अभ्यर्थी के नाम के सामने दिए स्थान पर अंक 1 अभिलिखित करना अपेक्षित है जिसका चयन वह अपनी प्रथम वरीयता के रूप में करता है और इसके अतिरिक्त वह अपने मत-पत्र पर अन्य अभ्यर्थी के नामों के सामने दिए स्थान पर अंक 2,3,4 इत्यादि अभिलिखित करके उतनी परवर्ती वरीयताएं अभिलिखित कर सकेगा जितनी वह चाहता है। मतों को भारतीय अंकों के अंतरराष्ट्रीय रूप में या रोमीय रूप में या किसी भारतीय भाषा के रूप में अभिलिखित किया जाना चाहिए, परन्तु शब्दों में नहीं दर्शाया जाना चाहिए।

प्रत्येक मत पत्र प्रत्येक गणना में एक मत व्यपदिष्ट करता है। मतों की गणना की प्रक्रिया में निम्नलिखित चरण सम्मिलित हैं :

  1. (क) प्रत्येक अभ्यर्थी द्वारा प्राप्त किए गए प्रथम वरीयता वाले मतों की संख्या का पता लगाया जाता है।
  2. (ख) इस प्रकार पता लगाई गई संख्याओं को जोड़ा जाता है – योग को दो से विभाजित किया जाता है और किसी भी शेषफल पर ध्यान न देते हुए भागफल में एक जोड़ा जाता है। परिणामी संख्या ऐसा कोटा होती है जो कि निर्वाचन में अपनी वापसी सुनिश्चित करने के लिए किसी अभ्यर्थी के लिए पर्याप्त है।
  3. यदि प्रथम या किसी परवर्ती गणना के अंत में, किसी अभ्यर्थी के जमा वोटों की कुल संख्या कोटे के बराबर या इससे अधिक हो, तो उस अभ्यर्थी को निर्वाचित घोषित किया जाता है।
  4. यदि किसी गणना के अंत में, किसी भी अभ्यर्थी को निर्वाचित घोषित नहीं किया जा सके, तो,
  5. इस चरण तक जिस अभ्यर्थी को सबसे कम संख्या में मत मिले हों, उसे चुनाव से अपवर्जित कर दिया जाएगा, और उसके सभी मतपत्रों की एक-एक करके, पुन: संवीक्षा की जाएगी जो कि उन पर अंकित दूसरी वरीयता, यदि कोई हो, के संदर्भ में होगी। इन मतपत्रों को उन संबंधित शेष (अविच्छिन्न) अभ्यर्थियों को अंतरित कर दिया जाएगा जिनके लिए ऐसी दूसरी वरीयताएं मतपत्रों पर अंकित की गई हैं और उन मत पत्रों के वोटों के मूल्य को ऐसे अभ्यर्थियों द्वारा प्राप्त मतों के मूल्य में जोड़ दिया जाएगा। इन मत पत्रों को पूर्वोक्त अविच्छिन्न अभ्यर्थियों को अंतरित कर दिया जाएगा। जिन मत पत्रों पर दूसरी वरीयता अंकित नहीं की जाती है, उन्हें समाप्त मत पत्र मान लिया जाएगा और आगे उनकी गणना नहीं की जाएगी चाहे उनमें तीसरी या कोई परवर्ती वरीयता अंतर्विष्ट हो।

यदि इस गणना के अंत में, कोई अभ्यर्थी कोटा प्राप्त कर लेता है, तो उसे निर्वाचित घोषित कर दिया जाएगा।

