ब्रिटिश कालीन भारतीय शिक्षा

भारत में शिक्षा का विकास

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अंग्रेज़ो के द्वारा भारत में शिक्षा के विकास की शुरुआत 1781 में वारेन हेस्टिंग्स के द्वारा कलकत्ता मदरसा की स्थापना से हुई |इसका उद्देश्य मुस्लिम कानूनों तथा इससे सम्बंधित अन्य विषयों की शिक्षा देना था |इसके उपरांत 1791 में जोनाथन डंकन के प्रयत्नों से बनारस में संस्कृत कॉलेज की स्थापना की गई जिसका उद्देश्य हिन्दू विधि एवं दर्शन का अध्ययन करना था | 1800 में लार्ड वैलेजली के द्वारा फोर्ट विलियम की स्थापना की गई , जहाँ अधिकारियों को विभिन्न भारतीय भाषाओं तथा विभिन्न भारतीय रीति रिवाज़ों की शिक्षा दी जाती थी |
इन सब कॉलेजो में शिक्षा की पद्धति का ढांचा इस प्रकार तैयार किए गए की कंपनी को ऐसे शिक्षित भारतीय नियमित तौर पर उपलब्ध कराए जा सके जो शास्त्रीय व अन्य स्थानीय भाषा के ज्ञाता हो तथा कंपनी के क़ानूनी प्रशासन में उसे मदद कर सके |
यह वही समय था जब प्रबुद्ध भारतीयों एवं मिशनरियों ने सरकार पर आधुनिक ,धर्मनिरपेक्ष ,एवं पाश्चात्य शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए दबाव डालना प्रारम्भ कर दिया क्योंकि —
  • प्रबुद्ध भारतीयों ने निष्कर्ष निकाला की पाश्चात्य शिक्षा के माध्यम से ही देश की सामाजिक ,राजनितिक व आर्थिक दुर्बलता दूर किया जा सकता है |
  • मिशनरियों ने यह निष्कर्ष निकाला की पाश्चात्य शिक्षा के प्रचार से भारतीयों को अनेक परंपरागत धर्म में आस्था समाप्त हो जाएगी तथा वह ईसाई धर्म ग्रहण कर लेंगे |

शिक्षण संस्थाओं की स्थापना

सर्वप्रथम 1781 ई. में बंगाल के गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने फ़ारसी एवं अरबी भाषा के अध्ययन के लिए कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में एक मदरसा खुलवाया। 1784 ई. में हेस्टिंग्स के सहयोगी सर विलियम जोन्स ने ‘एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल’ की स्थापना की, जिसने प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति के अध्ययन हेतु महत्त्वपूर्ण प्रयास किया।

लॉर्ड वेलेज़ली ने 1800 ई. में गैर-सैनिक अधिकारियों की शिक्षा हेतु ‘फ़ोर्ट विलियम कॉलेज’ की स्थापना की। कुछ कारणों से इसे 1802 ई. में बंद कर दिया गया। 1813 ई. के चार्टर एक्ट में सर्वप्रथम भारतीय शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए एक लाख रुपये की व्यवस्था की गई, जिसको भारत में साहित्य के पुनरुद्धार तथा विकास के लिए एवं स्थानीय विद्वानों को प्रोत्साहन देने के लिए ख़र्च करने की व्यवस्था की गयी। अगले 40 वर्षों में महत्त्वपूर्ण विवाद निम्न विषयों पर था-

  1. शिक्षा की नीति का लक्ष्य
  2. शिक्षा का माध्यम
  3. शिक्षण संस्थाओं की व्यवस्था एवं शिक्षा प्रणाली

उस समय लोगों में शिक्षा प्रसार के लिए दो विचारधारायें सामने आयीं। पहली विचारधारा के अनुसार, शिक्षा के अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ। इस सिद्धान्त के अंतर्गत शिक्षा को उच्च वर्गों के माध्यम से निम्न वर्गों तक पहुँचाने की बात कही गयी, जबकि दूसरी विचारधारा के तहत् जनसामान्य तक शिक्षा को प्रचार-प्रसार के लिए कम्पनी को प्रत्यक्ष रूप से प्रयत्नशील रहने के लिए कहा गया।

