ग्रामीण और शहरी स्थानीय शासन भाग -2

शहरी स्थानीय सरकार

जिस तरह पंचायती राज ग्रामीण क्षेत्रों में है, उसी तरह स्थानीय शासन की शहरी संस्थाएँ भी हैं शहरी स्थानीय निकाय तीन प्रकार की होती हैं :

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() बड़े शहरों के लिए नगर निगम

() छोटी आबादी वाले शहरों के लिए नगर परिषद् तथा

() संक्रमणकालीन क्षेत्रों (अर्ध शहरी क्षेत्र) के लिए नगर पंचायत परन्तु पंचायती राज संस्थाएं तथा शहरी स्थानीय निकायों में महत्वपूर्ण अन्तर यह है कि जहाँ पंचायती राज संरचनाएएकदूसरे से बारीकी से जुड़ी हुई है वही शहरी स्थानीय निकाय एकदूसरे से स्वतन्त्र हैं एक राज्य में तीनों शहरी स्थानीय निकाय हो सकते हैं, एक बड़े शहर में नगर निगम, एक छोटे शहर में नगर परिषद् तथा एक छोटे कस्बे में नगर पंचायत परन्तु यह एकदूसरे से जुड़ी हुई नहीं होती है

ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान 1688 . में प्रथम बार शहरी स्थानीय निकाय अस्तित्व में आया जब मद्रास (अब चेन्नई) में नगर िगम की स्थापना की गई बाद में इसी तरह के निकायों की स्थापना कलकत्ता तथा बम्बई (मुम्बई) में भी की गई उस समय इन संस्थाओं का कार्य स्वच्छता के मामलों में सहायता करना तथा महामारियों की रोकथाम के लिए कार्य करना था इन स्थानीय निकायों के जलापूर्ति तथा जलनिकासी के प्रबन्ध जैसे कुछ कार्य भी थे परन्तु इन संस्थाओं को पर्याप्त वित्तीय तथा अधिकारिता शक्तियाँ नहीं दी गई शुरुआत में इनके अधिकांश सदस्य मनोनित किए जाते थे हमारे राष्ट्रीय नेताओं ने भी स्थानीय प्रशासन में इनके महत्व तथा आवश्यकता को महसूस किया तथा इन्हें देश के नियोजित विकास से जोड़ा परन्तु धन के बिना कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता था जो इन संस्थाओं के पास नहीं था परन्तु फिर भी यह व्यवस्था प्रशासन का प्रभावी उपकरण साबित हुई ब्रिटिश शासन के दौरान इन शहरी स्थानीय संस्थाओं में बहुत से परिवर्तन किए गए धीरेधीरे कुछ संरचनात्मक सुधार किए गए, स्थानीय निकायों की शक्तियों को बढ़ाया गया तथा इन्हें कुछ धन भी उपलब्ध करवाया गया स्वतन्त्रता के बाद से चार प्रकार के शहरी स्थानीय निकाय कार्य कर रहे थे-(i) नगर निगम, (ii) नगर पालिका, (iii) टाउन एरिया समितियाँ, (iv) अभिसूचित क्षेत्र समितियाँ 1992 में किए गए 74वे संविधान संशोधन से शहरी स्थानीय व्यवस्था में बड़े परिवर्तन आए वर्तमान में तीन तरह के शहरी स्थानीय निकाय कार्य कर रहे हैं :

() बड़े शहरों के लिए नगर निगम,

() छोटे शहरों के लिए नगर परिषद् तथा

() ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों के रूप में संक्रमणशील हो रहे क्षेत्रों के लिए नगर पंचायत

 74वाँ संविधान संशोधन, 1992

जैसाकि ऊपर उल्लेख किया गया है, 1992 में किए गए 74वे संविधान संशोधन से शहरी स्थानीय निकायों की संरचना तथा कार्यों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए गए इनमें से कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु निम्नलिखित है :

