चन्द्रमा – सम्बन्धी तथ्य

चंद्रमा की कलाएँ (Phases of the moon)

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चन्द्रमा, सूर्य और पृथ्वी की सापेक्ष स्थितियों में परिवर्तन होते रहने के कारण पृथ्वी से दिखाई पड़ने वाले चंद्रमा के प्रकाशमान भाग का आकार अमावस्या (black moon) से पूर्णिमा (full moon) तक क्रमशः बढ़ता है और पूर्णिमा के पश्चात् अमावस्या तक क्रमशः घटता जाता है। चन्द्रमा की प्रति रात परिवर्तनशील इन स्थितियों को चंद्र चलाएं या चंद्रमा की कलाएं कहा जाता है। अपनी कक्षा में चंद्रमा की स्थिति जब पृथ्वी और सूर्य के बीच में होती है,चंद्रमा का अंधकारमय भाग ही पृथ्वी के सम्मुख पड़ता है जिसके कारण रात में चंद्रमा अदृश्य रहता है। चंद्रमा की इस स्थिति को अमावस्या कहते हैं। इसके पश्चात् चंद्रमा अपनी कक्षा में आगे बढ़ता है और दूसरी रात को नवचंद्र दिखाई पड़ता है जिसके बाद प्रत्येक रात को चंद्रमा के प्रकाशित भाग में क्रमशः वृद्धि होती जाती है। चौथी रात जब चंद्रमा अपनी कक्षा का आठवां भाग पूरा करता है, वह पृथ्वी से लम्बवत् (quadrature) स्थिति में होता है और उसके प्रकाशित भाग की आकृति हंसिया जैसी (crescent shape) होती है। अतः इसे हंसिया चांद (crescent moon) कहते हैं। सप्तमी-अष्टमी को जब चंद्रमा अपनी कक्षा का एक-चौथाई भाग पूरा करता है उसका आधा भाग पृथ्वी से दिखाई पड़ता है; इसे अर्द्ध चंद्र (half moon) कहते हैं। कक्षा का 3/8 भाग पूरा कर लेने पर (एकादशी-द्वादशी) चंद्रमा का तीन-चौथाई भाग दिखाई पड़ता है जिसे कुबड़ा चांद (gibbous moon) कहते हैं। 15 वें दिन चंद्रमा और सूर्य के बीच में पृथ्वी होती है और चंद्रमा का संपूर्ण प्रकाशित (गोल) भाग दिखाई पड़ता है जिसे पूर्णिमा (full moon) कहते हैं।
अमावस्या के पश्चात् 15 दिन को शुक्ल पक्ष या उजाला पक्ष कहा जाता है। पूर्णिमा के पश्चात् चंद्रमा के प्रकाशित भाग में क्रमशः कमी आने लगती है और अगली 15वीं रात (अमावस्या) को चंद्रमा अदृश्य हो जाता है। इस दूसरे 15 दिनों को कृष्ण पक्ष या अंधेरा पक्ष कहते हैं। कृष्ण पक्ष की चौथी रात को कुबड़ा चांद और ग्यारहवीं-बारहवीं रात को हंसिया चाँद दिखाई पड़ता है।