1781 में गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने कलकत्ता मदरसा (Calcutta Madrasa) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य कंपनी के भारतीय अधिकारियो को फ़ारसी (तत्कालीन कामकाज की भाषा) का कार्यसाधक ज्ञान कराना था। तत्पश्चात् सन् 1784 में हेस्टिंग के सहयोगी सर विल्किंसन् जोन्स ने एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल (Asiatic Society of Bengal) की स्थापना की, जिसने प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्क़ति के अध्ययन हेतु महत्वपूर्ण प्रयास किये । उन्होंने ‘एशियाटिक रिसर्चेज’ नामक पत्रिका का प्रकाशन किया, जिसका उद्देश्य भारत के गौरवशाली अतीत को प्रकाश में लाना था। नवंबर 1784 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल के सदस्य विल्किंसन् ने पहली बार मूल ‘श्रीमद् भगवद् गीता’ का संस्कृत से अंग्रेजी में अनुवाद किया। तत्श्चात 1787 में विल्किंसन् ने ‘हितोपदेश’ का भी अनुवाद किया। 1789 ईo में विल्किंसन् जोन्स ने कालिदास रचित ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ का अंग्रेजी अनुवाद भी किया। इसके पश्चात सन् 1789 में विल्किंसन् जोन्स ने ‘गीतगोविंद’ का अंग्रेजी अनुवाद किया और उनकी मृत्यु के बाद सन् 1794 में ‘इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिन्दू लॉ’ के नाम से ‘मनुस्मृति’ का अनुवाद प्रकाशित हुआ। वस्तुतः विल्किंसन् जोन्स तथा विल्किंसन् महोदय भारत विषयक ज्ञानशास्त्र के जन्मदाता थे। मनुस्मृति ही वह प्रथम ग्रन्थ हैं जिसका अनुवाद सबसे पहले सांस्कृत से अंग्रेजी भाषा में ‘ए कोड ऑफ़ जेटू लॉज (A Code of Gentoo law) के नाम से प्रकाशित हुआ। ब्रिटिश रेजिडेंट जोनाथन डकन के प्रयत्नों के फलसवरूप 1792 ईo में बनारस में एक संस्कृत कॉलेज खोला गया, जिसका उद्देश्य हिन्दुओ के धर्म, सहतियाँ और कानून का अध्धयन और प्रसार करना था। सन् 1800 में लार्ड वेलेजली ने कंपनी के असैनिक अधिकारीयो की शिक्षा के लिए फोर्ट विलियम कॉलेज (Fort William College) की स्थापना की। इस कॉलेज में अंग्रेजी-हिंदुस्तानी कोश, हिंदुस्तानी व्याकरण तथा कुछ अन्य पुस्तके प्रकाशित की गई, परन्तु यह कॉलेज सन् 1802 में निदेशकों के आदेश से बंद कर दिया गया।

ईसाई मिशनरियों ने भारत में शिक्षा देने को नितांत अव्यवहारिक बताया। उन्होंने सरकार की इस कारण आलोचना की कि वाह भारतीय भाषाओँ के विद्यालयों की उपेक्षा कर रही है। ईसाई मिशनरियों ने केवल उन्हीं स्थानों में अंग्रेजी माध्यम से पाश्चात्य ज्ञान और अंग्रेजी साहित्य की शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जहाँ उन्हें सफलता मिलने की आशा थी। मिशनरियों ने आधुनिक भारतीय भाषाओ के अध्ययन को महत्व दिया। इस श्रृंखला में शब्द- कोश तैयार किये गए, व्याकरण पर पुस्तके लिखी गई. बाइबिल का भारतीय भाषाओ में अनुवाद किया गया। नारी शिक्षा के क्षेत्र में मिशनरियों ने अग्रणी कार्य किया। उन्होंने बालिकाओ के लिए विधालय खोले, अनाथायल स्थापित किए और मध्यवर्गीय एव उच्चवर्गीय महिलाओ के लिए गृह विज्ञानं व महिला शिक्षा का सुभारंभ किया। इन मिशनरियों ने अपने कार्य का प्रारंभ मुलत: मद्रास एवं बंगाल में किया। बंगाल में विलियम केरी, वार्ड तथा मार्शमैन, सीरमपुर की डच बस्ती में आकर रहे। इस प्रकार, प्रसिद्ध ‘सीरमपुर त्रयी’ सन् 1799 में अस्तित्व में आई। वैसे इन्हें बंगाल में कंपनी का विरोध भी झेलना पड़ा।