  • भारत के प्रत्येक राज्य में शहरी स्थानीय निकायों का गठन (नगर निगम, नगर परिषद् तथा नगर पंचायत)
  • नागरिक मामलों में जमीनी स्तर पर लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए नगरपालिका प्रादेशिक क्षेत्रों में वार्ड समितियों का गठन
  • राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा नियमित निष्पक्ष चुनाव
  • अधिक से अधिक माह के लिए नगरपालिका सरकारों के अतिक्रमण का प्रावधान
  • आरक्षण के माध्यम से समाज के कमजोर वर्गों (अर्थात् अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग) एवं महिलाओं के लिए नगरपालिका सरकारों में उचित प्रतिनिधित्व
  • राज्य विधायिका द्वारा कानून बनाकर नगरपालिकाओं और वार्ड समितियों को शक्तियाँ (वित्तीय शक्तियों सहित) और कार्यात्मक उत्तरदायित्व सौंपे गए हैं
  • प्रत्येक 5 साल पर राज्य वित्त आयोग का गठन, जो नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करता है तथा उनकी वित्तीय स्थिति को सुधारे जाने की आवश्यकता के लिए सिफारिश देता है तथा;
  • विकास योजनाओं की तैयारी तथा समेकन के लिए प्रत्येक राज्य में जिला स्तर पर जिला योजना समिति तथा महानगरीय क्षेत्रों में महानगरीय योजना समिति का गठन

 नगर निगमImage result for नगर निगम लखनऊ

. रचना

राज्य विधायिका द्वारा पारित अधिनियमों के अनुसार बनाए गए प्रावधानों के तहत, बड़े शहरों में नगर निगमों की स्थापना की गई है नगर निगमों के पार्षद 5 वर्ष के लिए चुने जाते हैं चुने हुए पार्षदों में से ही प्रति वर्ष किसी एक को मेयर चुना जाता है मेयर शहर के प्रथम नागरिक के रूप में जाना जाता है 74वे संविधान संशोधन द्वारा महिलाओं के लिए कमसेकम 1/3 सीटें आरक्षित की गई हैं अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा समाज के अन्य कमजोर वर्गों

विवेकाधीन कार्य :

() मनोरंजन : पार्कों, सभागारों आदि का

() सांस्कृतिक : संगीत, नाटक, चित्रकला तथा अन्य कलाओं का आयोजन और पुस्तकालयों तथा संग्रहालयों जैसी गतिविधियों को देखना

() खेलों सम्बन्धी गतिविधियाँ : विभिन्न खेलों के लिए मैदानों का प्रावधान तथा खेल प्रतियोगिताओं तथा टूर्नामेण्ट आदि की व्यवस्था करना

() कल्याणकारी सेवाएँ : सामुदायिक भवनों का निर्माण तथा रखरखाव, सार्वजनिक वितरण प्रणाली लागू करना, परिवार कल्याण योजनाएँ तथा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए योजनाओं को लागू करना

मेयर के प्रमुख कार्य

मेयर नगर निगम के प्रमुख के रूप में चुना जाता है जिसके निम्नलिखित प्रमुख कार्य हैं :

  • निगम की बैठकों की अध्यक्षता करना तथा बैठक में शिष्टता तथा अनुशासन बनाए रखना;
  • पार्षद तथा राज्य सरकार के बीच में एक कड़ी के रूप में कार्य करना
  • शहर में आए विदेशी गणमान्य व्यक्तियों की अगुवाई करना

 नगर निगम के आय के स्त्रो

पंचायती राज की तरह, अपने क्षेत्र की कल्याणकारी गतिविधियों तथा विकास के लिए

नगर निगम व्यवस्था को भी धन की आवश्यकता होती ही है नगर निगम अधिनियम

में आय के स्त्रोतों का प्रावधान किया गया है आय के कुछ स्त्रो निम्नलिखित ैं :

  • करो से प्राप्त आय : नगर निगम विभिन्न मदों पर कर लगाता है जैसेहाउस टैक्स, मनोरंजन कर, होर्डिंग और विज्ञापनों पर कर, पंजीकरण शुल्क, इमारतों की निर्माण योजनाओं पर कर आदि
  • अन्य शुल्क तथा अधिभार : इसके अन्तर्गत जलापूर्ति शुल्क बिजली शुल्क, सीवर शुल्क, दुकानदारों से लाइसेन्स फीस तथा टोल टैक्स और चुंगी शुल्क आदि
  • अनुदान : राज्य तथा केन्द्रीय सरक द्वारा विकास से सम्बन्धित अनेक योजनाओं तथा विकास कार्यक्रमों के लिए अनुदान उपलब्ध कराया जाता है
  • किराए से प्राप्त आय : नगर निगम अपनी सम्पत्तियों दुकानें, े, समुदायिक केन्द्र, बरात घर तथा मेलों, शादियो अन्य प्रदर्शनियों के लिए विभिन्न स्थल आदि को किराए पर दे देता है और उनसे किराया प्राप्त करता है