  1. यदि दूसरी गणना के अंत में भी, किसी अभ्यर्थी को निर्वाचित घोषित न किया जा सके, तो यह गणना ऐसे अभ्यर्थी को अपवर्जित करके आगे जारी रखी जाएगी, जो अब इस चरण तक सूची में सबसे नीचे हो। उसके सभी मत पत्रों, जिनमें ऐसे मत पत्र सम्मिलित हैं, जिन्हें उसने दूसरी गणना के दौरान प्राप्त किया हो, की पुन: संवीक्षा की जाएगी जोकि उनमें से प्रत्येक पर अंकित “अगली उपलब्ध वरीयता” के संदर्भ में होगी। यदि पहली गणना में उसके द्वारा प्राप्त मत पत्र पर, अविच्छिन्न अभ्यर्थियों में से किसी अभ्यर्थी के लिए दूसरी वरीयता अंकित है, तो इसे उस अभ्यर्थी को अंतरित कर दिया जाएगा। यदि ऐसे किसी मत पत्र पर, उस अभ्यर्थी के लिए दूसरी वरीयता अंकित की जाती है जिसे पहले ही दूसरे दौर में अपवर्जित किया जा चुका है, तो ऐसे मत पत्र को अविच्छिन्न अभ्यर्थी के लिए तीसरी वरीयता, यदि कोई हो, के संदर्भ में अंतरित कर दिया जाएगा। इसी प्रकार, दूसरे दौर में अंतरण के माध्यम से उसके द्वारा प्राप्त किए गए मतपत्रों की भी उन पर अंकित की गई तीसरी वरीयता के संदर्भ में संवीक्षा भी की जाएगी।

सूची में निम्नतम अभ्यर्थियों के अपवर्जन की यह प्रक्रिया अविच्छिन्न अभ्यर्थियों में से एक के कोटा प्राप्त करने तक दोहराई जाएगी।

  1. निर्वाचन कराये जाने और मतों की गणना कराए जाने के बाद, निर्वाचन अधिकारी निर्वाचन का परिणाम घोषित करता है। उसके पश्चात्, वह केन्द्रीय सरकार (विधि और न्याय मंत्रालय) तथा भारत के निर्वाचन आयोग को इस परिणाम की जानकारी देता है और केन्द्रीय सरकार राजपत्र में उपराष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित व्यक्ति का नाम प्रकाशित कराती है।

उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित विवाद

  1. उपराष्ट्रपति के निर्वाचन के संबंध में पैदा होने वाले संदेहों और विवादों की भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा जांच की जाती है और निर्णय किया जाता है। उसका निर्णय अंतिम होता है।
  2. उपराष्ट्रपति के निर्वाचन को चुनौती देने वाली याचिका पर भारत के उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा सुनवाई की जाती है।
  3. इस याचिका के साथ अनिवार्य रूप से 20,000/-रूपये की जमानत राशि जमा करनी होती है।

 

उपराष्ट्रपति का सचिवालय

उपराष्ट्रपति सचिवालय का कामकाज वर्ष 1952 में आरंभ हुआ। इस सचिवालय के कर्मचारियों की कुल संख्या 58 है।

उपराष्ट्रपति का सचिव इस सचिवालय का प्रमुख होता है। सामान्यतया इस पद पर भारत सरकार के अपर सचिव/सचिव के रैंक के अधिकारी को नियुक्त किया जाता है। उपराष्ट्रपति के सचिव की सहायता निदेशक/विशेष कार्य अधिकारी/निजी सचिव/अवर सचिव के रैंक के वरिष्ठ अधिकारियों और अन्य अधिशासी, अनुसचिवीय तथा परिचालन कर्मचारीवृंद द्वारा की जाती है।

उपराष्ट्रपति सचिवालय में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की सांविधिक अपेक्षाओं के मद्देनजर, श्री अशोक दीवान, संयुक्त सचिव को अपीलीय प्राधिकारी व पारदर्शिता अधिकारी, श्रीमती हुरबी शकील, अवर सचिव को केन्द्रीय जन सूचना अधिकारी एवं श्री पवन सिंह बिष्ट, अनुभाग अधिकारी को सहायक केन्द्रीय जन सूचना अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया है।

सन्दर्भ :

vicepresidentofindia.nic.in

www.onlinegkguide.com

https://hi.wikipedia.org/wiki/भारत_के_उपराष्ट्रपति

knowindia.gov.in/hindi/knowindia

http://archive.india.gov.in/hindi/govt/whoswho.php?id=3

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