सन् 1813 के चार्टर एक्ट में एक लॉक रुपए का प्रावधान भारत में विद्दा के प्रसार के लिए रखा गया, जिसमे भारत में साहित्य के पुनरुद्धार तथा विकास के लिए और स्थानीय विद्वानों को प्रोत्साहन देने के लिए खर्च करने की व्यवस्था थी । इसी क्रम में राजा राममोहन राय, डेविड हेयर और सर हाइड ईस्ट के संयुक्त प्रयासों से सन् 1817 में हिन्दू कॉलेज की स्थापना की गई। बाद में वित्तीय समस्या के चलते इस विद्यालय का प्रबंधन कंपनी को सौप दिया गया और सन् 1854 में यह एक महाविद्याल बन गया। डेविड हेयर ने शिक्षा के प्रसार की एक नई पद्धति विकसित की, जिसमे संस्कृत और अरबी के बजाय बांग्ला और अंग्रेजी पढ़ाई जाती थी । इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हेयर ने ही सबसे पहले धर्मनिरपेक्ष शिक्षा की संकल्पना प्रस्तुत की।

थॉमसन के प्रयास

  • थॉमसन ने (1843 – 53 ) ग्राम शिक्षा की एक विस्तृत योजना बनाई |अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा देने वाले छोटे छोटे स्कूलों को बंद कर दिया गया |
  • एक शिक्षा विभाग का गठन किया गया |
  • गॉंव के स्कूल में कृषि विज्ञान तथा क्षेत्रमिती जैसे उपयोगी विषयों का अध्ययन प्रारम्भ किया गया | इस शिक्षा के लिए माध्यम देशी भाषा को चुना गया |
  • इसका उद्देश्य नवगठित राजस्व एवं लोक निर्माण विभाग के लिए शिक्षित व्यक्ति उपलब्ध करना था |

    शिक्षा का अधोमुखी निसयंदन सिद्धांत (Downward Filtration Theory Of Education)


    ‘शिक्षा समाज के उच्च वर्ग को ही दी जाए, इस वर्ग के शिक्षित होने पर शिक्षा का प्रभाव छन-छन कर जनसाधारण तक पहुंचेगा।’ शिक्षा के अधोमुखी निसयंदन सिद्धांत का वस्तुत: यही अर्थ था। इस सिद्धांत का क्रियान्वयन सरकारी नीति के रूप में लॉर्ड ऑकर्लैंड द्धारा किया गया। बहरहाल, मैकाले ने भी इसी सिद्धांत पर कार्य किया था। सन् 1854 से पूर्व उच्च शिक्षा के विकास की गति काफी धीमी थी। लॉर्ड आर्कलैण्ड ने बंगाल को 9 भागो में बाँटा और प्रत्येक जिले में विद्यालय स्थापित किए। सन् 1840 तक इस प्रकार के 40 विद्यालय स्थापित हो चुके थे। सन् 1835 में लॉर्ड विलियम बैटिक के कार्यकाल में ही कलकत्ता मेडिकल कॉलेज की आधारशिला रखी गई और सन् 1851 में पूना संस्कृत कॉलेज तथा पूना अंग्रेजी स्कूल को मिलाकर पूना कॉलेज बनया गया। संयुक्त प्रांत (United Province) (आधुनिक उत्तर प्रदेश) के लेफ्टिनेंट गवर्नर जेम्स टॉमसन् ने सन् 1847 में रुड़की इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना की। इसे आज भारत के प्रथम इंजीनियरिंग कॉलेज के रूप में जाना जाता हैं ।