नगर परिषद्

. रचना

कम जनसंख्या वाले शहरों में नगर परिषद होते हैं जो स्थानीय शहर, उसकी समस्याएँ तथा विकासात्मक कार्यों को देखती हैं 74वें संविधान संशोधन के उपरान्त, प्रत्येक शहर के लिए नगरपालिकाओं की रचना करना आवश्यक है। प्रत्येक नगर परिषद् का चुनाव वयस्क मतदाताओं द्वारा पाँच वर्ष के लिए किया जाता राज्य चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित शर्तों को पूरा कर पाने वाले व्यक्ति ही पार्षद के रूप में चुन जा सकते है यदि किसी कारण से नगर परिषद् का अपनी पाँच वर्ष की अवधि पूरा करने से पहले ही विघटन हो जाता है तो उस तारीख से माह के अन्तर्गत पुन चुनाव कराए जाते हैं चुन हुए सदस्य अपने में से ही किसी एक को नगर परिषद् का अध्यक्ष चुनते हैं अध्यक्ष पन पद पर तब तक बना रहता है तक चुने हुए सदस्यों के बहुमत का विश्वास मत उस प्राप्त प्रत्येक नगर परिषद् में एक कार्यकारी अधिकारी होता है। स्वास्थ्य अधिकारी, कर अधीक्षक, सिविल इंजीनियर आदि अन्य महत्वपूर्ण अधिकारी होती है।

. नगर परिषद् के कार्य

नगर परिषद् के निम्नलिखित कार्य हैं :

1. स्वास्थ्य तथा स्वच्छता : शहर की सफाई का प्रबन्धन, कूड़ेकरकट का निपटान, अस्वास्थ्यकर तथा मिलावटी खाद्य पदार्थों पर रोक तथा औषधालयों एवं अस्पतालों का रखरखाव करना;

2. बिजली तथा जलापूर्ति : बिजली तथा शुद्ध पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करना तथा तालाब एवं पानी के ैंरों का रखरखाव करना;

3. शिक्षा : प्राथमिक स्कूलों तथा शिक्षण केन्द्रों का संचालन तथा रखरखाव करना;

4. जन्म और मृत्यु का : शहर,कस्बों में जन्म मृत्यु के पंजीकरण का रिकॉर्ड रखना
तथा इनके लिए प्रमाणपत्र जारी करना

5. सार्वजनिक कार्य : गालियों को पक्का बनाना नगरपालिका सडकों की मरम्मत तथा रखरखाव करना, बारात घर, सामुदायिक भवनों, बाजारों, सार्वजनिक सुविधा केन्द्रों आदि का निर्माण तथा रखरखाव

स. आय के स्त्रो

धन के बिना कोई भी कार्य नहीं जा सकता नगर परिषदों के पास आय के भिन्नभिन्न
स्त्रो हैं इन स्त्रोतों को श्रेणियों में विभाजित किया है :

  • कर : सम्पत्ति, वाहन, मनोरंजन तथा विज्ञापन आदि कर से प्राप्त आय
  • किराया तथा शुल्क/अधिभार : जलापूर्ति शुल्क, सीवर व्यवस्था शुल्क, लाइसेन्स फीस, सामुदायिक भवनों, बरात घरों तथा दुकानों आदि का किराया
  • अनुदान : राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान
  • जुर्माने : कर देने वालों, कानून तोड़ने वालों तथा कानून का अतिक्रमण करने वालों पर किए गए जुर्मानों से प्राप्त आय