हमारे सौरमंडल में कुल आठ ग्रह है। उनमें से कुछ के उपग्रह है तो कुछ के नहीं है। बुध व शुक्र ग्रह के कोई उपग्रह नहीं है। मंगल ग्रह के दो उपग्रह है, फ़ोबोस व डिमोज़। बृहस्पति, शनि, युरेनस और नेप्चून के अनेकों उपग्रह है। पृथ्वी का एक मात्र उपग्रह है, चन्द्रमा। सूर्य के बाद चंद्रमा आसमान में सर्वाधिक चमकने वाली वस्तु है । आकार में यह पृथ्वी का एक चौथाई भर है। यह तकरीबन हर सत्ताईस दिवसों में पृथ्वी का चक्कर काटता है। चंद्रमा एक निर्जन पिंड है। वहां ना वायु है और ना ही जल है। दुर्भाग्य से चंद्रमा का अपना कोई चुम्बकीय ढाल भी नहीं है जिससे सौर हमलों से वह अपना बचाव कर सके। हवा, पानी और सुरक्षा यह तीनों ही जीवन के पनपने की बुनियादी जरूरतें है। वायुमंडल के अभाव में सूरज की तपिस सीधे चंद्रमा के धरातल पर पड़ती है इसलिए वहां दिन और रात के तापमान में बड़ा अंतर है । हमारे ग्रह की तरह चंद्रमा की धरती भी विविध भौगोलिक रचनाओं से अटी पड़ी है। इनमें चट्टान, पहाड़, मैदान, क्रेटर आदि प्रमुख है। चंद्रमा की अधिकांश चट्टानें तीन से साढ़े चार अरब वर्ष पुरानी हैं । पृथ्वी व चंद्रमा के परस्पर गुरुत्वाकर्षण कई रोचक प्रभावों को जन्म देते है निश्चित रूप से हमारे समुद्री ज्वार उनमें से प्रमुख है । चंद्रमा अपने सामने पड़ने वाले पृथ्वी के भूभाग को अपनी ओर खींचता है जिससे समुद्र का पानी ऊपर उठता है। पृथ्वी की तुलना में चंद्रमा पर गुरुत्वाकर्षण छठवां भाग मात्र है । अर्थात वहां वस्तु का भार छः गुना कम होता है।

चंद्रमा अपनी धूरी पर भी घूमता है। पर इस घुमाव को पृथ्वी से देख पाना संभव नहीं है। यदि कुछ दिनों तक चंद्रमा को गौर से देखे तो आप पायेंगे कि हमें चन्द्रमा पर सदैव एक सी रचनाएं नजर आती है । इनमें कभी कोई बदलाव नजर नहीं आता है। इसका अर्थ है चन्द्रमा अपना एक निश्चित गोलार्ध ही हमें दिखाता है। अब सवाल उठता है कि आखिर चंद्रमा अपना निश्चित भूभाग ही हमारे सामने क्यों रखता है ? इसका जवाब चन्द्रमा की समकालिक कक्षा में निहित है। समकालिक कक्षा का अर्थ है घूर्णन काल और परिक्रमण काल समान होना। चन्द्रमा अपनी स्वयं की व पृथ्वी की परिक्रमा समान समय में करता है। जिससे चन्द्रमा का एक भाग ही सदा पृथ्वी की ओर रहता है। यह महज संयोग नहीं है बल्कि ज्वारीय प्रभाव का नतीजा है।

विश्व की दो महाशक्तियों अमेरिका व सोवियत रूस के बीच चंद्रमा को जीतने की होड़ कई दशकों तक चली। इसी प्रयास में सोवियत रूस ने साठ के दशक के अंत में सर्वप्रथम चंद्रमा का दौरा किया। उसके अंतरिक्ष यान ‘लूना 2’ ने चंद्रमा का दौरा किया। चंद्रमा अकेला ऐसा पिंड है जिस पर मानव ने कदम रखा है । चंद्रमा पर मानव पहली बार 20 जुलाई 1969 को उतरा जबकि अंतिम मानव यात्रा दिसम्बर 1972 में हुई। चंद्रमा से चट्टान के नमूने भी धरती पर लाये गये है । अपोलो और लूना कार्यक्रमों द्वारा चट्टानों के करीब चार सौ नमूने धरती पर लाये गये है। यह नमूने आज भी हमें चंद्रमा की विस्तृत जानकारी मुहैया कराते हैं । वैज्ञानिक आज भी इन कीमती नमूनों का अध्ययन कर रहे है । 1994 में ‘क्लेमेंटाइन’ अंतरिक्ष यान ने चंद्रमा के धरातल को विस्तृत रूप से प्रतिचित्रित किया है। इसने चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव के करीब गहरे खड्ड में कुछ जलीय बर्फ होने की संभावना भी जताई है ।चंद्रमा पर इलाके के दो प्राथमिक प्रकार हैं : भारी मात्रा में क्रेटर व बहुत पुरानी उच्चभूमि और अपेक्षाकृत चिकनी व युवा निम्न्भूमि । चन्द्रमा पर नजर आने वाला सबसे बड़ा काला धब्बा निम्न्भूमि है ।”चांदनी” वास्तव में चंद्रमा की सतह से परावर्तित सूर्य का प्रकाश है । कितना प्रकाश परावर्तित होना है, यह कक्षा में चंद्रमा की अपनी स्थिति पर निर्भर करता है । हम चंद्रमा के केवल उस गोलार्ध को देख पाते है जो सूर्य से प्रकाशित होता है और इस प्रकाशित गोलार्ध के भी केवल उस भाग को देख पाते है जो हमारे सम्मुख होता है । शेष चन्द्रमा हमें दिखाई नहीं पड़ता है। प्रतिदिन चन्द्रमा थोड़ा बढ़ता हुआ नजर आता है । इस प्रकार, प्रतिदिन चन्द्रमा की यह बढोत्तरी कला कहलाती है । चंद्रमा एक नियमित चक्र पर कलाओं में बदलाव करता है । हरेक चक्र पूरा होने के लिए लगभग 29 दिन लेता है । अगर “नव चन्द्रमा” की स्थिति से शुरूआत करें तो चन्द्रमा चार मुख्य चरणों से होकर गुजरता है: प्रथम चतुर्थांस (पहला सप्ताह), पूर्णिमा (दूसरा सप्ताह), तीसरा चतुर्थांस (तीसरा सप्ताह) और नव चंद्रमा (चौथा सप्ताह) ।