    शिक्षा पर वुड का घोषणा-पत्र, 1854 (Wood’s Education Despatch,1854)


    भारतीय शिक्षा पर एक व्यापक योजना बोर्ड ऑफ कंट्रोल के प्रधान चालर्स वुड द्धारा 1854 में प्रस्तुत की गई। इसे ही वुड का डिस्पैच (Wood’s Dispatch) कहा गया। इस प्रस्ताव में शिक्षा के उद्देश्य, माध्यम, सुधारो आदि पर विचार व्यक्त किया गया था। इस घोषणा-पत्र को ‘भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा (Magna Carta of Indian Education) कहा जाता हैं।

    वुड के घोषणा-पत्र के प्रमुख प्रस्ताव इस प्रकार थे:-

    • उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी हो और जनसाधारण की शिक्षा का माध्यम देशी भाषा।
    • शिक्षा क्षेत्र में निजी उधमों को प्रोत्साहन दिया जाए।
    • पाश्चात्य शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार हो।
    • लंदन विश्वविद्यालय की तर्ज पर कलकत्ता, बम्बई तथा मद्रास में विश्वविद्याल खोले जाएं,जिनका कार्य केवल परीक्षा लेना हो।
    • तकनीकी विद्याल और महाविद्याल स्थापित किए जाएं।
    • अध्यापक-प्रशिक्षण संस्थाओ की स्थापना हो तथा महिला शिक्षा पर जोर दिया जाएं।
    • हर प्रांत में शिक्षा विभाग की स्थापना की जाएं।
    • सरकारी शिक्षा का स्वरूप नितांत धर्मनिरपेक्ष हो।

    वुड के घोषणा-पत्र के सुझाव पर सन् 1855 में पांच प्रांतो- बंगाल, बम्बई, मद्रास, पंजाब और उ.प्र. सीमा-प्रांत में लोक शिक्षा विभाग स्थापित किया गया तथा सन् 1857 में कलकत्ता, बम्बई तथा मद्रास विश्वविद्याल की स्थापना की गई। वुड का घोषणा-पत्र मुख़्यत: विश्वविद्यालय- स्तरीय शिक्षा से ही संबंध रखता था।

  • हन्टर शिक्षा आयोग

    चार्ल्स वुड के घोषणा-पत्र द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में हुई प्रगति की समीक्षा हेतु 1882 ई. में सरकार ने डब्ल्यू. हंटर की अध्यक्षता में एक आयोग की नियुक्ति की। इस आयोग में 8 सदस्य भारतीय थे। आयोग को प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा की समीक्षा तक ही सीमित कर दिया गया था। आयोग के महत्त्वपूर्ण सुझाव निम्नलिखित थे-