नगर पंचायतें

तीस हजार से अधिक तथा एक लाख से कम जनसंख्या वाले शहरी केन्द्रों में नगर पंचायत होती है यद्यपि इसके कुछ अपवाद भी हैं पूर्व टाउन एरिया समितियाँ (5000 से 20,000 तक की थी )

प्रावधान सहित :-

नगर, नगर वार्ड और नगर पंचायत/निगम/पालिका


नगर, नगर वार्ड और नगर पंचायत/निगम/पालिका

सामान्यतः यह स्वीकार किया जाता है कि नगर समुदाय में जनसंख्या अधिक होती है, जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है। भारत में नगरीय शासन व्यवस्था प्राचीन काल से ही प्रचलन में रही है, लेकिन इसे कानूनी रूप सर्वप्रथम 1687 में दिया गया, जब ब्रिटिश सरकार द्वारा मद्रास शहर के लिए नगर निगम संस्था की स्थापनी की गयी। बाद में 1793 के चार्टर अधिनियम के अधीन मद्रास, कलकत्ता तथा बम्बई के तीनों महानगरों में नगर निगमों की स्थापना की गयी। बंगाल में नगरीय शासन प्रणाली को प्रारम्भ करने के लिए 1842 में बंगाल अधिनियम पारित किया गया। 1882 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड रिपन ने नगरीय शासन व्यवस्था में सुधार करने का प्रयास किया, लेकिन वह राजनीतिक कारणों से अपने इस कार्य में असफल रहा। नगरीय प्रशासन के विकेन्द्रीकरण पर रिपोर्ट देने के लिए 1909 में शाही विकेन्द्रीकरण आयोग का गठन किया गया, जिसकी रिपोर्ट को आधार बनाकर भारत सरकार अधिनियम, 1919 में नगरीय प्रशासन के सम्बन्ध में स्पष्ट प्रावधान किया गया, जिसमें किये गये प्रावधानों के अनुसार नगरीय शासन व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गयी।

नगरीय शासन सम्बन्धी संवैधानिक उपबंध (भाग 9-क)
अनुच्छेद विवरण
अनुच्छेद 243 त परिभाषा
अनुच्छेद 243 थ नगर पालिकाओं का गठन
अनुच्छेद 243 द नगर पालिकाओं की संरचना
अनुच्छेद 243 ध वार्ड समितियों आदि का गठन और संरचना
अनुच्छेद 243 न स्थानों का आरक्षण
अनुच्छेद 243 प नगर पालिकाओं की अवधि आदि
अनुच्छेद 243 फ सदस्यता के लिए निरर्हताएँ
अनुच्छेद 243 ब नगरपालिकाओं आदि की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तदायित्व
अनुच्छेद 243 भ नगरपालिकाओं द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्ति और उनकी निधियाँ
अनुच्छेद 243 म वित्त आयोग
अनुच्छेद 243 य नगरपालिकाओं के लेखाओं की संपरीक्षा
अनुच्छेद 243 य क नगरपालिकाओं के लिए निर्वाचन
अनुच्छेद 243 य ख संघ राज्य क्षेत्रों को लागू होना
अनुच्छेद 243 य ग इस भाग का कतिपय क्षेत्रों को लागू न होना
अनुच्छेद 243 य घ जिला योजना के लिए समिति
अनुच्छेद 243 य ङ महानगर योजना के लिए समिति
अनुच्छेद 243 य च विद्यमान विधियों पर नगर पालिकाओं का बना रहना
अनुच्छेद 243 य छ निर्वाचन सम्बन्धी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्णन

नगरीय शासन व्यवस्था के सम्बन्ध में संवैधानिक प्रावधान
नगरीय शासन व्यवस्था के सम्बन्ध में मूल संविधान में कोई प्रावधान नहीं किया गया था, लेकिन इसे सातवीं अनुसूची की राज्य सूची में शामिल करके यह स्पष्ट कर दिया गया था कि इस सम्बन्ध में कघनून केवल राज्यों में नगरीय शासन व्यवस्था के सम्बन्ध में कघनून बनाया गया था। इन कघनूनों के अनुसार नगरीय शासन व्यवस्था के संचालन के लिए निम्नलिखित निकायों को गठित करने के सम्बन्ध में प्रावधान किया गया था-
1. नगर निगम
2. नगर पालिका
3. नगर क्षेत्र समितियाँ (नगर पंचायत)
4. अधिसूचित क्षेत्र समिति तथा
5. छावनी परिषद्।

