चेदि वंश और खारवेल

चेदि वंश और खारवेल

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15 वर्ष की अवस्था में खारवेल ‘युवराज’ बना और 24 वर्ष की अवस्था में इसका ‘राज्याभिषेक’ किया गया। खारवेल कलिंग के तीसरे राजवंश  चेदि वंश का था। खारवेल को ऐरा, महाराज, महामेघवाहन, एवं कलिंगाधिपति कहा गया है।

प्रथम वर्ष कलिंग की राजधानी का पुनरुद्धार किया, अर्थात् कलिंग नगर में कार्य क्रिया।

द्वितीय वर्ष शतकणों की परवाह न करते हुए पश्चिम की ओर सेना भेजी। और सेना कण्वेणा नदी तक आगे बढ़ी तथा आगे इसने मुसिकनगर में आतंक

मचा  दिया। |

तृतीय वर्ष खारवेल ने अपनी राजधानी में संगीत, वाद्य, नृत्य, नाटक आदि अभिनय द्वारा भारी उत्सव मनाया। ।

चौथे वर्ष खारवेल ने बरार के भोजकों तथा पूर्वी खानदेश और था मदनगर के रठिकों के विरुद्ध सैन्य अभियान किया। इसी विजय के प्रसंग में विद्याधर

नामक जैनियों की एक शाखा के निवास स्थान का उल्लेख हुआ है तथा कहा गया है कि खारवेल ने वहाँ निवास किया था।

तन्सुली से प्राचीन नहर को ये आया इस नहर का निर्माण नन्द राजा महापद्म्नानन्द ने 300 वर्ष पूर्व किया था।

छठे वर्ष एक लाख मुद्रा व्यय करके अपनी प्रजा को सुखी रखने के अनेक आणाम किए। उसने ग्रामीण तथा शहरी जनता के कर माफ कर दिए।

सातवें वर्ष इस वर्ष का विवरण संदिग्ध तथा अस्पष्ट है।

आठवें वर्ष वह बराबर की पहाड़ी तक पहुँच गया एवं गोरठगिरी के किलों को नष्ट कर दिया। विजय प्रासाद बनवाए।

दसवें वर्ष पुन: गंगा-घाटी पर आक्रमण किया, परन्तु कोई विशेष सफलता नही मिली

ग्यारहवें वर्ष 118 वर्ष पुराने संघत्रमिरदेशसंघातकम् को पराजित किया।खारवेल ने पिथुण्ड नगर में गदहों द्वारा हल चलवाया।

बारहवें वर्ष मगध के राजा बृहस्पतिमित्र को पराजित कर जिन की प्रतिमा या सम्पत्ति लूटकर ले गया एवं उससे भुवनेश्वर के भव्य मन्दिर का निर्माण कराया।

बारहवें वर्ष ही पुन: दक्षिण भारत का अभियान किया। बताया जाता है था जल तथा थल दोनों ही मार्गों से पाण्ड्यों की राजधानी पर धावा बोला।

तेरहवें वर्ष खारवेल का झुकाव जैन धर्म की ओर हो गया और इसने हाथीगुम्फा  या अभिलेख लिखवाया। 13वें वर्ष में ही खारवेल ने कुमारी पहाड़ी पर जैन भिक्षुओ के लिए गुफाएँ बनवाई। कुमारगिरी से तात्पर्य उदयगिरि तथा खण्डगिरि की गुफाये हैं

ऐतिहासिक अभी यह निर्णय नहीं कर सके हैं कि ख़ारवेल का समय कौन सा है। काशी प्रसाद जायसवाल ने सबसे पूर्व हाथीगुम्फ़ा शिलालेख को प्रकाशित कराया था, और उन्होंने उसका जो पाठ पढ़ा था, उसमें ख़ारवेल के समकालीन मगधराज के नाम को बहसतिमित पढ़कर और बृहस्पतिमित्र को पुष्यमित्र का पर्यायवाची मानकर उन्होंने यह प्रतिपादित किया था कि ख़ारवेल शुंगवंशी राजा पुष्यमित्र का समकालीन था। साथ ही, जो यवनराज ख़ारवेल के आक्रमण के भय से मध्यदेश को छोड़कर वापस चला गया था, उसका नाम भी जायसवाल जी ने हाथीगुम्फ़ा शिलालेख में ‘दिमित’ पढ़ा था। जिसे उन्होंने बैक्ट्रिया के यवन राजा डेमेट्रियस से मिलाया था। पर बाद में अनेक ऐतिहासिकों ने हाथीगुम्फ़ा शिलालेख के इन पाठों से असहमति प्रगट की। उनके अनुसार इस शिलालेख में न बहसतिमित का नाम है, और न ही दिमित का।

‘प्रसिद्ध इतिहासकार के.पी. जायसवाल ने मेघवंश राजाओं को चेदीवंश का माना है. ‘भारत अंधकार युगीन इतिहास (सन 150 ई. से 350 ई. तक)’ में वे लिखते हैं, ‘ये लोग मेघ कहलाते थे. ये लोग उड़ीसा तथा कलिंग के उन्हीं चेदियों के वंशज थे, जो खारवेल के वंशधर थे और अपने साम्राज्य काल में ‘महामेघ’ कहलाते थे. भारत के पूर्व में जैन धर्म फैलाने का श्रेय खारवेल को जाता है. कलिंग राजा जैन धर्म के अनुयायी थे, उनका वैष्णव धर्म से विरोध था. अत: वैष्णव धर्मी राजा अशोक ने उस पर आक्रमण किया इसका दूसरा कारण समुद्री मार्ग पर क़ब्ज़ा भी था. इसे ‘कलिंग युद्ध’ के नाम से जाना जाता है. युद्ध में एक लाख से अधिक लोग मारे जाने से व्यथित अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया और अहिंसा पर ज़ोर देकर बौद्ध धर्म को अन्य देशों तक फैलाया

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