    1. हाई स्कूल स्तर पर दो प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था हो, जिसमें एक व्यवसायिक एवं व्यापारिक शिक्षा दिये जाने पर बल दिया जाये तथा दूसरी ऐसी साहित्यिक शिक्षा दी जाय, जिससे विश्वविद्यालय में प्रवेश हेतु सहायता मिले।
    2. प्राथमिक स्तर पर शिक्षा के महत्व पर बल एवं स्थानीय भाषा तथा उपयोगी विषय में शिक्षा देने की व्यवस्था की जाये।
    3. शिक्षा के क्षेत्र में निजी प्रयासों का स्वागत हो, लेकिन प्राथमिक शिक्षा उसके बगैर भी दी जाये।
    4. प्राथमिक स्तर पर शिक्षा का नियंत्रण ज़िला व नगर बोर्डों को सौंप दिया जाये।1870 में बाल गंगाधर तिलक और उनके सहयोगियों द्वारा पूना में फर्ग्यूसन कालेज, 1886 में आर्यसमाज द्वारा लाहौर में दयानंद ऐंग्लो वैदिक कालेज और 1898 में काशी में श्रीमती एनी बेसेंट द्वारा सेंट्रल हिंदू कालेज स्थापित किए गए।1894 में कोल्हापुर रियासत के राजा छत्रपति साहूजी महाराज ने दलित और पिछड़ी जाति के लोगों के लिए विद्यालय खोले और छात्रावास बनवाए। इससे उनमें शिक्षा का प्रचार हुआ और सामाजिक स्थिति बदलने लगी। 1894 से 1922 तक पिछड़ी जातियों समेत समाज के सभी वर्गों के लिए अलग-अलग सरकारी संस्थाएं खोलने की पहल की। यह अनूठी पहल थी उन जातियों को शिक्षित करने के लिए, जो सदियों से उपेक्षित थीं, इस पहल में दलित-पिछड़ी जातियों के बच्चों की शिक्षा के लिए ख़ास प्रयास किये गए थे। वंचित और गरीब घरों के बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई। 1920 को नासिक में छात्रावास की नींव रखी । साहू महाराज के प्रयासों का परिणाम उनके शासन में ही दिखने लग गया था। साहू जी महाराज ने जब देखा कि अछूत-पिछड़ी जाति के छात्रों की राज्य के स्कूल-कॉलेजों में पर्याप्त संख्या हैं, तब उन्होंने वंचितों के लिए खुलवाये गए पृथक स्कूल और छात्रावासों को बंद करवा दिया और उन्हें सामान्य छात्रों के साथ ही पढ़ने की सुविधा प्रदान की। डा० भीमराव अम्बेडकर बड़ौदा नरेश की छात्रवृति पर पढ़ने के लिए विदेश गए लेकिन छात्रवृत्ति बीच में ही रोक दिए जाने के कारण उन्हे वापस भारत आना पड़ा । इसकी जानकारी जब साहू जी महाराज को हुई तो महाराज ने आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्हें सहयोग दिया।

      1901 में लार्ड कर्ज़न ने शिमला में एक गुप्त शिक्षा सम्मेलन किया था जिसें 152 प्रस्ताव स्वीकृत हुए थे। इसमें कोई भारतीय नहीं बुलाया गया था और न सम्मेलन के निर्णयों का प्रकाशन ही हुआ। इसको भारतीयों ने अपने विरुद्ध रचा हुआ षड्यंत्र समझा। कर्ज़न को भारतीयों का सहयोग न मिल सका।

    विश्वविद्यालय आयोग व अधिनियम

    जब लॉर्ड कर्ज़न भारत का वायसराय बना तो उसने लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति की कड़ी आलोचना की। उसने कहा कि ‘मैकाले की नीति देशी भाषाओं के विरुद्ध है।’ सितम्बर, 1801 ई. में कर्ज़न ने एक सम्मेलन बुलाया, जहाँ उसने भारत में शिक्षा के सभी क्षेत्रों की समीक्षा की बात कही। 1902 ई. में कर्ज़न ने सर टॉमस रो की अध्यक्षता में एक विश्वविद्यालय आयोग की स्थापना की। इस आयोग में सैयद हुसैन बिलग्रामी एवं जस्टिस गुरुदास बनर्जी सदस्य के रूप में शामिल थे। इस आयोग का उद्देश्य विश्वविद्यालयों की स्थिति का अनुमान लगाना एवं उनके संविधान तथा कार्यक्षमता के बारे में सुझाव देना था। इस आयोग का कार्य क्षेत्र उच्च शिक्षा एवं विश्वविद्यालय तक ही सीमित था। 1904 ई. में ‘भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम’ विश्वविद्यालय तक ही सीमित था। 1904 ई. में ‘भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम’ पारित हुआ, जिसकी सिफारिशें इस प्रकार थीं-