74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा नगरीय शासन के सम्बन्ध में प्रावधान
22 दिसम्बर, 1992 को लोकसभा द्वारा तथा 23 दिसम्बर, 1992 को राज्यसभा द्वारा पारित और 20 अप्रैल, 1993 को राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत एवं 1 जून, 1993 से प्रवर्तित 74वें संविधान संशोधन द्वारा स्थानीय नगरीय शासन के सम्बन्ध में संविधान में भाग 9-क नये अनुच्छेदों (243 त से 243 य छ तक) एवं 12वीं अनुसूची जोड़कर निम्नलिखित प्रावधान किये गये हैं-
प्रत्येक राज्य में नगर पंचायत, नगर पालिका परिषद् तथा नगर निगम का गठन किया जाएगा। नगर पंचायत का गठन उस क्षेत्र के लिए होगा, जो ग्रामीण क्षेत्र से नगरीय क्षेत्र में परिवर्तित हो रहा है। नगर पालिका परिषद् के सम्बन्ध में छोटे नगरीय क्षेत्रों के लिए किया जाएगा, जबकि बड़े नगरों के लिए नगर निगम का गठन होगा। तीन लाख या अधिक जनसंख्या वाली नगर पालिका के क्षेत्र में एक या अधिक वार्ड समितियों का गठन होगा। प्रत्येक प्रकार के नगर निकायों के स्थानों के लिए अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के लिए उनके जनसंख्या के अनुपात में स्थानों को आरक्षित किया जाएगा तथा महिलाओं के लिए कुल स्थानों का 30ः आरक्षित होगा। नगरीय संस्थाओं की अवधि पाँच वर्ष की होगी, लेकिन इन संस्थाओं का 5 वर्ष के पहले भी विघटन किया जा सकता है और विघटन की स्थिति में 6 मास के अन्दर चुनाव कराना आवश्यक होगा।
नगरीय संस्थाओं की शक्तियाँ और उत्तरदायित्व क्या होगा, इसका निर्धारण राज्य विधान मण्डल कघनून बनाकर कर सकती है। राज्य विधान मण्डल कघनून बनाकर नगरीय संस्थाओं को निम्नलिखित के सम्बन्ध में उत्तरदायित्व और शक्तियाँ प्रदान कर सकती हैःदृ (अ) नगर में निवास करने वाले व्यक्तियों के सामाजिक न्याय तथा आर्थिक विकास के लिए योजना तैयार करने के लिए। (ब) ऐसे कार्यों को करने तथा ऐसी योजनाओं को क्रियानवित करने के लिए, जो उन्हें सौंपा जाए। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित विषयों, जो संविधान की बारहवीं अनुसूची में शामिल किये गये हैं, के सम्बन्ध में राज्य विधानमण्डल कघनून बनाकर नगरीय संस्थानों को अधिकार एवं दायित्व सौंप सकते हैं-
1. नगरीय योजना (इसमें शहरी योजना भी सम्मिलित है)।
2. भूमि उपयोग का विनियम और भवनों का निर्माण।
3. आर्थिक और सामाजिक विकास की योजना।
4. सड़के और पुल।
5. घरेलू, औद्योगिक और वाणिज्यिक प्रयोजनों के निमित्त जल की आपूर्ति।
6. लोक स्वास्थ्य, स्वच्छता, सफाई तथा कूड़ा-करकट का प्रबन्ध।
7. अग्निशमन सेवाएँ।
8. नगरीय वानिकी, पर्यावरण का संरक्षण और पारिस्थितिक पहलुओं की अभिवृद्धि।
9. समाज के कमजोर वर्गों (जिसके अन्तर्गत विकलांग और मानसिक रूप से मन्द व्यक्ति सम्मिलित हैं) के हितों का संरक्षण।
10. गन्दी बस्तियों में सुधार।
11. नगरीय निर्धनता में कमी।
12. नगरीय सुख-सुविधाओं, जैसे पार्क, उद्यान, खेल का मैदान इत्यादि की व्यवस्था।
13. सांस्कृतिक, शैक्षणिक और सौन्दर्यपरक पहलुओं की अभिवृद्धि।
14. कब्रिस्तान, शव गाड़ना, श्मशान और शवदाह तथा विद्युत शवदाह
15. पशु-तालाब तथा जानवरों के प्रति क्रूरता को रोकना।
16. जन्म-मरण सांख्यिकी (जन्म-मरण पंजीकरण सहित)।
17. लोक सुख सुविधायें (पथ-प्रकाश, पार्किंग स्थल, बस स्टाप, लोक सुविधा सहित)।
18. वधशालाओं तथा चर्म शोधनशालाओं का विनियमन।
19. राज्य विधानमण्डल कघनून बनाकर उन विषयों को विहित कर सकती है, जिन पर नगरीय संस्थाएँ कर लगा सकती हैं।
20. नगरीय संस्थाओं की वित्तीय स्थिति का पुनर्विलोकन करने के लिए वित्त आयोग का गठन किया जाएगा, जो करों, शुल्कों, पथकरों, फीसों की शुद्ध आय और संस्थाओं तथा राज्य के बीच वितरण के लिए राज्यपाल से सिफारिश करेगा।