अतीत में चन्द्रमा की कक्षा आज की तुलना में बहुत छोटी थी। साथ ही उसकी कक्षीय गति भी तीव्र थी । लेकिन समय के साथ-साथ जैसे जैसे चंद्रमा धीमा होता गया उसकी कक्षा विस्तारित होती गई ( पृथ्वी भी ऊर्जा खोने के साथ-साथ धीमी हो रही है ) । उदाहरण के लिए, एक अरब साल पहले, चंद्रमा पृथ्वी के बहुत करीब था ( 2 लाख किमी ) और पृथ्वी का एक चक्कर लगाने में केवल 20 दिन लेता था । इसके अलावा, बजाय 24 घंटे के एक ‘पृथ्वी दिवस’ लगभग 18 घंटे लंबा हुआ करता था । जब चाँद पृथ्वी के करीब होता था तब पृथ्वी पर ज्वार भी बहुत शक्तिशाली हुआ करते थे ।

सारोस पृथ्वी-चंद्रमा-सूर्य प्रणाली का एक 18-वर्षीय आवर्ती चक्र है। हर 6585 दिवस बाद पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य बिल्कुल समान स्थिति में होते हैं। दो एक जैसे चंद्रग्रहण ठीक 6585 दिनों के अंतराल मे होते है।

चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह है। यह सौर मंडल का पाचवाँ सबसे विशाल प्राकृतिक उपग्रह है। पृथ्वी के मध्य से चन्द्रमा के मध्य तक कि दूरी ३८४,४०३ किलोमीटर है। यह दूरी पृथ्वी कि परिधि के ३० गुना है। चन्द्रमा पर गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी से १/६ है। यह प्रथ्वी कि परिक्रमा २७.३ दिन मे पूरा करता है और अपने अक्ष के चारो ओर एक पूरा चक्कर भी २७.३ दिन में लगाता है। यही कारण है कि चन्द्रमा का एक हिस्सा या फेस हमेंसा पृथ्वी की ओर होता है। यदि चन्द्रमा पर खड़े होकर पृथ्वी को देखे तो पृथ्वी साफ़ साफ़ अपने अक्ष पर घूर्णन करती हुई नजर आएगी लेकिन आसमान में उसकी स्थिति सदा स्थिर बनी रहेगी अर्थात पृथ्वी को कई वर्षो तक निहारते रहो वह अपनी जगह से टस से मस नहीं होगी | पृथ्वी- चन्द्रमा-सूर्य ज्यामिति के कारण “चन्द्र दशा” हर २९.५ दिनों में बदलती है। आकार के हिसाब से अपने स्वामी ग्रह के सापेक्ष यह सौरमंडल में सबसे बड़ा प्राकृतिक उपग्रह है जिसका व्यास पृथ्वी का एक चौथाई तथा द्रव्यमान १/८१ है। बृहस्पति के उपग्रह lo के बाद चन्द्रमा दूसरा सबसे अधिक घनत्व वाला उपग्रह है। सूर्य के बाद आसमान में सबसे अधिक चमकदार निकाय चन्द्रमा है। समुद्री ज्वार और भाटा चन्द्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण आते है। चन्द्रमा की तात्कालिक कक्षीय दूरी, पृथ्वी के व्यास का ३० गुना है इसीलिए आसमान में सूर्य और चन्द्रमा का आकार हमेशा सामान नजर आता है। वह पथ्वी से चंद्रमा का 59 % भाग दिखता है जब चन्द्रमा अपनी कक्षा में घूमता हुआ सूर्य और पृथ्वी के बीच से होकर गुजरता है और सूर्य को पूरी तरह ढक लेता है तो उसे सूर्यग्रहण कहते है।