    1. विश्वविद्यालयों को अध्ययन एवं शोध कार्य हेतु प्रोफ़ेसरों एवं लेक्चररों की नियुक्त करनी चाहिए।
    2. प्रयोगशालाओं एवं पुस्तकालयों की स्थापना के साथ विद्यार्थियों में उप-सदस्यों की संख्या कम से कम 50 एवं अधिकतम 100 होनी चाहिए, और इन सदस्यों को सरकार मनोनीति करेगी।
    3. कलकत्ता, बम्बई और मद्रास में स्थापित विश्वविद्यालयों में चुने हुए सदस्यों की संख्या अधिकतम 20 एवं न्यूनतम 15 होनी चाहिए।
    4. उप-सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होना चाहिए।

    इस अधिनियम द्वारा सरकार ने विश्विद्यालय प्रशासन पर अपना नियंत्रण बढ़ा दिया। सीनेट द्वारा लाये गये किसी भी प्रस्ताव पर सरकार को निषेधाधिकार (वीटो) प्राप्त हो गया। सरकार सीनेट के नियमों को परिवर्तित एवं संशोधित करने के साथ ही नये नियम भी बना सकती थी। अशासकीय विद्यालयों या कॉलेजों में सरकारी नियंत्रण कठोर हो गया और महाविद्यालय से सम्बद्धता होना कठिन हो गया। अब विश्वविद्यालयों को यह अधिकार मिल गया कि वे किसी ऐसी ‘जो विश्वविद्यालय से संबद्ध होना चाहती है’ का निरीक्षण कर उसकी कार्य कुशलता के बाद उसके संबंधन-असंबंधन पर निर्णय ले सकते थे। अधिनियम के द्वारा गवर्नर-जनरल के पास इन विश्वविद्यालयों की क्षेत्रीय सीमा निर्धारित करने का अधिकार था।

    राष्ट्रवादी तत्वों ने इस अनिधियम पर कड़ी आपत्ति जताई। लॉर्ड कर्ज़न की इस नीति के परिणामस्वरूप ही विश्वविद्यालयों के सुधार के लिए प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये 5 वर्ष तक के लिए व्यवस्था की गई। कर्ज़न के समय में कृषि विभाग, पुरातत्व विभाग की स्थापना की गई। कर्ज़न के समय में ही भारत में शिक्षा महानिदेशक की नियुक्ति की गयी। इस स्थान को ग्रहण करने वाला सर्वप्रथम व्यक्ति ‘एच.डब्ल्यू. ऑरेन्ज’ था। 21 फ़रवरी, 1913 ई. की शिक्षा नीति के सरकारी प्रस्ताव में प्रत्येक प्रांत में एक विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा हुई। गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा की जा रही अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की मांग सरकार ने नकार कर निरक्षरता खत्म करने की नीति को स्वीकार किया। सरकार ने प्रान्तों की सरकारों को प्रोरित किया कि वे समाज के निर्धन एवं अत्यन्त पिछड़े हुए वर्ग को निःशुल्क शिक्षा दिलाने का प्रबंध करें।

    सैडलर आयोग

    1917 ई. में कलकत्ता विश्वविद्यालय की समस्याओं के अध्ययन के लिए डॉक्टर एम.ई. सैडलर के नेतृत्व में एक आयोग गठित किया गया। इस आयोग में दो भारतीय, डॉक्टर आशुतोष मुखर्जी एवं डोक्टर जियाउद्दीन अहमद सदस्य थे। इस आयोग ने कलकत्ता विश्विद्यालय के साथ-साथ माध्यमिक स्नातकोत्तरीय शिक्षा पर भी अपना मत व्यक्त किया। आयोग ने 1904 ई. के ‘विश्विद्यालय अधिनियम’ की कड़े शब्दों में निंदा की। आयोग के मुख्य सुझाव थे-

    1. इंटर व उत्तर माध्यमिक परीक्षा को माध्यमिक तथा विश्वविद्यालयी शिक्षा के मध्य विभाजन रेखा मानना चाहिए।
    2. स्कूली शिक्षा 12 वर्ष की होनी चाहिए।
    3. ऐसी शिक्षण संस्थायें स्थापित करने का सुझाव दिया गया, जो इण्टरमीडिएट महाविद्यालय कहलाये। ये महाविद्यालय चाहे तो स्वतन्त्र रहें या फिर हाई स्कूल से सम्बद्ध हो जायें।