निर्वाचन
नगर निगमों, नगरपालिकाओं और अन्य स्थानीय निकायों के निर्वाचन के संचालन के लिए शक्तियाँ 74वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के तहत प्रत्येक राज्य व संघ राज्य क्षेत्र में गठित राज्य निर्वाचन आयोग में निहित हैं। यह आयोग भारत निर्वाचन आयोग से स्वतंत्र है।

प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट
27 नवम्बर, 2007 को वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाले दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने अपनी छठी रिपोर्ट, जो स्थानीय प्रशासन में सुधार से सम्बन्धित है, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को प्रस्तुत की। रिपोर्ट में स्थानीय प्रशासन में लोकतंत्र के प्रोन्नयन तथा इसे नागरिक केन्द्रित बनाने का सुझाव दिया गया है। प्रशासन में स्थानीय लोकतंत्र के प्रोन्नयन को विकेन्द्रीकरण से कहीं ऊपर बताते हुए साउथ अफ्रीकन एक्ट की तर्ज पर ऐसा कानून संसद में पारित कराने को कहा गया है, जिससे स्थानीय निकायों को अधिक शक्तियाँ एवं दायित्व सौंपे जा सकें। रिपोर्ट में जिला स्तर पर लोकतांत्रिक सरकार का एक तीसरा स्तर सृजित करने का सुझाव दिया गया है।
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में संसद से प्रत्येक राज्य में विधान परिषद् के गठन के लिए कघ्दम उठाने को कहा है। आयोग का विचार है कि विधान परिषद् के गठन से स्थानीय शासन को राज्य शासन व्यवस्था में प्रतिनिधित्व मिल सकेगा। रिपोर्ट में चुनाव सुधारों के लिए निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन व इनके आरक्षण सम्बन्धी कार्य को राज्य स्तरीय चुनाव आयोग पर छोड़ने को कहा गया है। स्थानीय सरकारों की वित्तीय स्थिति में सुधार के लिए प्रशासनिक सुधार आयोग ने कहा है कि राज्य वित्त आयोगों का गठन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि केन्द्रीय वित्त आयोग की सिफारिशों को यह ध्यान में रख सकें। आयोग के अनुसार स्थानीय सरकारों को संविधान के तहत प्रदत्त दायित्वों का पूर्ण निर्वाह करना चाहिए तथा विद्युत बोर्ड व जल प्राधिकरण जैसे निकायों को स्थानीय सरकारों के प्रति उत्तरादायी होना चाहिए।