अन्तरिक्ष मे मानव सिर्फ चन्द्रमा पर ही कदम रख सका है। सोवियत राष्ट् का लूना-१ पहला अन्तरिक्ष यान था जो चन्द्रमा के पास से गुजरा था लेकिन लूना-२ पहला यान था जो चन्द्रमा की धरती पर उतरा था। सन् १९६८ में केवल नासा अपोलो कार्यक्रम ने उस समय मानव मिशन भेजने की उपलब्धि हासिल की थी और पहली मानवयुक्त ‘ चंद्र परिक्रमा मिशन ‘ की शुरुआत अपोलो -८ के साथ की गई। सन् १९६९ से १९७२ के बीच छह मानवयुक्त यान ने चन्द्रमा की धरती पर कदम रखा जिसमे से अपोलो-११ ने सबसे पहले कदम रखा | इन मिशनों ने वापसी के दौरान ३८० कि. ग्रा. से ज्यादा चंद्र चट्टानों को साथ लेकर लौटे जिसका इस्तेमाल चंद्रमा की उत्पत्ति, उसकी आंतरिक संरचना के गठन और उसके बाद के इतिहास की विस्तृत भूवैज्ञानिक समझ विकसित करने के लिए किया गया। ऐसा माना जाता है कि करीब ४.५ अरब वर्ष पहले पृथ्वी के साथ विशाल टक्कर की घटना ने इसका गठन किया है।

सन् १९७२ में अपोलो-१७ मिशन के बाद से चंद्रमा का दौरा केवल मानवरहित अंतरिक्ष यान के द्वारा ही किया गया जिसमें से विशेषकर अंतिम सोवियत लुनोखोद रोवर द्वारा किया गया है। सन् २००४ के बाद से, जापान, चीन, भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी में से प्रत्येक ने चंद्र परिक्रमा के लिए यान भेजा है। इन अंतरिक्ष अभियानों ने चंद्रमा पर जल-बर्फ की खोज की पुष्टि के लिए विशिष्ठ योगदान दिया है। चंद्रमा के लिए भविष्य की मानवयुक्त मिशन योजना सरकार के साथ साथ निजी वित्त पोषित प्रयासों से बनाई गई है। चंद्रमा ‘ बाह्य अंतरिक्ष संधि ‘ के तहत रहता है जिससे यह शांतिपूर्ण उद्देश्यों की खोज के लिए सभी राष्ट्रों के लिए मुक्त है।

भौतिकीय गुण

आतंरिक संरचना

चंद्रमा एक विभेदित निकाय है जिसका भूरसायानिक रूप से तीन भाग क्रष्ट, मेंटल और कोर है। चंद्रमा का २४० किलोमीटर त्रिज्या का लोहे की बहुलता युक्त एक ठोस भीतरी कोर है और इस भीतरी कोर का बाहरी भाग मुख्य रूप से लगभग ३०० किलोमीटर की त्रिज्या के साथ तरल लोहे से बना हुआ है। कोर के चारों ओर ५०० किलोमीटर की त्रिज्या के साथ एक आंशिक रूप से पिघली हुई सीमा परत है।