    द्वैध शासन-व्यवस्था की अन्तर्गत शिक्षा

    माण्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड सुधार 1919 के अन्तर्गत शिक्षा विभाग को प्रान्तों एवं लोक निर्वाचित मंत्री के अधीन दे दिया गया। केन्द्र सरकार ने अपने को शिक्षा के उत्तरदायित्व से मुक्त करते हुए शिक्षा के लिए दी जाने वाली केन्द्रीय अनुदान व्यवस्था को बंद कर दिया। इससे प्रान्तीय सरकारों को शिक्षा हेतु अधिक धन उपलब्ध कराने में परेशानी हुई।

    हार्टोग समिति

    1929 ई. में ‘भारतीय परिनीति आयोग’ ने सर फ़िलिप हार्टोग के नेतृत्व में शिक्षा के विकास पर रिपोर्ट हेतु एक सहायक समिति का गठन किया गया। समिति ने प्राथमिक शिक्षा के महत्व की बात की। माध्यमिक शिक्षा के बारे में आयोग ने मैट्रिक स्तर पर विशेष बल दिया। ग्रामीण अंचलों के विद्यालयों को आयोग ने वर्नाक्यूलर मिडिल स्तर के स्कूल पर ही रोक कर उन्हें व्यावसायिक या फिर औद्योगिक शिक्षा देने का सुझाव दिया।

    वर्धा आयोग

    1935 के ‘भारत सरकार अधिनियम’ के अन्तर्गत प्रान्तों में द्वैध शासन पद्धति समाप्त हो गयी। 1937 ई. में गांधी जी ने अपने हरिजन के अंकों में शिक्षा पर योजना प्रस्तुत की, जिसे ही ‘वर्धा योजना’ कहा गया। इस योजना के अन्तर्गत गांधी जी ने अध्यापकों के प्रशिक्षण, पर्यवेक्षण, परीक्षण एवं प्रशासन का सुझाव दिया। योजना में सर्वाधिक महत्व हस्त उत्पादन कार्यों को दिया गया, जिसके द्वारा अध्यापकों के वेतन की व्यवस्था किये जाने की योजना थी।

    सार्जेण्ट योजना

    1944 ई. में ‘केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार मण्डल’ ने ‘सार्जेण्ट योजना’ (सार्जेण्ट भारत सरकार में शिक्षा सलाहकार थे) के नाम से एक ‘राष्ट्रीय शिक्षा योजना’ प्रस्तुत की। योजना के अनुसार प्राथमिक विद्यालय एवं उच्च माध्यमिक विद्यालय स्थापित करने तथा 6 से 11 वर्ष के बच्चों को निःशुल्क अनिवार्य शिक्षा दिये जान की व्यवस्था की। 11 से 17 वर्ष के बच्चों के लिए 6 वर्ष का पाठ्यक्रम था। दो प्रकार के उच्च विद्यालय- एक विद्या विषयक और दूसरा तकनीकि एवं व्यावसायिक शिक्षा के लिए योजना में शामिल थे। इस योजना में इण्टरमीडियट श्रेणी को समाप्त करने की व्यवस्था थी और 40 वर्ष के अन्दर ही शिक्षा के पुनर्निमाण कार्य को अन्तिम रूप देना था, पर ‘खेर समिति’ ने इस समय सीमा को घटाकर 16 वर्ष कर दिया। सार्जेण्ट योजना के बाद 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया, इसी के साथ भारतीय शिक्षा में ब्रिटिश काल समाप्त हो गया।

    राधा कृष्ण आयोग

    डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में इस आयोग का गठन 1948 ई. मे किया गया। आयोग को विश्वविद्यालय शिक्षा पर अपनी रिपोर्ट देनी थी। अगस्त, 1949 ई. में आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत किया।