नगर पालिका
भारत में, एक नगर पालिका अक्सर एक शहर के रूप में जाना जाता है। यह न तो एक ग्राम और न ही बड़े शहर के बराबर होता है, वरन उनके बीच का होता है। एक नगर पालिका 20,000 या उससे अधिक लोगों को मिलाकर बनता है, लेकिन अगर यह 5 लाख से अधिक जनसंख्या वाला हो जाता है तब एक निगम बन जाता है।
नगर पालिका एक प्रशासनिक इकाई होती है, जिसमें स्पष्ट रूप से परिभाषित क्षेत्र होता है और इसकी जनसंख्या भी अंकित होती है। आमतौर पर यह एक शहर, कस्बे या गांव, या उनमें से छोटे समूह रूप में होता है। एक नगरपालिका में प्रायः एक महापौर प्रशासनिक अधिकारी होता है, व इसके ऊपर नगर परिषद या नगरपालिका परिषद का नियंत्रण होता है। प्रायः नगरपालिका अध्यक्ष ही प्रशासनिक अध्यक्ष होता है।

नगर निगम
नगर निगम के एक स्थानीय शासी निकाय के लिए कानूनी नाम होता है, जो (लेकिन जरूरी सीमित नहीं) शहर, काउंटियों, कस्बों, बस्ती, चार्टर बस्ती, गांवों और नगर सहित स्थलों के लिए प्रयुक्त शब्द होता है। नगर निगम के समावेश तब होता है जब ऐसे नगर पालिकाओं हो स्वयं राज्य या प्रांत में वे स्थित हैं के कानूनों के तहत संस्थाओं के संचालक. अक्सर, इस घटना को पुरस्कार या नगर निगम के एक चार्टर की घोषणा से चिह्नित है।
भारत में एक नगर निगम एक स्थानीय सरकार के रूप में 2 लाख या उससे अधिक की जनसंख्या के एक शहर का प्रशासन करता है। पंचायती राज प्रणाली के तहत, यह राज्य सरकार के साथ सीधे संपर्क रखता है, हालांकि यह प्रशासनिक दृष्टि से जिले के अधीन ही आता है व उसी में स्थित होता है। भारत में सबसे बड़ा नगर निगमों वर्तमान में दिल्ली, कोलकाता और चेन्नई के बाद मुंबई रहे हैं।

भूमिका एवं कार्य
नगर निगम राज्य सरकार के साथ विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए समन्वय से काम करता है। भारत में नगर निगम के सभी अधिनियम निगम के कार्यों, शक्तियों और जिम्मेदारियों को दो श्रेणियों में विभाजित करते हैं।
1. अनिवार्य – कुछ अनिवार्य कार्य हैं – शुद्ध और पौष्टिक पानी की आपूर्ति, निर्माण और सार्वजनिक सड़कों का रखरखाव, प्रकाश और सार्वजनिक सड़कों का पानी, सार्वजनिक सड़कों, स्थानों और नाली की सफाई, आक्रामक, खतरनाक एवं अप्रिय ट्रेडों और आजीविकाओं या व्यवहारों का नियमन, प्राथमिक स्कूलों की स्थापना एवं रखरखावय सार्वजनिक अस्पतालों का रखरखाव या समर्थन, जन्म व मृत्यु का पंजीकरणय सार्वजनिक गलियों, पुलों एवं अन्य स्थानों पर अवरोधों को दूर करना, सड़कों का नामकरण एवं मकानों का क्रमांकन।
2. विवेकाधीन – कुछ विवेकाधीन कार्य इस प्रकार है – सार्वजनिक पार्कों, बागीचों, पुस्तकालयों, संग्रहालयों, आराम घर, कुष्ठरोगी घर, अनाथालयों, महिलाओं के लिए वृद्धाश्रमों व बचाव घरों का निर्माण एवं रखरखाव, सड़क के रखरखाव के साथ उसके किनारों व अन्य स्थानों पर पेड़ों का रोपण, निम्न आय वर्ग के लिए आवास, सर्वेक्षणों का आयोजन, सार्वजनिक स्वागत, सार्वजनिक प्रदर्शनियों एवं सार्वजनिक मनोरंजन का आयोजनय नगर पालिका द्वारा परिवहन सुविधाओं का प्रावधान, नगर निगम कर्मचारियों के कल्याण के लिए संवर्धन
नगर पंचायत/निगम/पालिका के अन्र्तगत नगर के विभिन्न भाग/वार्ड से एक-एक सदस्य भी चुने जाते है। नगर के एक-एक भाग/वार्ड की जनसंख्या लगभग एक ग्राम पंचायत के बराबर हो जाती है।

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