संघात खड्ड निर्माण प्रक्रिया एक अन्य प्रमुख भूगर्भिक प्रक्रिया है जिसने चंद्रमा की सतह को प्रभावित किया है, इन खड्डों का निर्माण क्षुद्रग्रहों और धूमकेतुओं के चंद्रमा की सतह से टकराने के साथ हुआ है। चंद्रमा के अकेले नजदीकी पक्ष में ही १ किमी से ज्यादा चौड़ाई के लगभग ३,००,००० खड्डों के होने का अनुमान है। इनमें से कुछ के नाम विद्वानों, वैज्ञानिकों, कलाकारों और खोजकर्ताओँ पर हैं |चंद्र भूगर्भिक कालक्रम सबसे प्रमुख संघात घटनाओं पर आधारित है, जिसमेंनेक्टारिस, इम्ब्रियम और ओरियेंटेल शामिल है, एकाधिक उभरी सतह के छल्लों द्वारा घिरा होना इन संरचनाओं की ख़ास विशेषता है।

चुम्बकीय क्षेत्र

चंद्रमा का करीब 1-100 नैनोटेस्ला का एक बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र है। पृथ्वी की तुलना में यह सौवें से भी कम है।

विशेषताएं :

  • चन्द्रमा (अंग्रेज़ी: Moon) पृथ्वीका एकमात्र उपग्रह, जो वायुमंडल विहीन है और जिसकी पृथ्वी से दूरी 3,84,365 कि.मी. है।
  • यहसौरमण्डल का पाचवाँ सबसे विशाल प्राकृतिक उपग्रह है।
  • चन्द्रमा की सतह और उसकी आन्तरिक सतह का अध्ययन करने वाला विज्ञान सेलेनोलॉजी कहलाता है।
  • इस पर धूल के मैदान को शान्तिसागर कहते हैं। यह चन्द्रमा का पिछला भाग है, जो अंधकारमय होता है।
  • चन्द्रमा का उच्चतम पर्वत लीबनिट्ज पर्वत है, जो 35000 फुट (10,668 मी0) ऊँचा है। यह चन्द्रमा केदक्षिणी ध्रुव पर स्थित है।
  • चन्द्रमा को जीवाश्म ग्रह भी कहा जाता है।
  • इसकेप्रकाश को पृथ्वी में आने में 3 सेकंड लगता है।
  • चन्द्रमा, पृथ्वी की एक परिक्रमा लगभग 27 दिन और 8 घंटे में पूरी करता है और इतने ही समय में अपने अक्ष पर एक घूर्णन करता है। यही कारण है कि चन्द्रमा का सदैव एक ही भाग दिखाई पड़ता है। पृथ्वी से चन्द्रमा का 57% भाग देखा जा सकता है।
  • चन्द्रमा द्वारा पृथ्वी के चारो ओर घुमने में लगा समय (परिभ्रमण काल) 27 घंटा 7 मिनिट 43 सेकंड है।
  • चन्द्रमा का अक्ष तल पृथ्वी के अक्ष के साथ 48º का अक्ष कोण बनाता है। चन्द्रमा पृथ्वी के अक्ष के लगभग समानान्तर है।
  • चन्द्रमा का धरातल असमतल और इसका व्यास 3,476 कि.मी है तथा द्रव्यमान, पृथ्वी के द्रव्यमान का लगभग 1/8 है।
  • पृथ्वी के समान इसका परिक्रमण पथ भी दीर्घ वृत्ताकार है।

चन्द्र ग्रहण

  • सूर्यके संदर्भ में चन्द्रमा की अवधि 53 दिन (29 दिन, 12 घंटे, 44 मिनट और 2.8 सेकेण्ड) होती है। इस समय को एक चन्द्रमास या साइनोडिक मास कहते हैं।
  • नक्षत्र समय के दृष्टिकोण से चन्द्रमा लगभग 27½ दिन (27 दिन, 7 घंटे, 43 मिनट और 6 सेकेण्ड) में पुनः उसी स्थिति में होता है। 27½ दिन की यह अवधि एक नाक्षत्र मास कहलाती है।
  • ज्वार उठने के लिए अपेक्षित सौर एवं चन्द्रमा की शक्तियों के अनुपात 11:5 हैं।
  • ओपोलो के अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा लाए गए चट्टानों से पता चला है कि चन्द्रमा भी उतना ही पुराना है, जितनी की पृथ्वी (लगभग 460 करोड़ वर्ष)। इसकी चट्टानों में टाइटेनियम की मात्रा अत्यधिक मात्रा में पायी गयी है।
  • चन्द्रमा और उसकी कलाएं-min कुछ  प्रश्न-उत्तर ( डाउनलोड करें )

 

 

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