    मुख्य सिफारिशें-
    • विश्वविद्यालय पूर्व 12 वर्ष का अध्ययन।
    • विश्वविद्यालय में कम से कम 180 दिन की पढ़ाई हो। यह समय 11-11 सप्ताहों के तीन भागों में बंटा होना चाहिए।
    • प्रशासनिक सेवाओं के लिए विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि आवश्यक नहीं है।
    • शिक्षा को समवर्ती सूची में रखने का सुझाव।
    • उच्च शिक्षा के तीन मुख्य उद्देश्य- सामान्य शिक्षण, संस्कारी शिक्षण और व्यावसयिक शिक्षण हों।
    • कृषि, वाणिज्य, विद्या, अभियान्त्रिकी तथा प्राविधिक और आयुर्ज्ञान पर अधिक बल होना चाहिए।
    • विश्वविद्यालय की देख-रेख हेतु ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ की स्थापना की जानी चाहिए।

    विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.)

    1953 ई. में राधाकृष्णन आयोग की सिफारिशों को क्रियान्वित करने के लिए इस आयोग की स्थापना की गयी। 1956 ई. में संसद के अधिनियम के द्वारा आयोग को स्वायत्ता पूर्ण परिनियम पद दे दिया गया।

    कोठारी आयोग

    डोक्टर डी.एस. कोठारी की अध्यक्षता में जुलाई, 1964 ई. में ‘कोठारी आयोग’ की नियुक्ति की गई। इस आयोग में सरकार को शिक्षा के सभी पक्षों तथा प्रकमों के विषय में राष्ट्रीय नमूने की रूपरेखा, साधारण सिद्वान्त तथा नीतियों की रूपरेखा बनाने का सुझाव दिया गया।

  • शिक्षा से सम्बन्धित आयोग
    आयोग वर्ष गवर्नर-जनरल
    वुड का घोषणा पत्र 1854 ई. लॉर्ड डलहौज़ी
    हन्टर शिक्षा आयोग 1882-1883 ई. लॉर्ड रिपन
    सैडलर आयोग 1917-1918 ई. लॉर्ड चेम्सफ़ोर्ड
    हार्टोग समिति 1929 ई. लॉर्ड इरविन
    सार्जेण्ट योजना 1944 ई. लॉर्ड वेवेल
    राधाकृष्णन आयोग 1948 ई. लॉर्ड माउण्ट बेटन
  • स्वतन्त्रता पूर्व स्थापित भारतीय विश्वविद्यालय
    विश्वविद्यालय स्थापना वर्ष
    कलकत्ता विश्वविद्यालय (वर्तमान कोलकाता) 1857 ई.
    बम्बई विश्वविद्यालय (वर्तमान मुम्बई) 1857 ई. वर्तमान
    मद्रास विश्वविद्यालय (वर्तमान चेन्नई) 1857 ई.
    पंजाब विश्वविद्यालय 1882 ई.
    इलाहाबाद विश्वविद्यालय 1887 ई.
    बनारस विश्वविद्यालय 1916 ई.
    मैसूर विश्वविद्यालय 1916 ई.
    पटना विश्वविद्यालय 1917 ई.
    उस्मानिया विश्वविद्यालय (हैदराबाद) 1918 ई.
    अलीगढ़ विश्वविद्यालय 1920 ई.
    लखनऊ विश्वविद्यालय 1921 ई.
    दिल्ली विश्वविद्यालय 1922 ई.
    नागपुर विश्वविद्यालय 1923ई.
    आन्ध्र प्रदेश विश्वविद्यालय 1926 ई.
    आगरा विश्वविद्यालय 1927 ई.
    अन्नामलाई विश्वविद्यालय 1929 ई.
    केरल विश्वविद्यालय (तिरुअनंतपुरम) 1937 ई.
    उत्कल विश्वविद्यालय (भुवनेश्वर) 1943 ई.
    सागर विश्वविद्यालय 1946 ई.
    राजस्थान विश्वविद्यालय (जयपुर) 1947 ई.
  • सन्दर्भ :-http://bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82_%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B8
  • http://www.iasplanner.com/civilservices/hindi/ias-pre/gs-history/modern-indian-history-colonial-policies-british-india-educational-development
  • http://iashindi.com/educationbritishera/
  • https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8

 

 

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